Class 10th Economics Chapter 1 Notes

Class 10th Economics Chapter 1 Notes || अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास कक्षा 10वीं

Class 10th Economics Chapter 1 Notes

Class 10th      Economics
Chapter 1      Notes 
अर्थव्यवस्था एवं इसके विकास का इतिहास

 

★ भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
✓ सोने की चिड़िया :- अंग्रेजी शासन से पहले भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था क्योंकि यहाँ की अर्थव्यवस्था बहुत समृद्ध थी।
✓ गुलामी का काल :- भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन का गुलाम रहा।
✓ शोषण :- ब्रिटिश शासन ने भारत के संसाधनों का भरपूर शोषण किया और इसे जमकर लूटा, जिससे देश की आर्थिक विकास की गति बहुत धीमी या नगण्य हो गई।

★ अर्थव्यवस्था का परिचय
✓ औपनिवेशिक शासन (Colony) :- अंग्रेजी शासन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अपना एक उपनिवेश बनाकर रखा था।
✓ उपनिवेश (Colony) का अर्थ :- जब कोई शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र किसी कमजोर या पिछड़े देश पर अपना अधिकार जमा लेता है और उसके समस्त आर्थिक (Economic) एवं राजनीतिक (Political) संसाधनों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है, तो उस शासित देश को शक्तिशाली देश का ‘उपनिवेश’ कहा जाता है। जैसा भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन का एक उपनिवेश था।
✓ फूट डालो और शासन करो :- उन्होंने “फूट डालो और शासन करो” (Divide and Rule) की नीति अपनाकर भारत को अपना दास बनाए रखा।
✓ प्राचीन स्थिति :- ब्रिटिश शासन से पूर्व, भारत एक कृषि प्रधान देश होने के बावजूद उद्योग, व्यापार और आधारभूत संरचना में दुनिया के कई देशों से बेहतर स्थिति में था।
✓ दमनकारी नीतियां :- अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण भारत में गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास और विषमता बढ़ गई।

★ आज़ादी के समय भारत के पास चुनौतियाँ
✓ पुनरुत्थान :- 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिलने के बाद, नीति-निर्धारकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पुनरुत्थान करना था। अर्थातः भारत को फिर से दुनिया की एक अग्रणी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करना।

★ भारतीय अर्थव्यवस्था के शोषण के प्रमाण
अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था का जमकर शोषण किया, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
✓ आय की स्थिरता :- लोगों की आमदनी बढ़ना बंद हो गई थी।
✓ कृषि पर निर्भरता :- उद्योगों के नष्ट होने के कारण जनसंख्या का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर हो गया।
✓ हस्तशिल्प का पतन :- भारत के मशहूर कलाकृति जो हाथ से बनाए गए सामान को उद्योगों को अंग्रेजों ने खत्म कर दिया।

★ आर्थिक क्रियाएँ (Economic Activities)
वे सभी क्रियाएँ जिनसे हमें आय (Income) प्राप्त होती है, उन्हें आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं। जैसे किसान का खेत में काम करना, मज़दूर का कारखाने में काम करना, शिक्षक का स्कूल में पढ़ाना आदि।

★ अर्थव्यवस्था का अर्थ और कार्य
अर्थव्यवस्था एक ऐसा तंत्र या ढाँचा है जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ (जैसे- कृषि, उद्योग, व्यापार, बैंकिंग, बीमा आदि) की जाती हैं।

★अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख कार्य:
1. लोगों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करना।
2. लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करना।

★ प्रमुख अर्थशास्त्रियों के अनुसार परिभाषाएँ
✓ आर्थर लेविस (Arthur Lewis) :- “अर्थव्यवस्था का अर्थ किसी राष्ट्र के संपूर्ण व्यवहार से होता है जिसके आधार पर मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए वह अपने संसाधनों का प्रयोग करता है।”
✓ ब्राउन (Brown) :- “अर्थव्यवस्था आजीविका अर्जन की एक प्रणाली है।” (Economy is the system of earning livelihood.)

★अर्थव्यवस्था की संरचना या ढाँचा (Structure of Economy)
अर्थव्यवस्था की संरचना का अर्थ विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में इसके विभाजन से है। भारतीय अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है:
1. प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector)
✓ इसे ‘कृषि क्षेत्र’ भी कहा जाता है।
✓ इसमें वे क्रियाएँ आती हैं जो सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होती हैं। उदाहरण :- कृषि, पशुपालन, मछली पालन, जंगलों से वस्तुओं को प्राप्त करना (वानिकी) आदि।

2. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector)
✓ इसे ‘औद्योगिक क्षेत्र’ भी कहा जाता है।
✓ इसमें प्राथमिक क्षेत्र के उत्पादों का उपयोग करके नई वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। उदाहरण :- खनिज व्यवसाय, निर्माण कार्य, गैस और बिजली का उत्पादन, कुटीर एवं लघु उद्योग आदि।
3. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector)
✓ इसे ‘सेवा क्षेत्र’ (Service Sector) भी कहा जाता है।
✓ यह क्षेत्र वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता, बल्कि प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों की सहायता करता है। उदाहरण :- बैंक एवं बीमा, परिवहन, संचार, व्यापार और अन्य सरकारी/निजी सेवाएँ।

★ राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का योगदान
समय के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया है:

क्षेत्र

वर्ष 1901

वर्ष 1947 (आज़ादी)

वर्ष 2007

प्राथमिक क्षेत्र

63.6%

 58.7%

22.0%

द्वितीयक क्षेत्र

12.7% 

14.3% 

22.0%

तृतीयक क्षेत्र

23.7%

27.0%

56.0%

Important Points
✓ प्राथमिक क्षेत्र की गिरावट :- आज़ादी के समय कृषि का योगदान 58.7% था, जो 2007 तक घटकर मात्र 22% रह गया।
✓ सेवा क्षेत्र का उदय :- सेवा क्षेत्र (Tertiary) का योगदान 27% से बढ़कर 56% हो गया है।
✓ विकास का संकेत :- यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत धीरे-धीरे एक समृद्ध और विकसित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

★ अर्थव्यवस्था के प्रकार (Types of Economy)
आज विश्व में मुख्य रूप से तीन प्रकार की अर्थव्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। इनका वर्गीकरण उत्पादन के साधनों के स्वामित्व (Ownership) के आधार पर किया गया है:
1. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalist Economy) :- वैसी अर्थव्यवस्था जहाँ उत्पादन के साधनों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है। इसका मुख्य उद्देश्य निजी लाभ कमाना होता है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि।
2. समाजवादी अर्थव्यवस्था (Socialist Economy) :- इसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एवं संचालन देश की सरकार के पास होता है। इसका मुख्य लक्ष्य निजी लाभ न होकर सामाजिक कल्याण (Social Welfare) होता है। चीन, क्यूबा आदि।
✓ नोट: भूमंडलीकरण के कारण अब इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है।
3. मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) :- यह पूँजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्था का मिश्रण है। यहाँ उत्पादन के साधनों का स्वामित्व सरकार और निजी व्यक्तियों—दोनों के पास होता है। यह पूँजीवाद और समाजवाद के बीच का रास्ता (Mid-way) है।

इसका सबसे अच्छा उदहारण भारत है

★ समावेशी विकास एवं आर्थिक वृद्धि
1. समावेशी विकास (Inclusive Growth) :- आर्थिक विकास की वह पद्धति या प्रक्रिया जिससे समाज के सभी वर्गों का जीवन-स्तर ऊँचा होता जाए तथा समाज का कोई भी वर्ग विकास के लाभ से अछूता न रहे। अर्थातः विकास का फल केवल अमीरों तक सीमित न रहकर गरीब और पिछड़े वर्गों तक भी पहुँचे।
2. आर्थिक विकास की एक और परिभाषा (प्रो० मेयर एवं बाल्डविन) :- इनके अनुसार “आर्थिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा दीर्घकाल (Long period) में किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।”
• निष्कर्ष: आर्थिक विकास केवल धन बढ़ना नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था में सुधार और प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में बदलाव लाने वाली प्रक्रिया है।

★ आर्थिक विकास (Economic Development) एवं आर्थिक वृद्धि (Economic Growth)
सामान्यतः लोग इन दोनों को एक ही समझते हैं, लेकिन अर्थशास्त्रियों के अनुसार इनमें बारीक अंतर है:
बिंदु आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) आर्थिक विकास (Economic Development)
देश का प्रकार इसका प्रयोग मुख्य रूप से विकसित देशों (Developed Countries) के लिए होता है। इसका प्रयोग विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (Developing Economies) के संदर्भ में होता है।
विचारक श्रीमती उर्सला हिक्स और डॉ० ब्राइट सिंह प्रो० मेयर एवं बाल्डविन
प्रकृति यह केवल आय की मात्रात्मक बढ़ोत्तरी को दर्शाता है। यह आय के साथ-साथ सामाजिक और ढाँचागत सुधारों को भी दर्शाता है।

★ आर्थिक नियोजन एवं योजना आयोग

★ आर्थिक नियोजन (Economic Planning)
✓ जब सरकार देश के उपलब्ध प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों का एक निश्चित समय सीमा के भीतर निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करती है, तो इसे आर्थिक नियोजन कहते हैं।
✓ योजना आयोग के अनुसार :- राष्ट्र की प्राथमिकताओं के अनुसार देश के संसाधनों का विभिन्न विकासात्मक क्रियाओं में प्रयोग करना ही आर्थिक नियोजन है।

★ भारत में योजना आयोग (Planning Commission) :- भारत में योजना आयोग का गठन 15 मार्च, 1950 को किया गया था। देश के प्रधानमंत्री इसके पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष होते हैं। इसके प्रथम तत्कालीन अध्यक्ष प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे इस आयोग का कामकाज एक उपाध्यक्ष की देख-रेख में होता है, जिसकी सहायता के लिए 8 सदस्य होते हैं।

★ पंचवर्षीय योजनाएँ (Five Year Plans)
भारत में आर्थिक विकास का श्रेय इन योजनाओं को दिया जाता है:
✓ प्रथम पंचवर्षीय योजना :- इसकी अवधि 1951-1956 थी।
✓ ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना :- इसकी अवधि 2007-2012 थी।

★ आर्थिक शब्दावली में अंतर (मैडिसन के अनुसार)
✓ आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) :- धनी देशों में आय का बढ़ता हुआ स्तर।
✓ आर्थिक विकास (Economic Development) :- निर्धन देशों में आय का बढ़ता हुआ स्तर।
✓ आर्थिक प्रगति (Economic Progress) :- यह एक व्यापक शब्द है जिसमें वृद्धि और विकास दोनों शामिल हैं।

योजना का नाम कब से कब तक याद रखने का आसान तरीका

पहली पंचवर्षीय योजना

 1951-1956

आज़ादी के ठीक बाद खेती सुधारने के लिए पहली कोशिश।

दूसरी पंचवर्षीय योजना

1956-1961

बड़े कारखाने और उद्योग लगाने पर ध्यान दिया गया।

सातवीं पंचवर्षीय योजना

1985-1990

अनाज की पैदावार बढ़ाने और रोज़गार देने का लक्ष्य।

दसवीं पंचवर्षीय योजना

2002-2007

गरीबी घटाने और शिक्षा बढ़ाने की कोशिश।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना

2007-2012

तेज़ विकास और हर वर्ग तक लाभ पहुँचाने (समावेशी विकास) का लक्ष्य।

  

★ राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council – N.D.C.)
भारत में राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक नियोजन (Economic Planning) के लिए राज्य सरकारों तथा योजना आयोग के बीच तालमेल और सहयोग का वातावरण बनाना है। देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके पदेन सदस्य होते हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना बनाने का कार्य योजना आयोग का है, लेकिन अंत में इसे राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) द्वारा ही अनुमोदित (Approved) किया जाता है।

★ मौद्रिक विकास
मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए किया गया संघर्ष और कठिन परिश्रम ही अर्थव्यवस्था के विकास का आधार है। इसके विकास के चरणों को हम इस प्रकार समझ सकते हैं:
1. वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) :- जब एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का लेन-देन (आदान-प्रदान) किया जाता है, तो उसे वस्तु विनिमय प्रणाली कहते हैं। यह आर्थिक विकास की प्रारंभिक अवस्था थी। उस समय मनुष्य की आवश्यकताएँ कम थीं, इसलिए लोग अपनी जरूरतों को वस्तुओं के बदले वस्तुओं से पूरा कर लेते थे। जैसे अनाज के बदले कपरा लेना
2. मौद्रिक विकास (Evolution of Money)
जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी और लोगों की जरूरतें छोटे कस्बों से बड़े गाँवों और क्षेत्रों तक फैलीं, वस्तु विनिमय कठिन हो गया।
✓ मुद्रा (Money) का प्रभाव :- विनिमय की एक सामान्य इकाई के रूप में मुद्रा (पैसे) का जन्म हुआ। अब वस्तुओं के बदले वस्तु नहीं, बल्कि मुद्रा के द्वारा विनिमय (Exchange) होने लगा।
✓ फायदा :- अब दूर-दराज के क्षेत्रों में अनाज या भारी वस्तुओं का बंडल ले जाने की जरूरत नहीं रही, क्योंकि मुद्रा ने क्रय-विक्रय को बहुत आसान बना दिया।
3. बैंक और चेक (Banking and Cheque)
मुद्रा के चलने के बाद लोगों ने और भी सुगम साधनों की आवश्यकता महसूस की। फिर धीरे धीरे मनुष्य ने चेक को एक ऐसा साधन बनाया जिसे एक व्यक्ति या संस्था दूसरे के नाम जारी करती है और बैंकों के माध्यम से पैसे का आदान-प्रदान होता है।
4. कंप्यूटर युग (The Age of Computers)
आज के युग में मानवीय मस्तिष्क का लगभग सारा कार्य मशीनों द्वारा होने लगा है।
✓ कंप्यूटर (Computer) :- यह बिजली से चलने वाली एक ऐसी मशीन है जो मनुष्य से भी अधिक तेज स्मरण-शक्ति रखती है।
✓ उपयोग :- कंप्यूटर आज सूचना, शिक्षा और ज्ञान का सबसे सुलभ साधन बन गया है। यह बड़ी तेजी से अपने स्मरण-शक्ति के बल पर पैसे के आदान-प्रदान और आर्थिक लेन-देन में भी सहयोग देता है।

★ आधुनिक बैंकिंग और डिजिटल अर्थव्यवस्था
आज के समय में हम वस्तु विनिमय और साधारण मुद्रा के युग से आगे बढ़कर “डिजिटल बैंकिंग” के युग में प्रवेश कर चुके हैं। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. कोर बैंकिंग प्रणाली (Core Banking System) :- जब कोई व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना किसी विलम्ब (देरी) के बैंक के माध्यम से पैसे का लेन-देन करता है, तो इस प्रणाली को ‘कोर बैंकिंग प्रणाली’ कहते हैं। इसमें कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से बैंक की सभी शाखाएँ आपस में जुड़ी होती हैं, जिससे ग्राहक कहीं भी बैठकर अपने खाते का संचालन कर सकता है।
2. ए.टी.एम. (ATM – Automatic Teller Machine) :- यह प्लास्टिक के एक छोटे से टुकड़े (कार्ड) पर इंगित यांत्रिकी चिह्नों के माध्यम से काम करने वाली मशीन है।
✓ विशेषता :- ATM का अर्थ है ‘स्वचालित टेलर मशीन’। (Automated Teller Machine)
✓ यह बिजली से संचालित कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित होती है।
✓ इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी भी समय (24 घंटे) अपने चिह्नित स्थान से पैसे निकाल सकता है।
3. डेबिट कार्ड (Debit Card) :- यह बैंक द्वारा अपने ग्राहकों को दी जाने वाली सुविधा है। इसके माध्यम से ग्राहक अपने बैंक खाते में जमा राशि का उपयोग किसी भी समय खरीदारी करने या पैसे निकालने के लिए कर सकता है।
4. क्रेडिट कार्ड (Credit Card) :- यह भी एक प्लास्टिक कार्ड है, लेकिन यह ग्राहक की साख (Credit) के आधार पर जारी किया जाता है। इसके माध्यम से ग्राहक एक निश्चित सीमा तक बैंक से उधार लेकर खरीदारी कर सकता है और बाद में उसका भुगतान कर सकता है।

★ राष्ट्रीय आय (National Income) :- किसी देश में एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य के योग को ‘राष्ट्रीय आय’ कहा जाता है। सामान्य तौर पर जिस देश की राष्ट्रीय आय अधिक होती है, वह विकसित कहलाता है और जिसकी कम होती है, वह अविकसित कहलाता है।

★ प्रति व्यक्ति आय (Per capita Income) :- प्रति व्यक्ति आय देश में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आय से होती है। राष्ट्रीय आय को देश की कुल जनसंख्या से भाग देने पर प्रति व्यक्ति आय प्राप्त होती है:
                       प्रति व्यक्ति आय = राष्ट्रीय आय / कुल जनसंख्या
✓ इसे आर्थिक विकास की माप के लिए सबसे उचित सूचकांक माना जाता है।

★ विश्व बैंक की रिपोर्ट (2006)
विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार देशों का वर्गीकरण उनकी 2004 की प्रति व्यक्ति आय के आधार पर किया गया:
✓ विकसित देश :- जिनकी प्रति व्यक्ति आय 4,53,000 रुपये प्रति वर्ष या उससे अधिक है।
✓ विकासशील (निम्न आय) देश :- जिनकी प्रति व्यक्ति आय 37,000 रुपये प्रति वर्ष या उससे कम है।
✓ भारत की स्थिति :- भारत निम्न आय वर्ग में आता है क्योंकि 2004 में इसकी प्रति व्यक्ति आय केवल 28,000 रुपये प्रति वर्ष थी।

★ राज्यों की तुलना (2000-2003)
राज्यों की प्रति व्यक्ति आय (रुपयों में)

राज्य

प्रति व्यक्ति आय (2000-2003)

पंजाब

26,000

केरल

22,800

बिहार

5,700

★ मानव विकास सूचकांक (Human Development Index – HDI)
यह सूचकांक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा महबूब-उल-हक के निर्देशन में तैयार की गई पहली मानव विकास रिपोर्ट में प्रस्तावित किया गया था। इसका माप विभिन्न देशों की तुलना, लोगों के शैक्षिक स्तर, उनकी स्वास्थ्य स्थिति और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर होती है। इसके तीन मुख्य सूच (i) जीवन आशा, (ii) शिक्षा प्राप्ति, और (iii) जीवन-स्तर। इसका मान शून्य से एक (0-1) के बीच होता है।

★ 2004 की मानव विकास रिपोर्ट

देश

HDI मूल्य

HDI क्रम

नार्वे

0.965

1

ऑस्ट्रेलिया

0.957 3

श्रीलंका

0.755 93

चीन

0.768 81

भारत

0.611 126

पाकिस्तान

0.539 134

बांग्लादेश

0.530 137

★ भारत की स्थिति का विश्लेषण
✓ मध्यम स्तर का विकास :- 2006 में 177 देशों की गणना में भारत का HDI मूल्य 0.611 था और यह 126वें क्रम पर था, जो दर्शाता है कि भारत में मानव विकास मध्यम स्तर का है।
✓ लिंग विकास सूचकांक (GDI) :- भारत की स्थिति में सुधार देखा गया, जहाँ यह 2000 में 105वें क्रम से सुधरकर 2004 में 96वें क्रम पर आ गया।
✓ पड़ोसी देशों से तुलना :- यह उल्लेखनीय है कि श्रीलंका जैसे छोटे देश का स्थान भारत से काफी ऊपर है, हालांकि भारत में विकास की गति तेज होने के कारण स्थिति सुधर रही है।

★ राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट (National Human Development Report – NHDR)
✓ जारी होने की तिथि :- भारत की पहली राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट योजना आयोग द्वारा तैयार की गई और इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 23 अप्रैल, 2002 को नई दिल्ली में जारी किया।
✓ राज्यों की रैंकिंग :- इस पहली रिपोर्ट में 1981, 1991 और 2001 के लिए राज्यों के HDI मूल्यों का अनुमान लगाया गया। इसमें केरल का रैंक सबसे ऊपर था, जबकि बिहार, मध्य प्रदेश, आसाम, राजस्थान और उत्तर प्रदेश (BIMARU राज्यों) का रैंक सबसे नीचे था।
✓ मानव निर्धनता सूचकांक (HPI) :- रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में निर्धनता में कमी आई है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बहुत मामूली कमी देखी गई।
✓ उपभोक्ता व्यय :- रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में देश की ग्रामीण जनता की व्यय क्षमता में कमी आई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसमें काफी वृद्धि हुई है।

★ आधारिक संरचना (Infrastructure) :- आधारिक संरचना का अर्थ उन सुविधाओं और सेवाओं से है जो देश के आर्थिक विकास में सहायक होती हैं। जिसमें मुख्य रूप से बिजली, परिवहन, संचार, बैंकिंग, स्कूल, कॉलेज और अस्पताल आदि देश के आर्थिक विकास के आधार हैं, जिन्हें आधारभूत ढाँचा भी कहा जाता है। जिस देश का आधारभूत ढाँचा जितना अधिक विकसित होगा, वह देश उतना ही अधिक विकसित माना जाएगा।

★ बिहार के विकास की स्थिति
✓ गौरवशाली इतिहास :- बिहार वह भूमि है जहाँ गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्त हुई और महावीर स्वामी ने शांति का संदेश दिया यहाँ चन्द्रगुप्त, अशोक, शेरशाह सूरी, गुरु गोविन्द सिंह, बाबू वीर कुँवर सिंह, देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और लोकगीतकार भिखारी ठाकुर जैसी महान हस्तियों का जन्म हुआ || बिहार में ही महात्मा गाँधी ने “चम्पारण आंदोलन” की शुरुआत की और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया.
✓ वर्तमान स्थिति :- ऐतिहासिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद आज बिहार गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अशांति जैसी समस्याओं से जूझ रहा है और इसे एक अति पिछड़े राज्य के रूप में गिना जाता है.

★ बिहार के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण
आर्थिक दृष्टि से बिहार के पिछड़ेपन के निम्नलिखित कारण और दूर करने के उपाय हैं:
✓ तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या :- यहाँ जनसंख्या बहुत तीव्र गति से बढ़ रही है, जिसके कारण विकास के संसाधन कम पड़ जाते हैं और अधिकांश हिस्सा केवल जनता के भरण-पोषण में ही खर्च हो जाता है.
✓ आधारिक संरचना का अभाव :- राज्य में सड़क, बिजली, सिंचाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है.
✓ कृषि पर अत्यधिक निर्भरता :- यहाँ की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर आधारित है, लेकिन पुरानी तकनीकों के कारण उपज बहुत कम होती है.
✓ बाढ़ तथा सूखा से क्षति :- खासकर उत्तरी बिहार में नेपाल से आने वाले जल के कारण हर साल भीषण बाढ़ आती है। उदाहरण के तौर पर 2008 की कोशी बाढ़ और 2009 में बागमती नदी की बाढ़ ने सीतामढ़ी, दरभंगा और मधुबनी जैसे इलाकों में भारी जान-माल की क्षति पहुँचाई थी।
✓ अन्य कारण :- औद्योगिक पिछड़ापन, गरीबी, खराब विधि व्यवस्था और कुशल प्रशासन का अभाव भी राज्य के विकास में बाधक हैं.
✓ औद्योगिक पिछड़ापन :- झारखंड के अलग होने के बाद सभी खनिज क्षेत्र और बड़े उद्योग वहाँ चले गए, जिससे बिहार में औद्योगिक इकाइयाँ नगण्य रह गईं।
✓ गरीबी :- बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है।
✓ खराब विधि व्यवस्था :- कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण नागरिक शांतिपूर्वक उद्योग नहीं चला पा रहे थे।
✓ कुशल प्रशासन का अभाव :- प्रशासनिक स्थिति में पारदर्शिता की कमी के कारण भ्रष्टाचार के कई उदाहरण सामने आए हैं।

पिछड़ेपन को दूर करने के प्रमुख उपाय
✓ जनसंख्या पर नियंत्रण :- परिवार नियोजन और महिला शिक्षा को बढ़ावा देना।
✓ कृषि का तेजी से विकास :- नए यंत्रों, उत्तम खाद और बीजों का प्रयोग करना।
✓ बाढ़ पर नियंत्रण :- नेपाल सरकार के सहयोग से नदियों पर नियंत्रण पाना (विशेषकर उत्तरी बिहार में)।
✓ आधारिक संरचना का विकास :- बिजली उत्पादन बढ़ाना और सड़क, शिक्षा तथा स्वास्थ्य में सुधार करना।
✓ उद्योगों का विकास :- बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनर्जीवित करना और विदेशी पूंजी निवेश लाना।
✓ गरीबी दूर करना :- स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर पैदा करना।
✓ शांति व्यवस्था और स्वच्छ प्रशासन :- व्यापारियों में विश्वास जगाने के लिए कानून व्यवस्था और पारदर्शी प्रशासन स्थापित करना।

★ बिहार बनाम भारत: तुलनात्मक स्थिति (2001)

सूचकांक

बिहार

भारत

कुल जनसंख्या

 8.29 करोड़

102.9 करोड़

जनसंख्या वृद्धि दर

2.5%

1.9%

कुल साक्षरता

47.0%

64.8%

साक्षरता (स्त्री)

33.5%

54.1%

गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्या

42.6%

26.0%

प्रति व्यक्ति आय

3948 रुपये

13226 रुपये

★ “आश्चर्य का अर्थशास्त्र” (Miracle Economics)
✓ C.S.O. के आकलन के अनुसार, जहाँ 2003-04 में घरेलू उत्पाद (GDP) की दर -5.15% (नकारात्मक) थी, वहीं 2004-05 से 2008-09 के बीच यह 11.03% (सकारात्मक) हो गई।
✓ इस अवधि में बिहार विकास दर के मामले में देश में गुजरात (11.05%) के बाद दूसरे स्थान पर आ गया।

★ विशेष राज्य के दर्जे की माँग
✓ 15 नवंबर 2000 को झारखंड के अलग होने से बिहार के पास केवल उपजाऊ भूमि बची, जबकि खनिज क्षेत्र चले गए।
✓ राज्य के पास अपने आंतरिक संसाधन विकास के लिए पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग की जा रही है ताकि केंद्र से अधिक वित्तीय सहायता और करों में रियायत मिल सके।

★ देश के विकास में बिहार का योगदान
✓ कहा जाता है कि “यदि भारत का विकास करना है तो बिहार का विकास करना आवश्यक है।”
✓ प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कुजनेट (Kuznett) के अनुसार—”गरीबी कैंसर रोग की तरह है” जो एक हिस्से में होने पर पूरे शरीर (या विश्व) को प्रभावित करती है।
✓ बिहार में अत्यधिक उर्वरक भूमि (Fertile Land) उपलब्ध है, जो कृषि आधारित विकास का मुख्य आधार है।
✓ यदि बिहार की नदियों को परस्पर जोड़ दिया जाए, तो उत्तरी बिहार को बाढ़ से और दक्षिणी बिहार को सूखे से बचाया जा सकता है।
✓ बिहार के मजदूर और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र के विशेषज्ञों का देश के विकास (विशेषकर पंजाब की कृषि और IT क्षेत्र) में प्रमुख योगदान रहा है।
✓ ऐसे उद्योग जो कृषि उत्पादन पर आश्रित होते हैं, जैसे—आम से अचार बनाना या टमाटर से सॉस बनाना।
✓ केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (C.S.O.) के अनुसार, बिहार की वर्तमान विकास दर 11.03 प्रतिशत मानी गई है, जो देश में गुजरात (11.5%) के बाद दूसरे स्थान पर है।

★ गरीबी और विकास की मुख्य अवधारणाएँ
✓ मनुष्य के जीवन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान तीन सबसे बुनियादी जरूरतें हैं।
✓ योजना आयोग द्वारा निर्धारित वह सीमा जो गरीबी को कैलोरी मापदंड के आधार पर मापती है।
✓ ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन निर्धारित है।
✓ गरीबी रेखा से नीचे (BPL = Below Poverty Line) रहने वाले लोगों को संक्षेप में BPL कहा जाता है।
✓ ग्रामीण मजदूरों को साल में कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देने वाली विश्व की सबसे बड़ी रोजगार योजना है।
✓ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पर काम देने की यह एक कानूनी व्यवस्था है।
✓ आर्थिक शब्दावली में वह विकास जो समाज के सभी वर्गों और क्षेत्रों तक बिना भेदभाव के पहुँचे।
✓ वह सरकारी व्यवस्था (राशन दुकान) जिससे गरीबों को कम कीमत पर अनाज उपलब्ध कराया जाता है।

 

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