Class 10th History Chapter 1 Notes Bihar Board
History ( इतिहास )
Class 10th Chapter 1
यूरोप में राष्ट्रवाद
Full Chapter Explanation & Notes
परिचय :- प्यारे बच्चों, आज हम उस दौर की कहानी पढ़ने जा रहे हैं जब दुनिया के नक्शे पर इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश आज की तरह नहीं थे। ये छोटे-छोटे टुकड़ों और राजाओं के गुलामों के रूप में बंटे हुए थे। इन बिखरे हुए राज्यों को एक करने के लिए जो सबसे बड़ी ताकत बनी, उसका नाम है—राष्ट्रवाद।
★ राष्ट्रवाद (Nationalism) क्या है?
- सरल शब्दों में :- अपने देश के प्रति प्रेम, गर्व, वफादारी और समर्पण की भावना ही राष्ट्रवाद कहलाती है।
- किताबी परिभाषा :- राष्ट्रवाद आधुनिक विश्व की राजनैतिक जागृति का प्रतिफल है। यह एक ऐसी भावना है जो किसी विशेष भौगोलिक, सांस्कृतिक या सामाजिक परिवेश में रहने वाले लोगों में एकता की वाहक बनती है।
- राष्ट्र (Nation) :- फ्रांसीसी दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन के अनुसार, लंबे प्रयासों, त्याग और निष्ठा का चरम बिंदु ही राष्ट्र होता है।
- निरंकुशवाद (Absolutism) :- एक ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था जिसकी सत्ता पर किसी का कोई अंकुश (नियंत्रण) नहीं होता। इतिहास में ऐसी राजशाही सरकारों को निरंकुश कहा गया जो अत्यंत केंद्रीकृत, सैन्य बल पर आधारित और दमनकारी होती थीं।
★ यूरोप में राष्ट्रवाद अचानक कैसे आया?
यूरोप के लोगों में अपने देश के लिए मरने-मिटने की भावना रातों-रात नहीं जगी, इसके पीछे दो मुख्य घटनाएं थीं:
- पुनर्जागरण (Renaissance) :– यूरोप में राष्ट्रवाद का असली बीजारोपण (शुरुआत) इसी काल से माना जाता है, जब लोगों ने अंधविश्वास छोड़कर नया सोचना शुरू किया।
- 1789 की फ्रांसीसी क्रांति :- इस क्रांति ने राष्ट्रवाद को पहली बार पूरी दुनिया के सामने एक मजबूत रूप में दिखाया। इसने राजा की सत्ता छीनकर आम जनता को ताकत दी और “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” का नारा दिया।
★ नेपोलियन बोनापार्ट का जादू (राष्ट्रवाद को बढ़ाने वाला)
फ्रांस का महान सेनापति नेपोलियन भले ही युद्ध लड़ने निकला था, लेकिन उसने अनजाने में राष्ट्रवाद का बहुत बड़ा प्रचार कर दिया:
- राजनैतिक पहचान दी :- नेपोलियन से पहले इटली और जर्मनी सिर्फ नक्शे पर नाम मात्र थे। नेपोलियन ने छोटे राज्यों को जीतकर उन्हें एक प्रशासनिक रूपरेखा दी।
- आम जनता की चर्चा :- उसने राजनीति को राजाओं के महलों से बाहर निकालकर अखबारों, सड़कों और आम जनता (सर्वसाधारण) के बीच लाकर खड़ा कर दिया।
★ वियना कांग्रेस (1815 ईस्वी)
- आयोजन :- नेपोलियन के पतन के बाद यूरोप की विजयी शक्तियाँ 1815 ईस्वी में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एकत्र हुईं।
- मुख्य उद्देश्य :- यूरोप में पुनः उसी पुरानी व्यवस्था (रूढ़िवादी राजतंत्र) को स्थापित करना, जिसे नेपोलियन के युद्धों और विजयों ने अस्त-व्यस्त कर दिया था।
- विफलता :- वियना कांग्रेस में भाग लेने वाले राजनीतिज्ञ (जैसे मैटर्निक) दूरदर्शी नहीं थे। वे इस बात को समझने में असमर्थ रहे कि अब जनतंत्र और राष्ट्रवाद की नयी शक्तियाँ राजनीति को निर्धारित करने वाले नए तत्वों के रूप में उभर चुकी थीं, जिन्हें दबाना मुमकिन नहीं था।
★ वियना सम्मेलन और मैटर्निक (1815 ई०)
- मेजबानी :- 1815 ई० के वियना सम्मेलन की मेजबानी ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटर्निक ने की थी, जो एक घोर प्रतिक्रियावादी (बदलावों का विरोधी) था। इसमें ब्रिटेन, रूस, प्रसा और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियाँ शामिल थीं।
- युग परिवर्तन :- वियना सम्मेलन के माध्यम से यूरोप में नेपोलियन युग का अंत और मैटर्निक युग की शुरुआत हुई।
★ इटली का विभाजन (मैटर्निक की नीति)
मैटर्निक ने इटली पर अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए उसे कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दिया
- सिसली और नेपल्स :- बू्र्वों वंश के सम्राट फर्डिनेंड को दे दिया गया।
- रोम और आसपास के राज्य :- पोप को सौंप दिए गए।
- लोम्बार्डी एवं वेनेशिया :- इस पर ऑस्ट्रिया की प्रभुता कायम हुई।
- परमा, मोडेना और टस्कनी :- ये प्रांत हैब्सबर्ग राजवंश को दे दिए गए।
- जेनेवा और सार्डिनिया पिडमाउन्ट :- इन दोनों को एक ही राज्य में सम्मिलित कर दिया गया।
★ जर्मनी में मैटर्निक व्यवस्था
- जर्मनी में 39 रियासतों का संघ कायम रखा गया।
- इस संघ पर अप्रत्यक्ष रूप से ऑस्ट्रिया का अधिकार स्थापित किया गया।
- हर संभव प्रयास किया गया कि जर्मन राज्यों के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना न जगे।
नोट: मैटर्निक ने फ्रांस में भी पुरानी व्यवस्था लागू की, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी साबित नहीं हुई और जल्द ही पूरे यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हो गया।
★ फ्रांस में बू्र्वों राजवंश की पुनर्स्थापना (लुई 18वाँ)
- वियना व्यवस्था के तहत फ्रांस में क्रांति के पूर्व की व्यवस्था स्थापित करने के लिए बू्र्वों राजवंश को दोबारा गद्दी दी गई और लुई 18वाँ फ्रांस का राजा बना।
- उसने फ्रांस की बदली हुई परिस्थितियों को समझा और जनता पर जबरन पुरानी व्यवस्था थोपने का प्रयास नहीं किया।
- उसने प्रतिक्रियावादी (पुरानी सोच वाले) और सुधारवादी (नयी सोच वाले) शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
- इसी उद्देश्य से उसने 2 जून 1814 ई० को सम्राट की ओर से एक संवैधानिक घोषणापत्र जारी किया, जो 1848 ई० तक फ्रांस में लागू रहा।
- लुई 18वें के बाद चार्ल्स-X के शासनकाल में इस व्यवस्था में कुछ दमनकारी परिवर्तन किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 1830 की क्रांति हुई।
★ जुलाई 1830 की क्रांति के कारण
- चार्ल्स-X एक निरंकुश और प्रतिक्रियावादी शासक था। उसने फ्रांस में उभर रही राष्ट्रीयता और जनतंत्रवादी भावनाओं को दबाने का काम किया और संवैधानिक लोकतंत्र की राह में कई गतिरोध (बाधाएँ) उत्पन्न किए।
- चार्ल्स-X ने एक घोर प्रतिक्रियावादी व्यक्ति पोलिग्नेक को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
- पोलिग्नेक ने लुई 18वें द्वारा स्थापित ‘समान नागरिक संहिता’ को हटाकर उसके स्थान पर शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग (अमीर/कुलीन वर्ग) की स्थापना की और उन्हें विशेष अधिकार दिए। उदारवादियों ने इसे क्रांति के विरुद्ध एक षड्यंत्र माना।
- प्रतिनिधि सदन और उदारवादियों के कड़े विरोध के जवाब में चार्ल्स-X ने 25 जुलाई 1830 ई० को चार दमनकारी अध्यादेशों द्वारा उदारवादी तत्वों का गला घोंटने का प्रयास किया।
★ क्रांति की शुरुआत और परिणाम
- इन अध्यादेशों के विरोध में पेरिस में क्रांति की लहर दौड़ गई और फ्रांस में 28 जून 1830 ई० से तीन दिवसीय गृहयुद्ध आरम्भ हो गया। इसे ही जुलाई 1830 की क्रांति कहा जाता है।
- परिणामतः चार्ल्स-X फ्रांस की राजगद्दी त्याग कर इंग्लैंड पलायन कर गया। इस प्रकार फ्रांस में बू्र्वों वंश का शासन हमेशा के लिए अंत हो गया।
- बू्र्वों वंश के स्थान पर आर्लेयंस वंश को गद्दी सौंपी गई और लुई फिलिप फ्रांस का नया शासक बना। उसने उदारवादियों, पत्रकारो और पेरिस की जनता के समर्थन से सत्ता प्राप्त की थी, इसलिए उसकी नीतियां संवैधानिक गणतंत्र के पक्ष में रहीं।
★ 1830 की क्रांति का प्रभाव (Significance)
- यह क्रांति इस बात की सूचक थी कि फ्रांस में कट्टर राजसत्तावादियों का प्रभाव कम हो रहा था। यह मुख्य रूप से मध्यमवर्ग और लोकसंप्रभुता के सिद्धांतों की जीत थी।
- इस क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति के सिद्धांतों को पुनर्जीवित कर दिया और वियना कांग्रेस के प्रतिक्रियावादी उद्देश्यों को निर्मूल (विफल) सिद्ध कर दिया।
- इसका प्रभाव संपूर्ण यूरोप पर पड़ा। इसने यूरोपीय राष्ट्रों के राजनीतिक एकीकरण, संवैधानिक सुधारों और राष्ट्रवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
- इसके प्रभाव के कारण इटली, जर्मनी, यूनान, पोलैंड एवं हंगरी में तत्कालीन रूढ़िवादी व्यवस्था (पुरानी परंपराओं, स्थापित रीति-रिवाजों, चर्च और राजाशाही (राजतंत्र) को बनाए रखना) के प्रति राष्ट्रीयता के कारण आंदोलन उठ खड़े हुए।
- आगे चलकर फ्रांस में भी लुई फिलिप की नीतियों के खिलाफ आवाज उठने लगी, जिससे फ्रांस में भी एक और क्रांति (1848 की क्रांति) तैयार कर दी।
★ सन् 1848 ई० की क्रांति (फ्रांस)
लुई फिलिप एक उदारवादी (खुले विचारों वाला व्यक्ति) लेकिन अत्यधिक महत्वाकांक्षी (विचार, स्वभाव, इच्छा) शासक था।
- क्रांति के मुख्य कारण :
- लुई फिलिप ने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए ‘स्वर्णिम मध्यमवर्गीय नीति’ अपनाते हुए 1840 में गीजो को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो एक कट्टर प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी सामाजिक, आर्थिक या वैधानिक सुधार के सख्त खिलाफ था।
- राजा अपने शासनकाल में सिर्फ पूँजीपति वर्ग को साथ रखना पसंद किया, जिन्हें देश के कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
- राजा के पास कोई सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था और विदेश नीति में भी नाकामी मिल रही थी। इसके चलते देश में भुखमरी और बेरोजगारी फैल गई, जिससे गीजो की भारी आलोचना होने लगी।
- सुधारवादियों ने 22 फरवरी 1848 ई० को पेरिस में थियर्स के नेतृत्व में एक विशाल भोज (Banquet) का आयोजन किया। इसके विरोध में जगह-जगह अवरोध खड़े किए गए और विद्रोह भड़क उठा।
- 24 फरवरी 1848 को लुई फिलिप ने गद्दी छोड़ दी और इंग्लैंड चला गया।
- नेशनल एसेम्बली ने फ्रांस को गणतंत्र घोषित किया और 21 वर्ष से ऊपर के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार तथा ‘काम के अधिकार’ की गारंटी दी।
- गणतंत्रवादियों के नेता लामार्टिन और सुधारवादियों के नेता लुई ब्लॉ के बीच मतभेद शुरू होने के बाद जल्द ही लुई नेपोलियन फ्रांस का सम्राट बना।
★ इटली का एकीकरण (Unification of Italy)
19वीं सदी के शुरुआत में इटली मात्र एक भौगोलिक अभिव्यक्ति था, जहाँ कई स्वतंत्र राज्य थे और लोगों में अलगाव की भावना थी।
- एकीकरण की मुख्य बाधाएँ:
- इटली में ऑस्ट्रिया और फ्रांस जैसे विदेशी राष्ट्रों का सीधा हस्तक्षेप था।
- राजधानी रोम पूरी तरह से पोप के प्रभाव में थी। पोप चाहता था कि इटली का एकीकरण राजाओं के नहीं, बल्कि उसके नेतृत्व में धार्मिक दृष्टिकोण से हो।
- अनेक आर्थिक और प्रशासनिक विसंगतियाँ भी मौजूद थीं।
★ नेपोलियन का अप्रत्यक्ष योगदान
- नेपोलियन के सैन्य अभियानों ने इटली के नवजागरण और एकीकरण में अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा योगदान दिया।
- इटली विजय के बाद नेपोलियन ने उसे तीन गणराज्यों में गठित किया था: सीसपाइन गणराज्य, लीगुलियन, और ट्रांसपेडेन।
- उसने यातायात व्यवस्था को दुरुस्त कर पूरे क्षेत्र को एक शासन के अधीन लाया, जिससे इटली के लोगों में पहली बार जागृति आई।
- नेपोलियन के पतन के बाद वियना कांग्रेस द्वारा इटली को फिर से पुराने रूप में लाने के लिए उसके दो प्रमुख राज्यों पिडमाउन्ट और सार्डिनिया का एकीकरण कर दिया गया, जिससे एकीकरण की दिशा तय होने लगी।
★ मेजिनी का योगदान (शुरुआती चरण)
- इटली में 1820 ई० से ही संवैधानिक सुधारों के लिए नागरिक आंदोलन होने लगे थे। इसी दौरान राष्ट्रवादियों द्वारा एक गुप्त दल ‘कार्बोनारी’ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य छापामार युद्ध के जरिए राजतंत्र को नष्ट कर गणराज्य स्थापित करना था। प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता जोसेफ मेजिनी का संबंध भी इसी गुप्त दल से था।
- 1830 की फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव से इटली में भी नागरिक आंदोलन शुरू हुए। मेजिनी ने इन आंदोलनों का उपयोग कर उत्तरी और मध्य इटली में एक एकीकृत गणराज्य स्थापित करने का प्रयास किया।
- ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटर्निक ने इन राष्ट्रवादी नागरिक आंदोलनों को क्रूरता से दबा दिया और मेजिनी को इटली से पलायन (भागना) करना पड़ा।
★ जोसेफ मेजिनी: गुण और कमियाँ
- मेजिनी एक महान साहित्यकार, गणतांत्रिक विचारों का समर्थक और योग्य सेनापति था।
- वह तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की बेहतर समझ नहीं रखता था। उसमें आदर्शवादी गुण अधिक और व्यावहारिक गुण कम थे।
★ मेजिनी द्वारा संस्थाओं की स्थापना
पराजय के बाद भी हार न मानते हुए मेजिनी ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थाओं का गठन किया
- यंग इटली (1831 ई०) :- इसकी स्थापना नवीन इटली के निर्माण के उद्देश्य से की गई थी। इटली प्रायद्वीप से विदेशी हस्तक्षेप को समाप्त करना तथा एक संयुक्त गणराज्य स्थापित करना।
- यंग यूरोप (1834 ई०) :- इस संस्था का गठन कर मेजिनी ने यूरोप के अन्य देशों में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलनों को भी प्रोत्साहित किया।
★ 1848 की क्रांति और इटली में विचारों का टकराव (प्रथम चरण की असफलता)
- 1848 में जब पूरे यूरोप में क्रांति का दौर आया, तो ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटर्निक को अंततः ऑस्ट्रिया छोड़कर भागना पड़ा।
- मैटर्निक के जाते ही इटली की राजनीति में मेजिनी का दोबारा आगमन हुआ। वह संपूर्ण इटली का एकीकरण कर उसे एक गणराज्य बनाना चाहता था।
- इटली के एकीकरण के तरीकों को लेकर तीन अलग-अलग विचारधाराएँ टकरा रही थीं:
- मेजिनी संपूर्ण इटली को एक ‘गणराज्य’ बनाना चाहता था।
- चार्ल्स अल्बर्ट अपने नेतृत्व में सभी प्रांतों का विलय चाहता था (राजतंत्र के अधीन)।
- पोप इटली को एक धर्मराज्य बनाने का पक्षधर था।
- परिणाम :- इस वैचारिक टकराव के कारण एकीकरण का मार्ग रुक गया। इसी बीच ऑस्ट्रिया ने इटली के कुछ भागों पर हमला कर दिया, जिसमें सार्डिनिया के शासक चार्ल्स अल्बर्ट की हार हो गई। ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप से जनवादी आंदोलन को कुचल दिया गया, मेजिनी की पुनः हार हुई और उसे फिर से पलायन करना पड़ा।
★ एकीकरण का द्वितीय चरण: कावूर का आगमन
- भले ही 1848 तक के प्रयास असफल रहे, लेकिन इन आंदोलनों ने इटली की जनता में राष्ट्रवाद की भावना को बहुत तीव्र कर दिया था।
- चार्ल्स अल्बर्ट के बाद सार्डिनिया-पिडमाउन्ट का नया शासक ‘विक्टर इमैनुएल’ बना। वह एक कट्टर राष्ट्रवादी विचारधारा का राजा था और एकीकरण के पक्ष में था।
- अपनी नीतियों को धरातल पर उतारने और इटली के एकीकरण के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए विक्टर इमैनुएल ने ‘काउंट कावूर’ को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
★ काउंट कावूर: एक चतुर कूटनीतिज्ञ
- कावूर एक सफल कूटनीतिज्ञ एवं राष्ट्रवादी था। वह इटली के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा ऑस्ट्रिया को मानता था।
- ऑस्ट्रिया को हराने के लिए उसने फ्रांस के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
★ क्रिमिया का युद्ध (1853-54 ई०) और पेरिस सम्मेलन
- 1853-54 के क्रिमिया युद्ध में फ्रांस ने पिडमाउन्ट से कोई मदद नहीं मांगी थी, फिर भी कावूर ने अपनी तरफ से फ्रांस की ओर से युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी।
- युद्ध समाप्त होने के बाद जब पेरिस का शांति सम्मेलन हुआ, तो फ्रांस और ऑस्ट्रिया के साथ पिडमाउन्ट को भी सम्मानपूर्वक बुलाया गया।
- इस सम्मेलन में कावूर ने अपनी कूटनीति के बल पर इटली में ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसके कारण पूरे यूरोप का ध्यान इटली की ओर गया और इटली की आंतरिक समस्या संपूर्ण यूरोप की समस्या बन गई।
★ फ्रांस (नेपोलियन III) के साथ संधि
- कावूर ने फ्रांस के सम्राट नेपोलियन III से एक गुप्त संधि की, जिसके तहत फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ पिडमाउन्ट को सैन्य समर्थन देने का वादा किया।
- इसके बदले कावूर ने नीस (Nice) और सेवाय (Savoy) नामक दो रियासतें फ्रांस को देना स्वीकार कर लिया।
- फ्रांस ने वादा किया कि यदि उत्तर तथा मध्य इटली की रियासतें जनमत संग्रह (Public Vote) के आधार पर पिडमाउन्ट से मिलना चाहेंगी, तो फ्रांस इसका विरोध नहीं करेगा।
- कावूर की आलोचना की जाती है कि उसने नीस और सेवाय जैसी रियासतें विदेशी को देकर राष्ट्रीय अस्मिता से खिलवाड़ किया। परंतु, कूटनीतिक दृष्टि से फ्रांसीसी मदद के बिना ऑस्ट्रिया को हराकर इटली का एकीकरण करना असंभव था, इसलिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी।
★ ऑस्ट्रिया-पिडमाउन्ट युद्ध (1859-60 ई०)
- 1859-60 में ऑस्ट्रिया और पिडमाउन्ट के बीच सीमा विवाद को लेकर युद्ध छिड़ गया। संधि के अनुसार, फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ अपनी सेना उतार दी, जिससे ऑस्ट्रियाई सेना बुरी तरह हारने लगी।
- युद्ध के दौरान ऑस्ट्रिया के एक बड़े राज्य लोम्बार्डी पर पिडमाउन्ट का कब्जा हो गया।
- जैसे ही युद्ध लंबा खिंचा, उत्तर और मध्य इटली की जनता कावूर के समर्थन में बड़े जनसैलाब के रूप में उतर आई। इटली के इस बढ़ते राष्ट्रवाद को देखकर नेपोलियन III घबरा गया। अतः वेनेशिया पर जीत मिलने से ठीक पहले ही नेपोलियन ने अपनी सेना वापस बुला ली और ऑस्ट्रिया-पिडमाउन्ट के बीच मध्यस्थता की।
- इस संधि के अनुसार लोम्बार्डी पर पिडमाउन्ट का अधिकार माना गया, लेकिन वेनेशिया पर ऑस्ट्रिया का अधिकार बना रहा।
★ गैरीबाल्डी
- गैरीबाल्डी पेशे से एक नाविक था। वह शुरुआत में मेजिनी के गणतांत्रिक विचारों का समर्थक था, परंतु बाद में काउंट कावूर के प्रभाव में आकर संवैधानिक राजतंत्र का पक्षधर बन गया।
- उसने अपने कर्मचारियों तथा स्वयंसेवकों को मिलाकर एक सशस्त्र सेना बनाई, जिसे इतिहास में ‘लाल कुर्ती’ (Red Shirts) के नाम से जाना जाता है।
★ दक्षिणी इटली का विजय अभियान
- गैरीबाल्डी ने अपनी सेना के साथ इटली के दक्षिणी प्रांतों—सिसली तथा नेपल्स पर आक्रमण किया।
- इन रियासतों की अधिकांश जनता बू्र्वों राजवंश के निरंकुश शासन से तंग आ चुकी थी, इसलिए उन्होंने गैरीबाल्डी का पूरा साथ दिया।
- गैरीबाल्डी ने यहाँ के राजा को हराकर गणतंत्र की स्थापना की और विक्टर इमैनुएल के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ की सत्ता संभाली।
★ रोम पर आक्रमण की योजना और कावूर से भेंट
- 1862 ई० में गैरीबाल्डी ने पोप के राज्य रोम पर आक्रमण करने की योजना बनाई। कावूर इस अभियान के खिलाफ था क्योंकि रोम पर हमला करने से फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश नाराज हो सकते थे। इसलिए कावूर ने रोम की रक्षा के लिए पिडमाउन्ट की सेना भेज दी।
- इसी बीच गैरीबाल्डी की भेंट काउंट कावूर से हुई और कावूर के समझाने पर उसने रोम के अभियान की योजना को त्याग दिया।
★ गैरीबाल्डी का अद्भुत त्याग और भारतीय राष्ट्रवाद पर प्रभाव
- दक्षिणी इटली के जीते गए पूरे क्षेत्र (सिसली और नेपल्स) को गैरीबाल्डी ने बिना किसी संधि या शर्त के राजा विक्टर इमैनुएल को सौंप दिया।
- विक्टर इमैनुएल ने गैरीबाल्डी को दक्षिणी क्षेत्र का शासक (गवर्नर) बनने का प्रस्ताव दिया, परंतु उसने इसे अस्वीकार कर दिया।
- वह अपनी सारी संपत्ति राष्ट्र को समर्पित करके एक साधारण किसान की भांति जीवन जीने के लिए अपने खेत पर चला गया।
- त्याग और बलिदान की इस अद्भुत भावना के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गैरीबाल्डी के चरित्र का खूब प्रचार किया गया। भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने गैरीबाल्डी की जीवनी लिखी थी।
★ इटली का पूर्ण एकीकरण (1871 ई०)
- 1862 ई० में दुर्भाग्यवश काउंट कावूर की मृत्यु हो गई और वह पूरा एकीकरण अपनी आँखों से नहीं देख सका। इसके बाद शेष एकीकरण का कार्य राजा विक्टर इमैनुएल ने स्वयं पूरा किया।
- 1870-71 में फ्रांस और प्रसा के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। इस कारण फ्रांस के लिए रोम में तैनात अपनी सेना को बनाए रखना और पोप को सुरक्षा देना संभव नहीं रहा। उसने अपनी सेना बुला ली।
- विक्टर इमैनुएल ने इस सुनहरे मौके का फायदा उठाया। उसने पोप के राजमहल को छोड़कर बाकी पूरे रोम को इटली में मिला लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
- पोप ने शुरुआत में इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया और खुद को वेटिकन सिटी के किले में बंद कर लिया। इस समस्या का अंत बहुत बाद में मुसोलिनी द्वारा हुआ, जब उसने पोप के साथ समझौता करके वेटिकन की स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार किया।
निष्कर्ष: इस प्रकार 1871 ई० तक इटली का पूर्ण एकीकरण मेजिनी, कावूर, गैरीबाल्डी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं और विक्टर इमैनुएल जैसे शासक के प्रयासों से संपन्न हुआ।
★ जर्मनी की शुरुआती भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति
- मध्यकाल (लगभग 800 ई०) में शार्लमा के नेतृत्व में जर्मनी सुदृढ़ था, परंतु आधुनिक युग के आते-आते यह पूरी तरह खंडित हो चुका था। इसमें लगभग 300 छोटे-बड़े राज्य थे।
- जर्मनी में गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक विषमताएँ मौजूद थीं।
- उत्तरी जर्मन राज्य :– यहाँ प्रोटेस्टेंट (“ईसाई धर्म की पुरानी कैथोलिक व्यवस्था का विरोध करने वाले और सुधारों का समर्थन करने वाले लोगो की संख्या अधिक थी और यहाँ प्रसा (Prussia) सबसे शक्तिशाली राज्य था।
- दक्षिणी जर्मन राज्य :- यहाँ कैथोलिक बहुल राज्यों का प्रभाव था। यहाँ की प्रतिनिधि सभा का नाम ‘डायट’ (Diet) था। शुरुआत में इनमें जर्मन राष्ट्रवाद की भावना का अभाव था।
★ जर्मन राष्ट्रवाद का उदय और विकास
- जर्मन एकीकरण की पृष्ठभूमि निर्माण का श्रेय नेपोलियन को जाता है। उसने 1806 ई० में जर्मन प्रदेशों को जीतकर ‘राइन राज्य संघ’ (Rhine Confederation) का निर्माण किया था, जिसने जर्मन लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाया।
- अनेक विचारकों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से देशभक्ति जगाई:
- हीगेल (Hegel) :- इन्होंने ‘ऐतिहासिक द्वंद्ववाद’ की व्याख्या की, जिससे प्रसा का भावी चांसलर बिस्मार्क बहुत प्रभावित था।
- काण्ट, हम्बोल्ट, अण्डर्ट :- अण्डर्ट ने कविताओं के माध्यम से देशभक्ति जागृत की।
- हर्डेनवर्ग तथा नोवोलिस :- इन्होंने जर्मनी के गौरवमय अतीत को जनता के सामने रखा।
- जैकब ग्रीम :- लोककथाओं और कला के माध्यम से संस्कृति को उजागर किया।
★ युवाओं, शिक्षण संस्थाओं और आर्थिक संघ का योगदान
- जर्मन शिक्षकों और विद्यार्थियों ने एकीकरण के उद्देश्य से ‘ब्रूशेन शैफ्ट’ नामक सभा स्थापित की। वाइमर राज्य का येना विश्वविद्यालय इस राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य केंद्र था।
- ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटर्निक ने इस छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए दमनकारी कानून ‘कार्ल्सवाद के आदेश’ (Carlsbad Decrees) जारी किए, लेकिन राष्ट्रवाद की धारा नहीं रुकी।
- एकीकरण को मजबूत करने में आर्थिक परिस्थितियों का बड़ा हाथ रहा। 1834 में जर्मन व्यापारियों ने व्यापारिक समानता के लिए प्रसा के नेतृत्व में ‘जालवेरिन’ नामक आर्थिक संघ बनाया। इसने क्षेत्रीय आदतों को कुचलकर राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया।
★ 1830 और 1848 की क्रांतियों का प्रभाव
- इसके प्रभाव से सेक्सोनी, हनोवर आदि राज्यों में लोकतांत्रिक विद्रोह हुए, जिन्हें प्रसा और ऑस्ट्रिया ने मिलकर दबा दिया।
- 1848 की फ्रांसीसी क्रांति ने जर्मन राष्ट्रवाद को पुनः भड़काया और मैटर्निक युग का अंत कर दिया। जर्मन राष्ट्रवादियों ने मार्च 1848 में फ्रैंकफर्ट में पुराने संसद की सभा बुलाई।
- इसमें प्रस्ताव पारित हुआ कि प्रसा का शासक फ्रेडरिक विलियम जर्मन राष्ट्र का नेतृत्व करेगा और समस्त राज्यों को एक सूत्र में बांधा जाएगा।
- फ्रेडरिक विलियम (जो निरंकुश और रूढ़िवादी था) ने इस व्यवस्था को मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वह ऑस्ट्रिया के साथ सीधे संघर्ष से बचना चाहता था। दक्षिणी राज्य भी इस प्रस्ताव के खिलाफ थे।
- इस गतिरोध से एकीकरण का मार्ग रुक गया और हुए विद्रोहों को ऑस्ट्रिया तथा प्रसा ने मिलकर दबा दिया।
★ विलियम प्रथम और बिस्मार्क का आगमन
- प्रसा अब समझ चुका था कि जर्मनी का एकीकरण केवल उसी के नेतृत्व में और सैन्य शक्ति (Military Might) के बल पर ही हो सकता है।
- इसी बीच फ्रेडरिक विलियम का देहांत हो गया और उसका भाई विलियम प्रथम प्रसा का शासक बना। वह कट्टर राष्ट्रवादी विचारों का पोषक था। उसके सुधारों से जर्मनी में औद्योगिक क्रांति तेज हुई और आधारभूत संरचनाएँ सुदृढ़ हुईं।
- विलियम प्रथम ने एकीकरण के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए महान कूटनीतिज्ञ ओटो वॉन बिस्मार्क को अपना चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया।
★ ओटो वॉन बिस्मार्क
- बिस्मार्क जर्मन डायट (संसद) में प्रसा का प्रतिनिधि हुआ करता था। वह हीगेल के विचारों से प्रभावित और एक बेहद सफल कूटनीतिज्ञ था।
- वह निरंकुश राजतंत्र का समर्थन करते हुए जर्मनी के एकीकरण में जुट गया। उसकी कूटनीतिक चतुरता ऐसी थी कि उदारवादी और कट्टरवादी राष्ट्रवादी, दोनों ही उसे अपने विचारों का समर्थक समझते थे।
- बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी का एकीकरण केवल भाषणों या प्रस्तावों से नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति से ही संभव है। अतः उसने ‘रक्त और लौह की नीति’ अपनाई।
- उसने अपने देश में अनिवार्य सैन्य सेवा लागू कर दी और प्रसा की सेना को इतना मजबूत कर दिया कि वह ऑस्ट्रिया के बराबर आ खड़ी हुई। उसने 1830 की ऑस्ट्रिया-प्रसा संधि का विरोध कर प्रसा के नेतृत्व में आंदोलन तेज किया।
★ जर्मनी के एकीकरण के तीन मुख्य युद्ध
बिस्मार्क ने अपनी कूटनीति और सैन्य बल के सहारे 7 वर्षों के भीतर तीन प्रमुख युद्ध लड़कर एकीकरण पूरा किया:
(i) डेनमार्क के साथ युद्ध (1864 ई०)
- शेल्सविग और होल्सटिन नामक दो जर्मन बहुल राज्यों पर डेनमार्क का नियंत्रण था।
- बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया को साथ मिलाकर 1864 में डेनमार्क पर आक्रमण कर दिया। डेनमार्क की हार हुई।
- जीत के बाद शेल्सविग प्रसा के अधीन हो गया और होल्सटिन ऑस्ट्रिया को प्राप्त हुआ।
- चूँकि होल्सटिन में जर्मनों की संख्या अधिक थी, बिस्मार्क ने वहाँ ऑस्ट्रिया के खिलाफ विद्रोह भड़का दिया। जब ऑस्ट्रिया की सेना इस विद्रोह को कुचलने के लिए प्रसा के क्षेत्र को पार करना चाहती थी, तो प्रसा ने उसे रोक दिया।
(ii) ऑस्ट्रिया के साथ युद्ध – सेडोवा का युद्ध (1866 ई०)
- ऑस्ट्रिया से युद्ध करने से पहले बिस्मार्क ने फ्रांस को तटस्थ रहने के लिए कुछ क्षेत्र देने का वादा किया और इटली के राजा विक्टर इमैनुएल से भी संधि कर ली ताकि ऑस्ट्रिया दोनों तरफ से युद्ध में फंस जाए।
- अपने अपमान से चिढ़कर ऑस्ट्रिया ने 1866 ई० में प्रसा के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। सेडोवा के युद्ध में ऑस्ट्रिया दोनों तरफ से फंसकर बुरी तरह पराजित हुआ।
- जर्मनी के क्षेत्रों से ऑस्ट्रिया का प्रभाव हमेशा के लिए समाप्त हो गया और इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का दो-तिहाई (2/3) कार्य पूरा हो गया।
(iii) फ्रांस के साथ युद्ध – सेडॉन का युद्ध (1870 ई०)
- शेष दक्षिण जर्मनी की रियासतों के एकीकरण के लिए फ्रांस को हराना जरूरी था, क्योंकि फ्रांस दक्षिण राज्यों के मामले में हस्तक्षेप कर सकता था।
- स्पेन की गद्दी पर प्रसा के राजकुमार की दावेदारी का फ्रांस ने विरोध किया और प्रसा से लिखित वादा मांगा। बिस्मार्क ने इस बातचीत (एम्स टेलीग्राम) को तोड़-मरोड़ कर प्रेस में जारी कर दिया, जिससे फ्रांसीसी और जर्मन दोनों भड़क गए।
- चिढ़कर फ्रांस के शासक नेपोलियन III ने 19 जून 1870 को प्रसा के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। सेडॉन की लड़ाई में फ्रांसीसियों की जबरदस्त हार हुई। इस युद्ध में फ्रांस जैसी महाशक्ति का पतन हुआ और जर्मनी के रूप में नई महाशक्ति का उदय हुआ।
- युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच फ्रैंकफर्ट की संधि हुई।
- अंततोगत्वा 1871 ई० तक जर्मनी का पूर्ण एकीकरण एक राष्ट्र के रूप में संपन्न हुआ और उसे यूरोप के मानचित्र पर स्थान मिला।
★ यूरोप में राष्ट्रवाद का कुल प्रभाव
- राष्ट्रवाद ने केवल जर्मनी और इटली का एकीकरण ही नहीं किया, बल्कि पूरे यूरोप में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू कर दी।
- इसके मूल में राष्ट्रीयता की भावना और लोकतांत्रिक विचार थे।
- हंगरी, बोहेमिया तथा यूनान में स्वतंत्रता आंदोलन इसी राष्ट्रवाद का परिणाम थे।
- इसी भावना ने अंततः ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) के पतन की कहानी को अंतिम रूप दिया।
- बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवाद के प्रसार ने स्लाव जाति को संगठित कर सर्बिया को जन्म दिया।
★ यूनान में राष्ट्रीयता का उदय
- यूनान की प्राचीन सभ्यता, साहित्यिक प्रगति, विचार, दर्शन, कला और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र की उपलब्धियाँ संपूर्ण यूरोपीय देशों के लिए प्रेरणास्रोत थीं। इसी कारण उसे पाश्चात्य (पश्चिमी) संस्कृति का मुख्य स्रोत या “यूरोप का पालना” माना जाता था।
- इस गौरवमय अतीत के बावजूद यूनान तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) के अधीन था, जो एक मुस्लिम साम्राज्य था।
- फ्रांसीसी क्रांति ने यूनानियों में राष्ट्रीयता की भावना जगाई। धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर उनकी पहचान एक थी, इसलिए वे तुर्की शासन से अलग होने के लिए तड़प उठे।
- ईसाई जगत मुख्य रूप से ग्रीक ऑर्थोडॉक्स तथा रोमन कैथोलिक चर्च में बंटा था। रूस तथा यूनान के लोग ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च को मानने वाले थे, जिसके कारण रूस की यूनान के प्रति धार्मिक सहानुभूति भी थी।
★ स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत और संस्थाएँ
- राष्ट्रवादियों ने तुर्की शासन को यूनान से बाहर निकालने और उसे स्वतंत्र बनाने के उद्देश्य से ओडेसा (Odessa) नामक स्थान पर ‘हितेरिया फिलाइक’ नामक संस्था की स्थापना की।
- क्रांति का नेतृत्व करने के लिए यूनान में एक शक्तिशाली मध्यम वर्ग तैयार हो चुका था।
- यूनान की आज़ादी के समर्थन में संपूर्ण यूरोप के नागरिक एकजुट होने लगे। इंग्लैंड के महान कवि लॉर्ड बायरन यूनानियों की स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ते हुए वहीं शहीद हो गए, जिससे पूरे यूरोप में तुर्की के खिलाफ सहानुभूति की लहर दौड़ गई।
★ स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य चरण और युद्ध
- 1821 ई० में अलेक्जेंडर चिपसिलांटी के नेतृत्व में यूनान में खुला विद्रोह शुरू हो गया।
- रूस का ज़ार अलेक्जेंडर व्यक्तिगत रूप से यूनान के पक्ष में था, लेकिन ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटर्निक के दबाव के कारण खुलकर सामने नहीं आया। जब नया ज़ार निकोलस गद्दी पर आया, तो उसने यूनानियों का खुलकर समर्थन किया।
- दोनों देशों के बीच समझौता हुआ कि वे तुर्की-यूनान विवाद में मध्यस्थता करेंगे। फ्रांस का राजा चार्ल्स X भी इसमें दिलचस्पी लेने लगा।
- इंग्लैंड, फ्रांस तथा रूस ने मिलकर तुर्की के खिलाफ और यूनान के समर्थन में संयुक्त सैन्य कार्रवाई करने का निर्णय लिया।
- तीनों देशों की संयुक्त नौसेना नावारिनो की खाड़ी में एकत्र हुई। तुर्की के समर्थन में सिर्फ मिस्र (Egypt) की सेना आई। इस युद्ध में मिस्र और तुर्की की सेना बुरी तरह पराजित हुई।
★ स्वतंत्रता की संधियाँ और परिणाम
- इस संधि के तहत तुर्की ने यूनान को स्वायत्तता देने की बात स्वीकार की, लेकिन यूनान पर तुर्की की नाममात्र की प्रभुता बनी रही। यूनानी राष्ट्रवादियों ने इसे पूरी तरह मानने से इनकार कर दिया।
- इंग्लैंड और फ्रांस यूनान पर रूस के प्रभाव को कम करना चाहते थे, इसलिए वे इसे पूर्ण स्वतंत्र देश बनाने के पक्ष में थे। अंततः 1832 ई० में यूनान को एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया।
- बवेरिया के राजकुमार ‘ओटो’ (Otto) को स्वतंत्र यूनान का राजा घोषित किया गया। इस प्रकार यूनान पर से तुर्की और रूस, दोनों का प्रभाव समाप्त हो गया।
★ अन्य यूरोपीय राज्यों में राष्ट्रवाद
(i) हंगरी (Hungary)
- हंगरी पर ऑस्ट्रिया का पूर्ण प्रभुत्व था।
- 1848 की फ्रांसीसी क्रांति (लुई फिलिप के पतन) के प्रभाव से यहाँ राष्ट्रीय आंदोलन शुरू हुआ। इसका नेतृत्व ‘कोसूथ’ (Kossuth) तथा ‘फ्रांसिस डिक’ नामक क्रांतिकारियों ने किया।
- कोसूथ लोकतांत्रिक विचारों का समर्थक था। उसने हंगरी में वर्गहीन समाज (Classless Society) की स्थापना के विचारों को जनता तक पहुँचाया।
- आंदोलन के दबाव में ऑस्ट्रिया की सरकार ने हंगरी की कई बातें मान लीं:
- हंगरी के लिए एक स्वतंत्र मंत्रिपरिषद की मांग स्वीकार की गई (जिसमें केवल हंगरी के सदस्य थे)।
- प्रेस को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई और राष्ट्रीय सुरक्षा सेना की स्थापना की गई।
- सामंती प्रथा समाप्त कर दी गई तथा प्रतिनिधि सभा (डायट) की बैठक प्रतिवर्ष राजधानी बुडापेस्ट में बुलाने की बात स्वीकार की गई।
(ii) पोलैंड (Poland)
- पोलैंड में राष्ट्रवादी भावना के कारण रूसी शासन के विरुद्ध विद्रोह शुरू हुए।
- 1830 ई० की क्रांति का प्रभाव यहाँ के उदारवादियों पर पड़ा, परंतु इन्हें इंग्लैंड और फ्रांस से कोई बाहरी सहायता नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप, रूस ने पोलैंड के विद्रोह को कड़े हाथों कुचल दिया।
(iii) बोहेमिया (Bohemia)
- बोहेमिया ऑस्ट्रियाई शासन के अंतर्गत था, जहाँ हंगरी के घटनाक्रम का गहरा प्रभाव पड़ा।
- बोहेमिया की बहुसंख्यक चेक जाति (Czech) की स्वायत्त शासन की मांग को शुरुआत में स्वीकार कर लिया गया, परंतु आगे चलकर आंदोलन ने हिंसात्मक रूप ले लिया। इसके कारण ऑस्ट्रिया द्वारा क्रांतिकारियों का सख्ती से दमन कर दिया गया और यहाँ की उपलब्धियाँ स्थायी नहीं रह सकीं।
★ अध्याय का मुख्य परिणाम
- यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का विकास फ्रांसीसी क्रांति के गर्भ से शुरू हुआ, जिसने कई बड़े राज्यों (इटली, जर्मनी) के एकीकरण और छोटे राष्ट्रों (यूनान, हंगरी) के उदय को सुनिश्चित किया।
- 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक राष्ट्रवाद का स्वरूप बदलकर ‘संकीर्ण राष्ट्रवाद’ हो गया। अब प्रत्येक राष्ट्र की जनता और शासक के लिए “उनका राष्ट्र ही सब कुछ” हो गया, जिससे बाल्कन क्षेत्र में जातीय समूहों के बीच टकराव बढ़ा और पूरा बाल्कन क्षेत्र युद्ध का अखाड़ा बन गया।
- बड़े यूरोपीय देशों में राष्ट्रवाद की भावना इतनी बढ़ गई कि उन्होंने औद्योगिक क्रांति की आड़ में एशियाई एवं अफ्रीकी देशों को अपना निशाना बनाया और वहाँ उपनिवेश (Colonies) स्थापित कर उनका आर्थिक शोषण शुरू किया। इसी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के कारण ऑटोमन साम्राज्य ध्वस्त हुआ।
★ यूरोपीय राष्ट्रवाद का भारत पर प्रभाव
यूरोप के इस राष्ट्रवादी प्रस्फुटन ने पूरे विश्व को जागरूक किया। इसके संदेश भारत में भी पहुँचे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक इससे काफी प्रभावित हुए:
- टीपू सुल्तान 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से अत्यधिक प्रभावित था। उसने अपने राज्य में ‘जैकोबिन क्लब’ (Jacobin Club) की स्थापना करवाई और स्वयं उसका सदस्य बना। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टम में स्वतंत्रता का प्रतीक ‘वृक्ष’ (Tree of Liberty) भी लगवाया था।
- भारत में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के नेता राजा राममोहन राय अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में गहरी रुचि रखते थे। उन्होंने 1821 ई० की नेपल्स की क्रांति की विफलता पर गहरा दुःख प्रकट किया था, तथा 1823 ई० की स्पेनिश स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता पर एक उत्सव भोज (Dinner Party) दिया था।
- कालांतर में भारत में 1857 की क्रांति से ही राष्ट्रीयता के स्पष्ट तत्व नजर आने लगे थे।
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