Biology Chapter 3 Notes Class 10th
Biology ( जीव विज्ञान )
Class 10th Chapter 3
परिवहन (Transportation)
Full Chapter Explanation & Notes
★ उपापचयी क्रियाएँ क्या हैं?
- हमारे शरीर को जिंदा रखने, बढ़ने और ऊर्जा (Energy) बनाने के लिए कोशिकाओं (Cells) के अंदर लगातार बहुत सारी रासायनिक क्रियाएँ होती रहती हैं, जिन्हें उपापचयी क्रियाएँ कहते हैं। जैसे :- पोषण, प्रकाश संश्लेषण, श्वसन आदि।

★ हमें परिवहन की जरूरत क्यों है?
- जब हम खाना खाते हैं, तो पाचन के बाद ग्लूकोस, एमीनो अम्ल और वसा अम्ल जैसे पोषक तत्व बनते हैं। फेफड़ों से हमें ऑक्सीजन मिलती है। इन सभी जरूरी चीजों को शरीर की हर एक कोशिका तक पहुँचाना जरूरी है।
- उपापचयी क्रियाओं के कारण शरीर में कुछ हानिकारक और बेकार पदार्थ भी बनते हैं। इन्हें कोशिकाओं से निकालकर बाहर फेंकने वाली जगह तक पहुँचाना जरूरी होता है।

★ परिवहन (Transport of Materials) किसे कहते हैं?
उपयोगी पदार्थों को उनके मूल स्रोत से शरीर की हर कोशिका तक पहुँचाना और हानिकारक पदार्थों को कोशिकाओं से निकालकर गंतव्य स्थान तक पहुँचाने की क्रिया को ही पदार्थों का परिवहन कहते हैं।
★ परिवहन तंत्र (Transport System) क्या है?
जीवों के शरीर में परिवहन (ले जाने और ले आने) का यह पूरा काम करने के लिए जो एक खास सिस्टम या नेटवर्क बना होता है, उसे ही परिवहन तंत्र कहते हैं।
★ पौधों में परिवहन
पौधों में परिवहन दो तरीके से होता है:
- छोटे/एककोशकीय पौधों में :– क्लेमाइडोमोनास (Chlamydomonas), यूग्लीना और सरल शैवालों में परिवहन विसरण द्वारा होता है।
- बड़े/जटिल पौधों में :– विसरण क्रिया से काम नहीं चल पाता, इसलिए इनमें एक खास परिवहन तंत्र होता है। जटिल पौधों में लंबी-लंबी नलिकाएं होती हैं जिन्हें संवहन ऊतक या संवहन-बंडल कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं
- जाइलम (Xylem) – जल-संवाहक ऊतक
- यह जड़ द्वारा सोखे गए जल और खनिज लवण को पत्तियों तक पहुँचाता है।
- इसमें मुख्य रूप से वाहिकाएँ और वाहिनिकाएँ पाई जाती हैं जो नलिका जैसी होती हैं। ये जड़ से पत्ती तक पानी का एक अखंड खंभा बनाती हैं
- फ्लोएम (Phloem) – भोजन का संवाहक
- हरी पत्तियाँ जो प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाती हैं, उसे यह पौधे के हर हिस्से में पहुँचाता है। पौधों में भोजन का स्थानांतरण सुक्रोज (Sucrose) के रूप में होता है।
- इसमें मुख्य रूप से चालनी नलिकाएँ होती हैं, जिनमें छोटे-छोटे छेद होते हैं।

★ जाइलम और फ्लोएम में मुख्य अंतर (Exam Special)
एग्जाम में सीधे नंबर पक्के करने के लिए स्टूडेंट्स को यह टेबल याद करवाएं:
| जाइलम (Xylem) | फ्लोएम (Phloem) |
| • इसकी कोशिकाएँ मृत (Dead) होती हैं। | • इसकी कोशिकाएँ जीवित (Alive) होती हैं। |
| • यह जल एवं खनिज का परिवहन करता है। | • यह पत्तियों में बने खाद्य पदार्थों को पहुँचाता है। |
| • इसमें बहाव सिर्फ नीचे से ऊपर की ओर (एकतरफा) होता है। | • इसमें परिवहन ऊपर और नीचे दोनों तरफ होता है। |

★ पौधों में परिवहन की क्रियाविधि
विकसित पौधों में जल, खनिज लवण और भोजन का परिवहन मुख्य रूप से दो क्रियाओं के कारण होता है
- स्थानांतरण :- इसके द्वारा घुले हुए पदार्थ पौधे के एक अंग से दूसरे अंगों तक आते-जाते हैं।
- वाष्पोत्सर्जन :- पौधे के बाहरी हवा वाले भागों (जैसे पत्तियों) से पानी का भाप बनकर हवा में उड़ना।
Note :- जड़ें मिट्टी से जितना भी पानी सोखती हैं, पौधे अपनी जरूरी क्रियाओं में उसका सिर्फ 10% ही इस्तेमाल करते हैं। बाकी 90% पानी पत्तियों के रास्ते भाप बनकर वायुमंडल में उड़ जाता है।
★ जल का अवशोषण और परिवहन (Water Absorption)
- पौधे मिट्टी से पानी मुख्य रूप से अपने मूलरोमों द्वारा सोखते हैं।
- मिट्टी के पानी का दाब मूलरोम की कोशिकाओं से अधिक होता है, जिससे पानी विसरण द्वारा मूलरोम में घुस जाता है।
- पानी एक कोशिका से दूसरी कोशिका में होते हुए जब जाइलम-वाहिकाओं (Xylem vessels) में पहुँचता है, तो वहाँ एक प्रेशर बनता है। इसे मूलदाब कहते हैं। इसी प्रेशर की वजह से पानी कुछ दूरी तक ऊपर चढ़ जाता है।

★ खनिज लवणों का अवशोषण (Mineral Absorption)
- मिट्टी के पानी में कई तरह के लवण जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि घुले रहते हैं।
- परासरण द्वारा मूलरोम सिर्फ पानी सोख सकते हैं, लवण नहीं।
- इसलिए, खनिज लवणों का अवशोषण आयन (Ions) के रूप में होता है। पौधे अपनी आवश्यकता के अनुसार मूलरोम की कोशिका झिल्ली पर मौजूद खास वाहक पदार्थों की मदद से इन आयनों को अंदर खींचते हैं।

★ स्थानांतरण (Translocation) किसे कहते हैं?
- पौधों में जल, खनिज लवण और खाद्य पदार्थों के बहुत ऊँचाई तक होने वाले संचलन (Movement) को ही स्थानांतरण (Translocation) कहते हैं।
- इस क्रिया को पूरा करने में वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की सबसे बड़ी भूमिका होती है।
★ वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)
- पौधों के हवाई भागों (वायवीय भागों) जैसे पत्तियों से पानी का रंध्रों यानी स्टोमाटा (Stomata) द्वारा भाप बनकर उड़ने की क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।
- यह एक शारीरिक क्रिया है।
Important Points
- एक मकई (Corn) का पौधा रोज लगभग 3 से 4 लीटर पानी हवा में उड़ाता है।
- एक सेब का पेड़ रोज लगभग 10 से 20 लीटर पानी वाष्पोत्सर्जित करता है।
- एक पत्ती अपने वजन के बराबर पानी सिर्फ 1 घंटे से भी कम समय में बाहर निकाल सकती है।
- औसतन एक बड़ा पेड़ अपने पूरे जीवन-काल में अपने कुल भार का लगभग 100 गुना जल वाष्प के रूप में बाहर निकाल देता है।
★ वाष्पोत्सर्जन की क्रियाविधि
- पत्तियों के रंध्रों (Stomata) के पास परासरणी दाब सबसे ज्यादा होता है और अंदर जाइलम के पास सबसे कम।
- इस अंतर (परासरणी प्रवणता) के कारण पत्तियों में रंध्रों से लेकर जाइलम तक एक जल-स्तंभ यानी पानी की अखंड चेन बन जाती है।
- जब तक वाष्पोत्सर्जन चलता रहता है, जाइलम से पानी लगातार ऊपर पत्तियों की तरफ खिंचता रहता है।

★ वाष्पोत्सर्जन का महत्व
एग्जाम के लिए यह सवाल बहुत जरूरी है। इसके मुख्य 3 फायदे हैं:
- पानी को ऊपर खींचना :– यह पौधे की जड़ से लेकर चोटी तक लगातार पानी की धारा बनाए रखता है (जैसे स्ट्रॉ से जूस खींचते हैं)।
- खनिज का परिवहन :– पानी के साथ-साथ मिट्टी से जरूरी खनिज लवणों को सोखने और उन्हें ऊपर तक पहुँचाने में मदद करता है।
- तापमान नियंत्रण :- यह तेज धूप में पौधों का तापमान संतुलित रखने में सहायक होता है (जैसे इंसानों को पसीना आने पर शरीर ठंडा होता है)।

★ कार्यकलाप (Experiment)
- गमले में लगे एक स्वस्थ पौधे की कुछ पत्तियों को प्लास्टिक की एक पारदर्शी थैली से अच्छी तरह ढककर बाँध दें।
- गमले को कुछ देर के लिए धूप में रख दें।
Result :- थोड़ी देर बाद थैली के अंदर पानी की छोटी-छोटी बूंदें जमा मिलेंगी। यह साबित करता है कि पत्तियों के रंध्रों से पानी भाप बनकर बाहर निकल रहा है।

★ खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण क्या है?
- निम्न वर्ग के पौधों (जैसे शैवाल) की हर कोशिका भोजन बना सकती है। लेकिन उच्च वर्ग के पौधों में जड़ें और पुराने तने भोजन नहीं बना सकते; केवल पत्तियाँ और नए (तरुण) तने ही भोजन बनाते हैं। इसलिए भोजन को एक जगह से दूसरी जगह भेजना जरूरी है।
- परिभाषा :– पौधे के एक भाग से दूसरे भाग में खाद्य पदार्थों के जलीय घोल के आने-जाने को ही खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण कहा जाता है।

★ यह परिवहन किस दिशा में होता है?
भोजन और एमीनो अम्ल का परिवहन हमेशा अधिक सांद्रता (जहाँ भोजन ज्यादा है) वाले भाग से कम सांद्रता (जहाँ भोजन कम है) वाले भाग की ओर होता है:
- अधिक सांद्रता वाले भागों को (जहाँ भोजन बनता या जमा रहता है) संभरण-सिरे कहते हैं।
- कम सांद्रता वाले भागों को (जहाँ भोजन का इस्तेमाल होता है) उपभोग-सिरे कहते हैं।
★ फ्लोएम की चालनी नलिकाएँ
- भोजन का स्थानांतरण फ्लोएम की चालनी नलिकाओं द्वारा होता है।
- ये नलिकाएँ आपस में छोटे-छोटे छेदों वाली प्लेट से जुड़ी रहती हैं। इनके साथ सखि कोशिका भी होती है जो इस काम में मदद करती है।
★ जाइलम और फ्लोएम के परिवहन में मुख्य अंतर
बच्चों को आसानी से समझाने के लिए इन दोनों के काम करने के तरीके का अंतर इस प्रकार है:
| जाइलम (Xylem) द्वारा परिवहन | फ्लोएम (Phloem) द्वारा परिवहन |
| • यह एकदिशीय (Unidirectional) होता है, यानी पानी हमेशा जड़ से सिर्फ ऊपर की ओर जाता है। | • यह द्विदिशीय (Bidirectional) होता है, यानी भोजन पत्तियों से नीचे (जड़ की ओर) और संचयी अंगों से ऊपर की ओर भी जा सकता है। |
| • इसे भौतिक बलों (जैसे मूल दाब और वाष्पोत्सर्जन) द्वारा समझा जा सकता है। | • इस स्थानांतरण में पौधे को ऊर्जा (Energy) का उपयोग करना पड़ता है। |
★ जंतुओं में परिवहन
उच्च श्रेणी के जंतुओं में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक तत्व, हार्मोन और बेकार पदार्थों को शरीर में एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए एक खास सिस्टम होता है।
★ रक्त परिसंचरण तंत्र
यह तंत्र मुख्य रूप से 3 अवयवों से मिलकर बनता है:
- रुधिर या रक्त (Blood)
- हृदय (Heart)
- रक्त वाहिनियाँ (Blood vessels) – जैसे धमनी और सिरा
Note :- उच्च श्रेणी के जंतुओं में परिवहन के लिए इस सिस्टम के अलावा एक लसीका तंत्र भी पाया जाता है।

★ रक्त (Blood) और उसकी संरचना
- यह लाल रंग का एक गाढ़ा, क्षारीय पदार्थ है जिसका pH = 7.4 होता है। यह शरीर के सभी ऊतकों को आपस में जोड़ता है, इसलिए इसे तरल संयोजी ऊतक कहते हैं।
- रक्त के दो मुख्य भाग होते हैं:
- तरल भाग :– प्लाज्मा (Plasma)
- ठोस भाग :– रक्त कोशिकाएं (RBC, WBC और प्लेटलेट्स)

(A) प्लाज्मा या प्लाविका
- यह हल्के पीले रंग का चिपचिपा द्रव होता है जो पूरे रक्त का लगभग 55 प्रतिशत भाग बनाता है。
- इसमें करीब 90% जल, 7% प्रोटीन, 0.9% अकार्बनिक लवण, 0.18% ग्लूकोस और 0.5% वसा होती है।
- इसमें फाइब्रिनोजिन, प्रोथ्रोम्बिन और हिपैरिन जैसे मुख्य प्रोटीन होते हैं जो रक्त का थक्का बनाने में मदद करते हैं।
- जब रक्त जमने की क्रिया के दौरान फाइब्रिनोजिन प्रोटीन प्लाज्मा से अलग हो जाता है, तो बचे हुए फाइब्रिनोजिन-रहित प्लाज्मा को सीरम कहते हैं।

(B) ठोस भाग: रक्त कोशिकाएं (Blood Cells)
यह पूरे रक्त का लगभग 45 प्रतिशत भाग होती हैं और ये तीन प्रकार की हैं:
- लाल रक्त कोशिकाएं (RBC या Erythrocytes)
- ये श्वसन गैसों (ऑक्सीजन और CO2) का परिवहन करती हैं।
- इनमें हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) नाम का एक आयरन-युक्त प्रोटीन वर्णक पाया जाता है।
- हीमोग्लोबिन का एक अणु ऑक्सीजन के 4 अणुओं से जुड़ सकता है। यह ऑक्सीजन से जुड़कर एक अस्थायी यौगिक ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है और कोशिकाओं में जाकर टूट जाता है। इसी तरह CO2 से मिलकर यह कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है जिसे फेफड़े बाहर निकाल देते हैं।
- मनुष्य और अन्य स्तनधारियों की RBC में न्यूक्लियस (केंद्रक) नहीं होता।
- श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBC या Leucocytes)
- ये अनियमित आकार की और केंद्रक (Nucleus) युक्त कोशिकाएं होती हैं।
- इनमें हीमोग्लोबिन नहीं होता, इसलिए ये रंगहीन (सफेद) होती हैं।
- इनकी संख्या लाल रक्त कोशिकाओं की तुलना में बहुत कम होती है। (यह शरीर को बीमारियों से बचाती हैं) ।
- रक्त पट्टिकाणु (Blood Platelets या Thrombocytes)
- इन्हें ‘बिंवाणु’ या थ्रोम्बोसाइट्स भी कहा जाता है।
- इनका मुख्य काम चोट लगने पर रक्त का थक्का बनाने में सहायता करना है ताकि ज्यादा खून न बहे।

★ मनुष्य का हृदय (Human Heart)
- हृदय एक अत्यंत कोमल और मांसल रचना है जो दोनों फेफड़ों के बीच वक्षगुहा (Thoracic cavity) में स्थित होती है. यह हृद्-पेशियों का बना होता है.
- यह हमारे शरीर का केंद्रीय पंप अंग है, जो खून पर दबाव बनाकर उसे पूरे शरीर में परिसंचरित करता है.
- इसका आकार तिकोना होता है। इसका चौड़ा भाग आगे और सँकरा भाग पीछे होता है, तथा यह बाईं तरफ झुका होता है.
★ हृदयावरण या पेरीकार्डियम
- हृदय पेरीकार्डियम नाम की एक दोहरी झिल्ली के अंदर बंद रहता है.
- इन दोनों झिल्लियों के बीच की खाली जगह को पेरीकार्डियल गुहा कहते हैं, जिसमें पेरीकार्डियल द्रव भरा रहता है.
- यह हृदय को बाहरी झटकों (आघातों) से बचाता है और धड़कन के समय होने वाले घर्षण (Friction) को रोकता है.

★ हृदय की आंतरिक रचना
मनुष्य के हृदय में चार वेश्म होते हैं:
- अलिंद :- हृदय के चौड़े अग्रभाग में दायाँ अलिंद और बायाँ अलिंद होते हैं. ये दोनों अंतराअलिंद भित्ति द्वारा अलग रहते हैं. इनकी दीवार पतली होती है.
- निलय :- हृदय के सँकरे पश्चभाग में दायाँ निलय और बायाँ निलय होते हैं. ये दोनों अंतरानिलय भित्ति द्वारा अलग रहते हैं. निलय की दीवार अपेक्षाकृत ज्यादा मोटी होती है.

★ हृदय के वाल्व या कपाट (Valves)
खून का बहाव सही दिशा में रखने और उसे वापस उलटा बहने से रोकने के लिए हृदय में कपाट होते हैं:
- त्रिदली कपाट :- यह दायाँ अलिंद-निलय छिद्र पर होता है. यह रक्त को दाएं अलिंद से दाएं निलय में जाने देता है, पर वापस नहीं आने देता.
- द्विदली कपाट :- यह बायाँ अलिंद-निलय छिद्र पर होता है. यह रक्त को बाएं अलिंद से बाएं निलय में जाने देता है, पर विपरीत दिशा में वापस नहीं जाने देता.

★ अर्धचंद्राकार वाल्व
-
- फुफ्फुस चाप पर :– दाएं निलय से निकलने वाली फुफ्फुस चाप के उद्गम पर तीन अर्धचंद्राकार वाल्व होते हैं, जो रक्त को केवल फेफड़ों की ओर (फुफ्फुस धमनियों में) जाने देते हैं.
- महाधमनी पर :– बाएं निलय के कोने से निकलने वाली महाधमनी (Aorta) के उद्गम पर भी तीन अर्धचंद्राकार वाल्व होते हैं, जो रक्त को केवल महाधमनी की ओर जाने देते हैं ताकि खून पूरे शरीर में जा सके.

★ हृदय की क्रियाविधि
हृदय का मुख्य काम शरीर के अशुद्ध खून को फेफेड़ों में भेजकर शुद्ध करना और फिर शुद्ध खून को पूरे शरीर में पंप करना है. यह पूरा काम हृदय की मांसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने से होता है.
- सिस्टोल :- हृदय के वेश्मों के सिकुड़न को सिस्टोल कहते हैं.
- डायस्टोल :- हृदय के वेश्मों के शिथिलन को डायस्टोल कहते हैं.
★ हृदय की धड़कन (Heartbeat)
एक सिस्टोल और एक डायस्टोल मिलकर हृदय की एक धड़कन कहलाती है. दोनों अलिंद और दोनों निलय कभी भी एक साथ नहीं सिकुड़ते
★ रक्त का मार्ग और हृदय चक्र
- अशुद्ध खून का आना :– शरीर के विभिन्न भागों से अशुद्ध रक्त दो अग्र महाशिराओं और एक पश्च महाशिरा द्वारा दाएँ अलिंद में पहुँचता है
- शुद्ध खून का आना :– ठीक इसी समय फेफड़ों से शुद्ध (ऑक्सीजनित) रक्त फुफ्फुस शिराओं द्वारा बाएँ अलिंद में आता है.
- निलय में प्रवेश :– जब दोनों अलिंद सिकुड़ते हैं, तो दाएँ अलिंद का अशुद्ध खून दाएँ निलय में और बाएँ अलिंद का शुद्ध खून बाएँ निलय में चला जाता है.
- पंप होना :– इसके बाद जब दोनों निलय सिकुड़ते हैं, तो त्रिदली और द्विदली कपाट बंद हो जाते हैं. दाएँ निलय का अशुद्ध खून फुफ्फुस धमनियों के द्वारा फेफड़ों में शुद्ध होने चला जाता है और बाएँ निलय का शुद्ध खून महाधमनी (Aorta) द्वारा पूरे शरीर में पंप हो जाता है.

★ द्विगुण परिवहन और हृद् चक्र
- द्विगुण परिवहन :- शरीर में परिवहन के एक चक्र को पूरा करने के लिए रक्त हृदय से होकर दो बार गुजरता है. इसलिए इसे द्विगुण परिवहन कहते हैं.
- हृद् चक्र :- हृदय में रक्त का भरना और फिर उसका बाहर निकलना हृद् चक्र कहलाता है
★ रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels)
शरीर में रक्त के परिसंचरण के लिए तीन प्रकार की रक्त वाहिनियाँ होती हैं:
- धमनियाँ (Arteries)
- शिराएँ (Veins)
- रक्त केशिकाएँ (Blood capillaries)
धमनियाँ और शिराएँ आपस में रक्त केशिकाओं के द्वारा ही जुड़ी होती हैं.
★ धमनियाँ
- ये शुद्ध या ऑक्सीजनित रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न भागों में ले जाती हैं.
- फुफ्फुस धमनी एकमात्र ऐसी धमनी है जो अशुद्ध रक्त को फेफड़ों से हृदय में ले जाती है.
- इनकी दीवारें मोटी, लचीली तथा कपाटहीन (बिना वाल्व वाली) होती हैं.
- शरीर के अंगों में पहुँचकर धमनियाँ बँटकर धमनिकाएँ बनाती हैं, जो आगे जाकर पतली केशिकाओं में बदल जाती हैं.
★ शिराएँ
- ये शरीर के विभिन्न अंगों से अशुद्ध या विऑक्सीजनित रक्त को वापस हृदय की ओर ले आती हैं.
- फुफ्फुस शिराएँ अपवाद हैं, जो शुद्ध या ऑक्सीजनित रक्त को फेफड़ों से हृदय में लाती हैं.
- शिरा की दीवार धमनी की तुलना में पतली होती है.
- अधिकांश शिराओं में अंदर कपाट लगे होते हैं, जो रक्त को केवल हृदय की ओर ही जाने देते हैं (उल्टा बहने से रोकते हैं)
- अंगों से बारीक शिरिकाएँ (Venules) आपस में जुड़कर बड़ी शिरा का निर्माण करती हैं.
★ रक्त केशिकाएँ
- ये अत्यंत महीन (पतली) रक्त नलिकाएँ हैं, जिनकी दीवार चपटी एपिथीलियम के सिर्फ एक स्तर की बनी होती है.
- इनकी दीवार पारगम्य (Permeable) होती है. इसी कारण पानी, पचा हुआ भोजन और ऑक्सीजन रक्त से निकलकर ऊतकों में चले जाते हैं, और हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड व उत्सर्जी पदार्थ वापस रक्त में आ जाते हैं.

★ लसीका या लिम्फ
- जब रक्त केशिकाओं में बहता है, तो रक्त-प्लाज्मा का कुछ भाग छनकर कोशिकाओं के बीच खाली जगहों में पहुँच जाता है. इस ऊतक द्रव को ही लसीका या लिम्फ कहते हैं.
- लसीका रंगहीन या हल्के पीले रंग का द्रव होता है.
- लसीका में श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC) तो पाई जाती हैं, लेकिन लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC) नहीं पाई जातीं.
- मुख्य काम:
- यह कोशिकाओं के बीच ऑक्सीजन, पचे भोजन और हार्मोन का विसरण करने में मदद करता है.
- यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल और उत्सर्जी पदार्थों को वापस समेटता है.
- रक्त की तुलना में लसीका में प्रोटीन की मात्रा कम होती है.

★ धमनी और शिरा में अंतर
| धमनी (Artery) | शिरा (Vein) |
| • यह शुद्ध रक्त ले जाती है (फुफ्फुस धमनी को छोड़कर). | • यह अशुद्ध रक्त ले जाती है (फुफ्फुस शिरा को छोड़कर). |
| • इसकी दीवार मोटी और लचीली होती है. | • इसकी दीवार पतली होती है. |
| • इसमें कपाट (Valves) नहीं होते. | • इसमें रक्त को एक तरफ ले जाने वाले कपाट होते हैं. |
| • यह रक्त को हृदय से अंगों की ओर ले जाती है. | • यह रक्त को अंगों से वापस हृदय की ओर लाती है. |
★ रक्तचाप (Blood Pressure)
- हृदय एक केंद्रीय पंप अंग की तरह काम करता है, जो पूरे शरीर की धमनियों और शिराओं में रक्त का संचार कराने के लिए उस पर दबाव डालता है.
- शिराओं की तुलना में धमनियों के रक्त पर यह दबाव कहीं ज़्यादा होता है.
- महाधमनी एवं उनकी मुख्य शाखाओं में रक्त प्रवाह के दबाव को ही रक्तचाप कहते हैं.

★ रक्तचाप के दो मुख्य प्रकार
यह दबाव हृदय के वेश्मों के सिकुड़ने (सिस्टोल) और फैलने (डायस्टोल) के कारण बनता है:
- सिस्टोलिक प्रेशर (Systolic Pressure):
-
- यह दबाव निलयों के संकुचन (सिकुड़ने) से उत्पन्न होता है.
- एक स्वस्थ व्यक्ति में यह 120 mm पारे (Hg) के स्तंभ द्वारा उत्पन्न दाब के बराबर होता है.
- डायस्टोलिक प्रेशर (Diastolic Pressure):
- यह दबाव निलय के शिथिलन (फैलने) के समय उत्पन्न होता है, जब रक्त अलिंद से निलय में प्रवेश करता है.
- एक स्वस्थ व्यक्ति में यह 80 mm पारे (Hg) के स्तंभ द्वारा उत्पन्न दाब के बराबर होता है.

★ सामान्य रक्तचाप
एक स्वस्थ व्यक्ति का सामान्य स्थिति में सिस्टोलिक/डायस्टोलिक प्रेशर 120/80 होता है. अलग-अलग व्यक्तियों में उम्र, लिंग, आनुवंशिकता, शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के कारण रक्तचाप अलग-अलग हो सकता है.
★ रक्तचाप की माप (Measurement)
- रक्तचाप को मापने के लिए एक विशेष उपकरण का उपयोग किया जाता है, जिसे रक्त दाबमापी या स्फिग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) कहते हैं.
★ हाइपरटेंशन – उच्च रक्तचाप
- सामान्य से अधिक उच्च रक्तचाप की स्थिति को हाइपरटेंशन कहते हैं, जो किसी रोग, मानसिक चिंता या उत्सुकता आदि के कारण हो सकता है.
- हाइपरटेंशन के नुकसान:
- इस अवस्था में कभी-कभी रक्त वाहिनियाँ फट जाती हैं, जिससे आंतरिक रक्तस्राव होने लगता है.
- इसके कारण कभी-कभी हृदयाघात (Heart stroke) भी हो जाता है.
- मस्तिष्क की रक्त कोशिकाएँ फटने से वहाँ ऑक्सीजन और पोषण उचित मात्रा में नहीं मिल पाता, जिससे मस्तिष्क सामान्य रूप से काम करना बंद कर देता है.
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