Bihar Board History Chapter 2 Notes Class 10th || समाजवाद एवं साम्यवाद कक्षा 10वीं

Bihar Board History Chapter 2 Notes Class 10th

History ( इतिहास )    Bihar Board

Class 10th     Chapter 2

Full Chapter Explanation & Notes

समाजवाद एवं साम्यवाद

 

समाजवाद क्या है?

  • परिभाषा :- समाजवाद एक ऐसी सोच या विचारधारा है जो समाज में अमीर-गरीब के भेदभाव को खत्म करना चाहती है।
  • मुख्य उद्देश्य :- यह एक ऐसी व्यवस्था चाहती है जहाँ शोषन न हो (शोषण-मुक्त समाज) और सभी को बराबरी का अधिकार मिले।
  • खासियत :- इसमें कारखानों और उत्पादन के साधनों पर किसी एक व्यक्ति (निजी स्वामित्व) का हक नहीं होता, बल्कि पूरे समाज या सरकार का अधिकार होता है। इसका मकसद निजी मुनाफे के बदले पूरे समाज का कल्याण करना होता है।

 

समाजवाद की उत्पत्ति कैसे हुई?

  • औद्योगिक क्रांति: 18वीं-19वीं शताब्दी में जब बड़े-बड़े कारखाने और मशीनें आयीं, तब इस विचारधारा का जन्म हुआ। मशीनों के आने से पुराने छोटे कुटीर उद्योग-धंधे बंद हो गए और बड़े पैमाने पर उद्योगों का मशीनीकरण शुरू हुआ। औद्योगिक क्रांति के कारण समाज साफ-साफ दो हिस्सों में बँट गया:
  1. पूँजीपति वर्ग :- जो मिल-मालिक थे, अमीर थे और जिनका मुख्य मकसद सिर्फ अपना फायदा कमाना था।
  2. श्रमिक वर्ग (मजदूर) :- जो कारखानों में दिन-रात काम करते थे, पर उनकी स्थिति नर्क जैसी थी। उन्हें न कोई अधिकार था और न ही सही मजदूरी मिलती थी। वे पूरी तरह पूँजीपतियों की दया पर निर्भर थे।

 

प्रमुख समाजवादी विचारक

जब मजदूरों का शोषण बहुत बढ़ गया, तब उनके हक में आवाज उठाने के लिए कुछ बड़े विचारक, लेखक और राष्ट्र-भक्त सामने आए। जिसमे मुख्य नाम इस प्रकार है

  • सेन्ट साइमन
  • फोरियर
  • लुई ब्लां
  • रॉबर्ट ओवन
  • कार्ल मार्क्स एवं एंगेल्स (इन्होंने आधुनिक आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की और नए सिद्धांत दिए)।

 

आधुनिक समाजवाद का विभाजन

ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक समाजवाद को दो मुख्य चरणों (भागों) में बाँटा गया है:

  • (क) मार्क्स से पूर्व का समाजवाद
    • इस विचारधारा को मानने वालों को यूटोपियन‘ (स्वप्नदर्शी या आदर्शवादी) कहा जाता है।
    • इनकी दृष्टि आदर्शवादी थी पर उनके कार्यक्रम अव्यावहारिक (जो आसानी से लागू न हो सके) थे।
    • इनमें से अधिकतर विचारक फ्रांस के थे, जो क्रांति या लड़ाई के बदले शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास रखते थे। ये वर्ग-संघर्ष (लड़ाई) के बदले सभी वर्गों के बीच आपसी तालमेल (वर्ग-समन्वय) के हिमायती थे।
  • (ख) मार्क्स के पश्चात् का समाजवाद
    • इसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है, जिसकी शुरुआत कार्ल मार्क्स ने की थी।

 

यूटोपियन समाजवादी

सेंट साइमन (Saint Simon)

  • यह एक फ्रांसीसी विचारक था, जिसने समाजवादी विचारधारा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे प्रथम यूटोपियन समाजवादी माना जाता है।
  • इसका मानना था कि राज्य और समाज का संगठन ऐसा होना चाहिए जहाँ लोग एक-दूसरे का शोषण करने के बजाय मिलजुलकर प्रकृति का दोहन (उपयोग) करें।
  • समाज को निर्धन (गरीब) वर्ग के भौतिक और नैतिक उत्थान (भलाई) के लिए कार्य करना चाहिए।
  • इसने घोषित किया — ‘प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार’ आगे चलकर यही समाजवाद का मूलभूत नारा बना।

 

चार्ल्स फौरियर (Charles Fourier)

  • यह भी एक महत्वपूर्ण यूटोपियन विचारक था।
  • यह आधुनिक औद्योगिकवाद का विरोधी था।
  • इसका मानना था कि श्रमिकों को छोटे नगरों अथवा कस्बों में काम करना चाहिए। इसने किसानों के लिए ‘एक फलांग्स’ बनाए जाने की योजना रखी, परंतु यह योजना असफल रहा

 

लुई ब्लां (Louis Blanc)

  • फ्रांसीसी यूटोपियन चिंतकों में यह एकमात्र व्यक्ति था जिसने राजनीति में भी हिस्सा लिया
  • इसके सुधार कार्यक्रम अधिक व्यावहारिक थे। इसका मानना था कि आर्थिक सुधारों को प्रभावशाली बनाने के लिए पहले राजनीतिक सुधार आवश्यक हैं

 

रॉबर्ट ओवन (Robert Owen)

  • फ्रांस से बाहर का सबसे महत्वपूर्ण यूटोपियन चिंतक, जो एक ब्रिटिश उद्योगपति था।
  • इसने स्कॉटलैंड के ‘न्यू लूनार्क’ नामक स्थान पर एक फैक्ट्री की स्थापना की।
  • इस फैक्ट्री में उसने श्रमिकों को अच्छी वैतनिक सुविधाएँ (अच्छा वेतन और सुविधाएँ) प्रदान कीं।
  • ऐसा करने पर उसने महसूस किया कि उसका मुनाफा कम होने के बजाय और बढ़ गया था। अतः वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि “संतुष्ट श्रमिक ही वास्तविक श्रमिक है”

 

यूटोपियन चिंतकों की मुख्य विशेषताएँ और योगदान

  • इन सभी चिंतकों ने प्रबुद्ध चिंतकों की तरह मानव की मूलभूत अच्छाई और जगत की पूर्णता में विश्वास किया।
  • इन्होंने वर्ग-संघर्ष के बदले वर्ग-समन्वय (आपसी तालमेल) पर बल दिया।
  • ये ऐसे आरंभिक चिंतक थे जिन्होंने पूँजी और श्रम के बीच संबंधों की समस्या का निवारण करने का प्रयास किया।
  • कार्ल मार्क्स ने इनकी विफलता से सबक लिया और फिर वह इनसे आगे बढ़ गया।

 

कार्ल मार्क्स

  • इनका जीवन काल 1818 से 1883 ई० तक रहा
  • इसका जन्म 5 मई, 1818 ई० को जर्मनी में राइन प्रांत के ट्रियर नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था।
  • इनके पिता हेनरिक मार्क्स, जो एक प्रसिद्ध वकील थे (इन्होंने बाद में चलकर ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था)।
  • शिक्षा की प्राप्ति इन्होंने वोन विश्वविद्यालय में विधि (कानून) की शिक्षा ग्रहण की, परन्तु 1836 में वे बर्लिन विश्वविद्यालय लौट आये, जहाँ उनके जीवन को एक नया मोड़ मिला।
  • मार्क्स हीगेल के विचारों से बहुत प्रभावित थे। इसके अलावा उन्होंने राजनीतिक एवं सामाजिक इतिहास पर मांतेस्क्यू तथा रूसो के विचारों का भी गहन अध्ययन किया।
  • विवाह इन्होने 1843 में अपने बचपन की मित्र जेनी से विवाह किया।
  • एंगेल्स से मित्रता :- पेरिस में 1844 ई० में उनकी मुलाकात फ्रेडरिक एंगेल्स से हुई, जिससे जीवन भर उनकी गहरी मित्रता बनी रही। एंगेल्स के विचारों एवं रचनाओं से प्रभावित होकर मार्क्स ने भी श्रमिक वर्ग के कष्टों एवं उनकी कार्य की दशाओं पर गहन विचार करना आरंभ कर दिया।

 

महत्वपूर्ण पुस्तकें एवं रचनाएँ

  • मार्क्स ने एंगेल्स के साथ मिलकर 1848 ई० में इसे प्रकाशित किया। इसे “आधुनिक समाजवाद का जनक” कहा जाता है। इसमें मार्क्स ने अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है।
  • दास-कैपिटल (Das Kapital) की रचना 1867 ई० में मार्क्स ने की, जिसे “समाजवादियों की बाइबिल” कहा जाता है। मार्क्स विश्व के उन गिने-चुने चिंतकों में से एक हैं जिन्होंने इतिहास की धारा को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।

 

कार्ल मार्क्स के 5 मुख्य सिद्धांत

मार्क्स के अनुसार मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  1. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत :- दुनिया विचारों या भगवान से नहीं, बल्कि पैसा और संपत्ति (भौतिक चीजों) से चलती है।
  2. वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत :- इतिहास हमेशा से अमीर (मालिक) और गरीब (मजदूर) के बीच की लड़ाई की कहानी है।
  3. इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या :- इतिहास में हर बड़ा बदलाव राजाओं के कारण नहीं, बल्कि कमाई और उत्पादन के तरीकों के बदलने से हुआ है।
  4. मूल्य एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत :- कारखाने का पूरा मुनाफा मजदूर की मेहनत से आता है, जिसे मालिक धोखे से खुद रख लेता है।
  5. राज्यहीन व वर्गहीन समाज की स्थापना :- मार्क्स एक ऐसा समाज चाहते थे जहाँ न कोई अमीर-गरीब का भेद हो और न ही दबाने वाली सरकार हो।

 

ऐतिहासिक भौतिकवाद (इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या)

  • मार्क्स के अनुसार, इतिहास उत्पादन के साधन पर नियंत्रण के लिए दो वर्गों के बीच चल रहे निरंतर संघर्ष की कहानी है
  • इतिहास की प्रत्येक घटना एवं परिवर्तन के मूल में आर्थिक शक्तियाँ हैं। उत्पादन प्रणाली के प्रत्येक परिवर्तन के साथ सामाजिक संगठन में भी परिवर्तन हुआ है।
  • मार्क्स के अनुसार इतिहास के पाँच चरण अब तक दिखाई दे चुके है और छठा चरण आने वाला है। ये छह ऐतिहासिक चरण निम्नलिखित हैं
  • आदिम साम्यवादी युग :- शुरुआत का वह समय जब कोई अमीर-गरीब नहीं था और सब कुछ सबका था
  • दासता का युग :- वह समय जब समाज ‘मालिक’ और ‘दास’ (गुलाम) में बँटा था, जहाँ इंसानों को खरीदा-बेचा जाता था।
  • सामन्ती युग :- वह समय जब राजाओं के नीचे ‘जमींदार’ (सामंत) होते थे और वे गरीब किसानों से खेती करवाकर उनका शोषण करते थे।
  • पूँजीवादी युग :- वर्तमान समय, जहाँ बड़े-बड़े ‘मिल-मालिक’ (पूँजीपति) हैं और वे कारखाने के मजदूरों का शोषण करते हैं।
  • समाजवादी युग :- वह समय (क्रांति के बाद) जब कारखानों और जमीन पर से अमीरों का अधिकार खत्म हो जाएगा और मजदूरों का राज होगा
  • साम्यवाद युग :- इतिहास का आखिरी चरण, जब दुनिया से अमीर-गरीब का भेद पूरी तरह मिट जाएगा और सब बराबर हो जाएँगे।

 

मार्क्स तथा प्रथम अंतर्राष्ट्रीय संघ (First International)

  • 1864 ई० में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय संघ की स्थापना हुई। यह समाजवादी आंदोलन के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी।
  • इस संघ की स्थापना का पूरा श्रेय कार्ल मार्क्स को जाता है।
  • उन्होंने अपने भाषण में मजदूरों से कहा कि — वे अपनी मुक्ति स्वयं ही और अपने प्रयत्नों द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं।
  • जब तक उत्पादन के साधनों का मालिकाना हक व्यक्तिगत (प्राइवेट) हाथों में है, तब तक मशीनों के सुधार, उद्योगों में विज्ञान के प्रयोग या किसी भी सुधार से श्रमिकों की स्थिति बेहतर नहीं हो सकती।
  • मार्क्स के अनुसार मजदूरों का अंतिम लक्ष्य पूँजीवाद का विनाश होना चाहिए।
  • कार्ल मार्क्स  का सबसे खतरनाक नारा — ‘अधिकार के बिना कर्त्तव्य नहीं और कर्त्तव्य के बिना अधिकार नहीं’

 

द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय संघ (Second International)

  • 14 जुलाई 1889 ई० को पेरिस में एक सम्मेलन हुआ।
  • इसमें 20 देशों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
  • इस संघ की स्थापना इस बात का प्रतीक (द्योतक) थी कि मार्क्सवादी समाजवाद बहुत तेजी से फैल रहा है।
  • सम्मेलन के मुख्य निर्णय:
  1. प्रत्येक वर्ष 1 मई का दिन ‘मजदूर वर्ग की एकता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा।
  2. मजदूरों के लिए 8 घंटे के कार्य-दिवस की माँग तय की गई (यानी काम करने का समय 8 घंटे तय हो)।
  3. इसका अंतर्राष्ट्रीय सचिवालय ब्रूसेल्स में स्थापित किया गया।
  • 1 मई 1890 ई० को पूरे यूरोप और अमेरिका में लाखों मजदूरों ने हड़ताल और प्रदर्शन किया। तब से 1 मई को पूरे संसार में ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

 

समाजवादी आंदोलन का निष्कर्ष

  • इस आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत आधार मिला।
  • इससे श्रमिकों में विश्वास और आशा का संचार हुआ कि इतिहास उनकी तरफ है तथा भविष्य में एक ऐसे संसार का निर्माण होना है, जो शोषण एवं उत्पीड़न से पूरी तरह मुक्त होगा।

 

1917 की बोल्शेविक क्रांति

  • बीसवीं शताब्दी के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना रूस की क्रांति थी। यह क्रांति सही मायनों में नवंबर 1917 ई० में सम्पन्न हुई। इस क्रांति से रूस के सम्राट यानी जार (जार निकोलस II) के एकतंत्रीय निरंकुश शासन का अंत किया।
    • इसने सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में कुलीनों (जन्म से अमीर), पूँजीपतियों और जमींदारों की शक्ति को खत्म किया।
    • इसके द्वारा मजदूरों और किसानों की सत्ता स्थापित हुई।
    • इसने विश्व में सर्वप्रथम सर्वहारा वर्ग की सत्ता की स्वीकृति का प्रयास किया और साम्यवाद का आदर्श उपस्थित किया।

 

बोल्शेविक क्रांति के प्रमुख कारण

(1) जार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन:

  • 1917 से पूर्व रूस में रोमनोव-राजवंश का शासन था और रूस के सम्राट को ‘जार’ कहा जाता था।
  • जिस समय क्रांति हुई, उस समय जार निकोलस II का शासन था। वह राजा के ‘दैवी अधिकारों’ में विश्वास रखता था और उसे आम लोगों के सुख-दुख की कोई चिंता नहीं थी।
  • जार की अफसरशाही अस्थिर, जड़ और अकुशल थी, जहाँ नियुक्ति का आधार योग्यता नहीं था। गलत सलाहकारों के कारण जार की स्वेच्छाचारिता बढ़ती गई और जनता की स्थिति  बेकार होती गई।

(2) कृषकों की दयनीय स्थिति:

  • रूस में जनसंख्या का बहुसंख्यक (सबसे बड़ा) भाग किसान ही थे, पर उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी।
  • 1861 ई० में जार अलेक्जेंडर द्वितीय द्वारा ‘कृषि दासता’ समाप्त की गई थी, लेकिन इससे किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
  • किसानों के खेत बहुत छोटे-छोटे थे जिन पर वे पुराने ढंग से खेती करते थे। उनके पास पूँजी की कमी थी और वे करों (Taxes) के बोझ से दबे थे। अतः उनके पास क्रांति के सिवाय कोई रास्ता नहीं था।

(3) मजदूरों की दयनीय स्थिति:

  • रूस में मजदूरों को अधिक काम करना पड़ता था, परंतु उनकी मजदूरी काफी कम थी। उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था और उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। की वे अपनी मांगों के लिए हड़ताल भी नहीं कर सकते थे।
  • मार्क्स का यह कथन मजदूरों की स्थिति को सही दर्शाता है कि — “मजदूरों के पास सिवाय अपनी बेड़ियों के खोने के लिए कुछ भी नहीं है।”

(4) औद्योगीकरण की समस्या:

  • रूसी औद्योगीकरण पश्चिमी देशों से अलग था। यहाँ कुछ ही क्षेत्रों में उद्योगों का संकेंद्रण था और राष्ट्रीय पूँजी का अभाव था।
  • उद्योगों के विकास के लिए रूस विदेशी पूँजी पर निर्भर था। विदेशी पूँजीपति आर्थिक शोषण को बढ़ावा दे रहे थे, जिससे चारों ओर असंतोष व्याप्त था।

(5) रूसीकरण की नीति:

  • सोवियत रूस विभिन्न राष्ट्रीयताओं का देश था, जहाँ अधिकतर स्लाव जाति के लोग रहते थे। इनके अतिरिक्त फिन, पोल, जर्मन, यहूदी आदि अन्य जातियां भी थीं जो अलग-अलग भाषाएं बोलती थीं और जिनके रस्म-रिवाज अलग थे।
  • जार निकोलस द्वितीय द्वारा ‘रूसीकरण की नीति’ जारी की गई, जिसके तहत देश के सभी लोगों पर रूसी भाषा, शिक्षा और संस्कृति लादने का प्रयास किया गया। इससे अल्पसंख्यकों में हलचल मच गई।
  • 1863 ई० में इस नीति के विरुद्ध जब पोलो (Poles) ने विद्रोह किया, तो उनका निर्दयतापूर्वक दमन किया गया। इससे रूसी राजतंत्र के प्रति जनता का आक्रोश लगातार बढ़ता चला गया

6. विदेशी घटनाओं का प्रभाव

  • (i) क्रीमिया के युद्ध में रूस की पराजय (हार) हुई, जिसने रूस में सुधारों के युग को आरम्भ किया।
  • (ii) जापान से पराजय तथा 1905 की क्रांति:
    • 1904-05 के रूस-जापान युद्ध में रूस एक छोटे से एशियाई देश (जापान) से बुरी तरह हार गया। जारशाही अपनी पुरानी विफलताएं जनता से छुपा रही थी, पर रूस इस हार को छु-पाना नामुमकिन था।
    • खूनी रविवार (Bloody Sunday) :- 9 जनवरी 1905 को रूस की आम जनता ‘रोटी दो’ के नारे के साथ सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए सेंट पीटर्सबर्ग स्थित महल की ओर जा रहा था। तब बिना सोचे विचारे जार की सेना ने इन निहत्थे लोगों पर गोलियाँ बरसाईं, जिसमें हजारों लोग मारे गए। इसीलिए इसे खुनी रविवार कहा जाता है
    • 22 जनवरी को (पुराने कैलेंडर में 9 जनवरी 1905) इसी कारण ‘खूनी रविवार’ (लाल रविवार) के नाम से जाना जाता है। इस नरसंहार से पूरे रूस में सनसनी फैल गई और इसमें किसानों की व्यापक भागीदारी हुई।
    • ड्यूमा (Duma) का गठन :- अंत में सरकार झुक गई और 1905 ई० में एक प्रतिनिध्यात्मक संस्था ‘ड्यूमा’ (रूसी संसद) का गठन हुआ। परंतु 1906 ई० तक क्रांति कमजोर होते ही जार ने ड्यूमा के अधिकार छीन लिए। परन्तु 1905 की क्रांति विफल रही, लेकिन 1905 की क्रांति के कारण ही 1917 की महान क्रांति की नींव रखी।

7. रूस में मार्क्सवाद का प्रभाव तथा बुद्धिजीवियों का योगदान

  • क्रांति से पूर्व रूस में वैचारिक क्रांति लाने वाले चिंतक और उनकी रचनाएं: लियो टॉल्स्टॉय (रचना — वार एंड पीस और दोस्तोवस्की और तुर्गनेव
  • पार्टियों का गठन और विभाजन:
    • रशियन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी :- रूस का पहला साम्यवादी प्लेखानोव था, जो जारशाही को समाप्त कर साम्यवाद लाना चाहता था। उसने 1898 ई० में इस पार्टी की स्थापना की।
    • पार्टी में फूट (1903 ई०) :- साधन और अनुशासन के मुद्दे पर पार्टी दो दलों में बट गई:
  1. बोल्शेविक (Bolshevik) :- बहुमत वाला दल (ज्यादा संख्या वाला)। ये सर्वहारा क्रांति के पक्षधर थे।
  2. मेंशेविक (Menshevik) :- अल्पमत वाला दल (कम संख्या वाला)। ये मध्यवर्गीय क्रांति के पक्षधर थे।
    • सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी :- इसका गठन 1901 ई० में हुआ, जो मुख्य रूप से किसानों की माँगों को उठाती थी।

8. तात्कालिक कारण — प्रथम विश्व युद्ध में रूस की पराजय

  • प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 ई० तक चला। रूस इसमें मित्र राष्ट्रों की ओर से शामिल हुआ। जार का एकमात्र उद्देश्य यह था कि रूसी जनता आंतरिक असंतोष भूलकर बाहरी मामलों में उलझ जाए।
  • युद्ध में चारों तरफ रूसी सेनाओं की हार हो रही थी। सैनिकों के पास न अच्छे हथियार थे और न ही पर्याप्त भोजन।
  • युद्ध के बीच जार निकोलस II ने सेना की कमान अपने हाथों में ले ली और वह खुद युद्ध पर चला गया। इसके परिणामस्वरूप दरबार खाली हो गया और जार की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी जरीना और उसके तथाकथित गुरु रासपुटिन (एक पादरी) को षड्यंत्र करने का मौका मिल गया, जिससे राजतंत्र की प्रतिष्ठा और गिर गई।

 

सर्वहारा वर्ग क्या है?

समाज का वैसा वर्ग जिसमें किसान, मजदूर एवं आम गरीब लोग शामिल हैं जिनके पास अपनी कोई निजी पूँजी सम्पति नहीं होती थी

 

मार्च की क्रांति

  • 7 मार्च 1917 ई० को (पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 22 फरवरी, 1917) पेट्रोग्राद (वर्तमान लेनिनग्राद) की सड़कों पर किसान-मजदूरों ने जुलूस निकाला और “रोटी दो” के नारे लगाए।
  • “अगले दिन 8 मार्च को कपड़े की फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिला मजदूरों ने ‘रोटी’ (भोजन) की मांग को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। देखते ही देखते दूसरी फैक्ट्रियों के मजदूर भी उनके साथ इस हड़ताल में शामिल हो गए और सभी मजदूर हाथों में क्रांति का प्रतीक लाल झंडा लेकर सड़कों पर जुलूस निकालने लगे।
  • “जब सेना की एक टुकड़ी को आंदोलन कर रहे, भीड़ पर गोली चलाने का आदेश मिला, तो सैनिकों ने मना कर दिया जिसके कारण उनसे हथियार छीन लिए”
  • जार की सबसे विश्वस्त टुकड़ी ‘प्रैओब्राशेंसकी रेजीमेंट’ ने भी विद्रोह कर दिया। सैनिकों का विद्रोह लगातार बढ़ता गया।

 

जारशाही का अंत और नई सरकार का गठन

  • फलतः विवश होकर 12 मार्च 1917 को जार ने गद्दी त्याग दी। पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार यह घटना 27 फरवरी 1917 को हुई थी, इसलिए इसे ‘फरवरी की रूसी क्रांति’ भी कहा जाता है। इसके साथ ही रूस पर से रोमनोव-वंश का निरंकुश जारशाही शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
  • जारशाही के अंत के बाद सर्वप्रथम लोबाव के नेतृत्व में 15 मार्च को एक बुर्जुआ सरकार का गठन हुआ
  • रूसी लोगों की आकांक्षा सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आर्थिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता भी थी। यह बुर्जुआ सरकार तात्कालिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थी, जिसके कारण अंत में यह गिर गई।
  • बुर्जुआ सरकार के गिरने के बाद केरेन्सकी के नेतृत्व में एक उदार समाजवादियों की सरकार गठित हुई

 

केरेन्सकी सरकार के मुख्य उद्देश्य

इस सरकार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:

  1. जनतांत्रिक एवं वैधानिक सरकार की स्थापना करना।
  2. मित्रराष्ट्रों के सहयोग से युद्ध चलाना।
  3. व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा करना।
  4. संविधान-सभा द्वारा भूमि की समस्या सुलझाना।
  5. रूस की समस्त संस्थाओं में वैधानिक उपायों द्वारा परिवर्तन लाना।

बोल्शेविकों ने इस केरेन्सकी सरकार को स्वीकार नहीं किया।

 

रूस क्रांति की तारीख (कैलेंडर का अंतर):

  • रूस में 1 फरवरी 1918 तक जूलियन कैलेंडर का अनुसरण किया जाता था। इसके बाद रूसी सरकार ने ग्रेगोरियन कैलेंडर अपना लिया।
  • ग्रेगोरियन कैलेंडर जूलियन कैलेंडर से 13 दिन आगे चलता है।
  • इसी अंतर के कारण:
    • फरवरी क्रांति  —  12 मार्च को सम्पन्न हुई थी।
    • अक्टूबर क्रांति  7 नवम्बर को सम्पन्न हुई थी।
    • 1905 की क्रांति  22 जनवरी को हुई थी।

 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस :- सन् 1975 ई० में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया गया।

 

बोल्शेविक क्रांति (नवम्बर 1917) और लेनिन का आगमन

  • जार की सरकार ने लेनिन को निर्वासित (देश निकाला) कर दिया था, जिसके कारण वह स्विट्जरलैंड में जीवन व्यतीत कर रहा था।
  • जब मार्च 1917 ई० में क्रांति हुई, तब वह जर्मनी की सहायता से रूस पहुँचा। अप्रैल 1917 में उसके पेट्रोग्राद पहुँचने से जनता का उत्साह बढ़ गया।
  • लेनिन ने घोषणा की कि रूसी क्रांति अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए एक और क्रांति अनिवार्य है। उसने बोल्शेविक दल का जो मुख्य कार्यक्रम स्पष्ट किया, उसे ही ‘अप्रैल थीसिस’ कहा जाता है।
  • उसने मजदूरों/जनता को आकर्षित करने के लिए तीन नारे दिए — भूमि, शांति और रोटी
  • “लेनिन ने ताकत के बल पर केरेन्सकी की सरकार को हटाने का फैसला किया, जिसमें जनता और सेना ने उसका पूरा साथ दिया। 7 नवंबर 1917 को बोल्शेविकों (लेनिन के दल) ने पेट्रोग्राद के सभी सरकारी दफ्तरों जैसे—रेलवे स्टेशन, बैंक और डाकघर पर कब्जा कर लिया और केरेन्सकी रूस छोड़कर भाग गया।
  • शासन की बागडोर बोल्शेविकों के हाथ में आई। लेनिन को अध्यक्ष बनाया गया तथा ट्रॉटस्की को इस सरकार का विदेश मंत्री बनाया गया। विश्व में पहली बार शासन सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथों में आई।

 

लेनिन के शुरुआती कदम और आंतरिक समस्याएं

  • लेनिन ने सबसे पहले जर्मनी के साथ ‘ब्रेस्टलिटोवस्क की संधि’ की। इस संधि के कारण सोवियत रूस को अपना लगभग एक-चौथाई भू-भाग गंवाना पड़ा, परंतु रूस प्रथम विश्व युद्ध से बाहर हो गया।
  • इसी समय रूस में गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमें अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस ने सोवियत रूस पर आक्रमण कर दिया।
  • विदेशी हमले का सामना करने के लिए ट्रॉटस्की के नेतृत्व में एक विशाल ‘लाल सेना’ का गठन किया गया जिसने सफलता पूर्वक विदेशी हमले का सामना किया।
  • आंतरिक विद्रोहों और साजिशों को दबाने के लिए ‘चेका’ नामक गुप्त पुलिस संगठन बनाया गया। यह अचानक छापा मारकर विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लेती थी।

 

रूस का नया संविधान (1918 ई०)

  • सन् 1918 में विश्व का पहला समाजवादी शासन स्थापित करने वाला रूस का नया संविधान बनाया गया। इसके द्वारा रूस का नाम बदलकर ‘सोवियत समाजवादी गणराज्यों का समूह’ (U.S.S.R.) किया गया।
  • सबसे निचले स्तर पर ‘सोवियत’ नामक स्थानीय समितियाँ बनाई गईं।
  • नए संविधान द्वारा 18 वर्ष से अधिक उम्र वाले उन सभी नागरिकों को मताधिकार (वोट देने का अधिकार) दिया गया जो उत्पादक श्रम द्वारा अपनी जीविका चलाते थे। काम करने के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बनाया गया।
  • उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया। बैंकों, बड़े उद्योगों, जल परिवहन एवं रेलवे का राष्ट्रीयकरण किया गया। शिक्षा पर से चर्च का अधिकार समाप्त कर दिया गया।
  • बोल्शेविक दल का नाम बदलकर साम्यवाद दल किया गया। लाल रंग के झंडे पर हँसिए और हथौड़े को सुशोभित कर देश का राष्ट्रीय झंडा तैयार किया गया, जो साम्यवाद का प्रतीक बना।

 

भूमि का पुनर्वितरण और ‘युद्धरत साम्यवाद’ (War Communism)

  • भूमि सुधार :- लेनिन ने एक आदेश जारी कर बड़े भू-स्वामियों की भूमि को किसानों के बीच पुनर्वितरित किया (बाँट दिया)। चूंकि किसानों ने भूमि पर पहले से कब्जा कर रखा था, लेनिन ने उसे सिर्फ वैधता प्रदान की। इस कदम की आलोचना हुई क्योंकि समाजवादी अर्थव्यवस्था में भूमि पर राज्य का नियंत्रण होता है, लेकिन लेनिन ने जवाब दिया कि किसान बहुमत में थे जबकि बोल्शेविक दल अल्पमत में था।
  • युद्धरत साम्यवाद की नीति :- उत्पादन की समस्या से निपटने के लिए लेनिन ने ‘युद्धरत साम्यवाद’ लागू किया। इसके तहत:
    • फैक्ट्रियों के तकनीकविदों और उत्पादन पर मजदूरों की सहायता से कड़ा नियंत्रण स्थापित किया गया।
    • किसानों पर भी नियंत्रण लगाया गया और उनसे बलपूर्वक अनाजों की वसूली की जाने लगी।
    • फैक्ट्रियों में श्रमिक हड़ताल पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाया गया।
  • नीति का भयंकर परिणाम (अकाल की स्थिति) :- जबरदस्ती अनाज वसूली के डर से किसानों ने अपना अनाज जलाना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप 1920-21 में उत्पादन का स्तर काफी गिर गया। करोड़ों लोगों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न आ खड़ा हुआ और भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। सरकारी और विदेशी सहायता के बावजूद काफी लोग भूख-प्यास से मरने लगे और क्रांति विरोधी नारे सुनाई पड़ने लगे। अतः लेनिन ने अपनी नीति में संशोधन किया, जिसका परिणाम ‘नई आर्थिक नीति’ (NEP) था।

 

नई आर्थिक नीति (NEP) एवं स्टालिन का उदय

नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP)

  • लेनिन एक स्वप्नदर्शी विचारक नहीं, बल्कि एक कुशल सामाजिक चिंतक तथा व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था। उसने देखा कि तत्काल पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था लागू करना या सारी पूँजीवादी दुनिया से एक साथ टकराना संभव नहीं है
  • लेनिन ने 1921 ई० में इस नई आर्थिक नीति (NEP) की घोषणा की, जिसमें मार्क्सवादी मूल्यों से कुछ हद तक समझौता करना पड़ा। पिछले अनुभवों से सीखकर व्यावहारिक कदम उठाना ही इस नीति का लक्ष्य था।

 

NEP की 8 प्रमुख बातें (विशेषताएं):

  1. किसानों से जबरन अनाज लेने के स्थान पर एक निश्चित कर (Tax) लगाया गया। बचा हुआ अनाज किसान का था और वह इसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकता था।
  2. यद्यपि यह सिद्धांत कायम रखा गया कि जमीन राज्य (सरकार) की है, फिर भी व्यवहार में जमीन किसान की ही हो गई।
  3. 20 से कम कर्मचारियों वाले उद्योगों को व्यक्तिगत रूप (निजी तौर) से चलाने का अधिकार मिल गया।
  4. उद्योगों का विकेंद्रीकरण कर दिया गया। निर्णय और क्रियान्वयन के बारे में विभिन्न इकाइयों को काफी छूट दी गई।
  5. विदेशी पूँजी भी सीमित तौर पर आमंत्रित की गई।
  6. व्यक्तिगत संपत्ति और जीवन की बीमा भी राजकीय एजेंसी द्वारा शुरू किया गया।
  7. विभिन्न स्तरों पर बैंक खोले गए।
  8. ट्रेड यूनियन की अनिवार्य सदस्यता समाप्त कर दी गई।
  • नीति का परिणाम :- इस नई आर्थिक नीति के द्वारा लेनिन ने उत्पादन की कमी को नियंत्रित किया। इसके परिणामस्वरूप कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन में आशातीत (बहुत अधिक) वृद्धि हुई
  • लेनिन का जवाब :- आलोचनाओं का जवाब देते हुए लेनिन ने कहा कि — “तीन कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे हटना, फिर भी दो कदम आगे रहने के समान है।”

 

स्टालिन का उदय (Succession after Lenin)

  • 1924 ई० में जब लेनिन की मृत्यु हुई, तो उत्तराधिकार की समस्या खड़ी हो गई। विभिन्न समूहों और अलग-अलग नेताओं के बीच सत्ता के लिए गंभीर संघर्ष चल रहा था।
  • इस संघर्ष में स्टालिन की विजय हुई और 1929 ई० में ट्रॉटस्की को निर्वासित (देश से बाहर) कर दिया गया। 1930 के दशक में वे सभी नेता खत्म कर दिए गए जिन्होंने क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • स्टालिन कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव था और 1953 ई० में अपनी मृत्यु तक उसने तानाशाही व्यवहार किया।

 

स्टालिन के शासन का प्रभाव और कार्य

(A) नकारात्मक (प्रतिकूल) प्रभाव:

  • राजनीतिक लोकतंत्र तथा भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता नष्ट हो गई।
  • पार्टी के अंदर भी मतभेदों को बर्दाश्त नहीं किया जाता था।
  • इन घटनाओं का सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसमें ऐसी विशेषताएं उभरीं जो मार्क्सवाद और क्रांति के मानवतावादी आदर्शों के विपरीत थीं।
  • स्वतंत्रता के सीमित होने के कारण कला और साहित्य के विकास पर भी बुरा असर पड़ा।

(B) सकारात्मक प्रभाव (रूस का एक महान शक्ति बनना):

  • स्टालिन के अथक प्रयास से रूस विश्व के मानचित्र पर एक शक्तिशाली देश के रूप में सामने आया। तीन पंचवर्षीय योजनाओं के फलस्वरूप रूस की औद्योगिक उन्नति शिखर पर पहुँच गई।
  • कृषि का आधुनिकीकरण हुआ तथा विज्ञान की उन्नति हुई।
  • द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने से पहले ही रूस को एक महान शक्ति माना जाने लगा था। युद्धकाल के सम्मेलनों में अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल के साथ स्टालिन भी भाग लेता था।
  • इस प्रकार तीन दशकों में ही तिरस्कृत, आक्रांत और कमजोर रूस विश्व की महान शक्ति बन गया और वहाँ की मेहनतकश जनता में क्रांति ने स्थायी रूप से अपनी जड़ें जमा लीं।

रूसी क्रांति का प्रभाव

सर्वहारा वर्ग की सत्ता और आंदोलनों को बढ़ावा

  • इस क्रांति के पश्चात् रूस में श्रमिक अथवा सर्वहारा वर्ग की सत्ता स्थापित हो गई
  • इस व्यवस्था ने अन्य क्षेत्रों में भी आंदोलन को भारी प्रोत्साहन दिया।

 

विश्व का दो खेमों (भागों) में विभाजन

  • रूसी क्रांति के बाद वैश्विक विचारधारा के स्तर पर पूरी दुनिया दो खेमों में बँट गई:
  1. साम्यवाद विश्व
  2. पूँजीवादी विश्व
  • इसके पश्चात् यूरोप भी दो भागों में विभाजित हो गया — पूर्वी यूरोप एवं पश्चिमी यूरोप। धर्मसुधार आंदोलन के पश्चात् और साम्यवाद क्रांति से पहले यूरोप में वैचारिक आधार पर इस तरह का विभाजन कभी नहीं देखा गया था।

 

शीत युद्ध (Cold War) की शुरुआत

  • द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् पूँजीवादी विश्व और सोवियत रूस के बीच शीतयुद्ध की शुरुआत हुई
  • आगामी चार दशकों तक दोनों खेमों के बीच शस्त्रों (हथियारों) की होड़ चलती रही।

 

नवीन आर्थिक मॉडल का आगमन

  • रूसी क्रांति के पश्चात् आर्थिक आयोजन के रूप में एक नवीन आर्थिक मॉडल सामने आया
  • आगे चलकर पूँजीवादी देशों ने भी परिवर्तित रूप में इस आर्थिक मॉडल को अपना लिया। इस प्रकार स्वयं पूँजीवाद के चरित्र में भी परिवर्तन आ गया।

 

उपनिवेश मुक्ति को प्रोत्साहन

  • इस क्रांति की सफलता ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश मुक्ति (गुलामी से आजादी) को प्रोत्साहन दिया
  • इसका कारण यह था कि सोवियत रूस की साम्यवादी सरकार ने एशिया और अफ्रीका के देशों में होने वाले राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक समर्थन प्रदान किया था।

 

मिखाइल गोर्वाचोव की अवधारणाएँ:

  • मिखाइल गोर्वाचोव 1985 ई० में सोवियत संघ का राष्ट्रपति बना
  • इन्होंने दो मुख्य अवधारणाएँ पेश कीं:
  1. पेरेस्त्रोइका (जिसका अर्थ है — पुनर्गठन)
  2. ग्लासनोस्त (जिसका अर्थ है — खुलापन)

 

सोवियत संघ का विघटन

  • सोवियत संघ का विघटन दिसम्बर 1991 ई० में हुआ

 

शीत युद्ध क्या था?

  • यह एक वैचारिक युद्ध था जिसमें:
    • पूँजीवादी गुट का नेता — संयुक्त राज्य अमेरिका था।
    • साम्यवादी गुट का नेता — सोवियत रूस था।

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