History Chapter 3 Notes Class 10th
History ( इतिहास ) Bihar Board
Class 10th Chapter 3
Full Chapter Explanation & Notes
हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आन्दोलन
★ हिन्द-चीन क्षेत्र क्या है?
दक्षिण-पूर्व एशिया में आने वाले लगभग 3 लाख (2.80 लाख) वर्ग किलोमीटर में फैले प्रायद्वीपीय (peninsula) इलाके को ‘हिन्द-चीन’ कहा जाता है। इसमें आज के तीन मुख्य देश आते हैं—वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया।
- भौगोलिक सीमा (चौहद्दी)
- उत्तर में :- म्याँमार (बर्मा) और चीन।
- दक्षिण में :- चीन सागर।
- पश्चिम में :- म्याँमार के इलाके।
★ वियतनाम पर चीन का असर (तोंकिन और अन्नाम प्रांत)
- वियतनाम के दो प्रांतों—तोंकिन और अन्नाम पर पुराने समय से ही चीन का गहरा असर था। ये इलाके लंबे समय तक चीन के अधीन रहे।
- जब भी चीन में कोई मजबूत राजा आता, वह इन पर कब्जा कर लेता और चीन की सरकार कमजोर होते ही ये इलाके वापस आजाद हो जाते थे।
- राजवंशों का इतिहास (किसने कब राज किया):
- 3री शताब्दी :- शी-हुआंग टी का राज था।
- उसके बाद :- हान वंशीय राजा ‘बू-ती’ ने फिर से कब्जा किया।
- 15वीं शताब्दी :- मिंग वंशीय सम्राट के ‘युंग ली’ ने अधिकार किया।
- 19वीं शताब्दी :- यह पूरा इलाका मंचु शासन के अधीन आ गया था।
- चीनी प्रभाव के बाद भी यहाँ के लोगों ने अपनी अलग संस्कृति, भाषा और लिपि बचाकर रखी। यहाँ बौद्ध धर्म और चीन के कंफ्यूशियस दर्शन का पूरा प्रभाव था।
★ लाओस और कम्बोडिया पर भारतीय संस्कृति का असर
- वियतनाम के उलट, लाओस और कम्बोडिया पर भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव था।
- चौथी शताब्दी में ‘कम्बुज राज्य’ की स्थापना हुई, जहाँ का राजा भारतीय मूल (भारतवंशी) का था। यह राज्य भारतीय संस्कृति का मुख्य केंद्र बना।
- 12वीं शताब्दी में राजा सूर्यवर्मा द्वितीय ने यहाँ के प्रसिद्ध अंकोर मंदिर का निर्माण करवाया था।
- 16वीं शताब्दी में कम्बुज राज्य बिखर गया (पतन हो गया) और यहाँ आपसी लड़ाई-झगड़े (आंतरिक संघर्ष) शुरू हो गए।
★ इस क्षेत्र का नाम ‘हिन्द-चीन‘ क्यों पड़ा?
- इस पूरे इलाके के कुछ देशों पर चीन का सांस्कृतिक प्रभाव था (जैसे वियतनाम) और कुछ देशों पर हिन्द (हिंदुस्तान/भारत) का सांस्कृतिक प्रभाव था (जैसे लाओस-कम्बोडिया)। इसी वजह से इस पूरे क्षेत्र को मिलाकर ‘हिन्द-चीन‘ नाम दिया गया।
★ विदेशी कंपनियों का आना और फ्रांस का कब्ज़ा
- पुर्तगाली सबसे पहले आए :- 1498 में जब वास्कोडिगामा ने भारत आने का रास्ता खोजा, तो पुर्तगाली ही सबसे पहले भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से जुड़े।
- व्यापार की शुरुआत :- पुर्तगालियों ने 1510 में ‘मलक्का’ को अपना मुख्य अड्डा (व्यापारिक केंद्र) बनाया और हिन्द-चीन के देशों के साथ व्यापार शुरू किया। साथ ही पुर्तगालियों के बाद स्पेन, डच, इंग्लैंड और फ्रांस के लोग भी यहाँ व्यापार करने आए।
- फ्रांस की चालाकी :- बाकी देशों ने सिर्फ व्यापार किया और राज करने की कोशिश नहीं की। लेकिन फ्रांस इकलौता ऐसा देश था, जो शुरू से ही यहाँ अपना राज (राजनीतिक कब्ज़ा) जमाने की फिराक में था। 17वीं शताब्दी में फ्रांस के बहुत सारे व्यापारी और पादरी (धर्म प्रचारक) हिन्द-चीन पहुँच गए।
★ फ्रांस ने धीरे-धीरे कैसे कब्ज़ा किया?
- 1747 ई० में फ्रांस ने सबसे पहले वियतनाम के अन्नाम इलाके में दिलचस्पी दिखाना शुरू किया।
- 1787 ई में फ्रांस को वहाँ के कोचीन-चीन के राजा के साथ एक समझौता (संधि) करने का मौका मिल गया। इसी दौरान 19वीं शताब्दी में अन्नाम और कोचीन-चीन के लोग फ्रांसीसी पादरियों की हरकतों से परेशान होकर उनके खिलाफ जोरदार आंदोलन कर रहे थे।
- 1862 ई० में फ्रांस ने अपनी सेना और ताकत के दम पर अन्नाम को जबरदस्ती समझौते के लिए मजबूर कर दिया।
- फ्रांस ने 1863 ई० में कम्बोडिया को भी डरा-धमकाकर अपने कब्जे में ले लिया।
- 1783 ई० में फ्रांस की सेना तोंकिन इलाके में घुस गई।
- 20वीं शताब्दी देखते ही देखते पूरा का पूरा हिन्द-चीन फ्रांस का गुलाम बन गया।
★ व्यापारियों के आने का क्रम
- पुर्तगाली
- डच
- इंग्लैंड
- फ्रांस
★ फ्रांस द्वारा गुलाम (उपनिवेश) बनाने का कारण
- फ्रांस का मुख्य मुकाबला डच और ब्रिटिश कंपनियों से था। भारत में फ्रांसीसी कमजोर हो चुके थे और चीन में उनकी टक्कर इंग्लैंड से थी। इसलिए फ्रांस को अपनी सुरक्षा के लिए हिन्द-चीन सबसे सही जगह लगी, जहाँ से वह भारत और चीन दोनों पर नजर रख सके।
- फ्रांस में फैक्ट्रियां (औद्योगीकरण) शुरू हो चुकी थीं। उन्हें अपनी फैक्ट्रियों के लिए कच्चा माल चाहिए था और वहां से बने सामान को बेचने के लिए एक बड़ा बाजार चाहिए था।
- विकसित यूरोपीय देशों का खुद से यह मानना था कि पिछड़े समाजों को सभ्य बनाना उनका कर्तव्य (Duty) है।
★ किस इलाके पर कब कब्जा हुआ (बॉक्स के अनुसार):
- 1862 :– कोचीन चीन
- 1863 :– कम्बोडिया
- 1884 :– अन्नाम
- 1904 :– लाओस
★ फ्रांसीसियों द्वारा शोषण और कृषि व्यवस्था
- शोषण की शुरुआत: फ्रांस ने पहले व्यापारिक शहरों और बंदरगाहों से लूटना शुरू किया, फिर वे अंदरूनी गांवों में घुसकर किसानों का शोषण करने लगे।
- इलाकों के मुख्य आधार
- तोंकिन :- यहाँ के जीवन का मुख्य सहारा लाल घाटी थी।
- कम्बोडिया :- यहाँ मेकांग नदी का मैदानी क्षेत्र था।
- कोचीन-चीन :- यहाँ मेकांग का डेल्टा क्षेत्र था।
- चीन से सटे राज्यों में कोयला, टीन, जस्ता, टंगस्टन और क्रोमियम जैसे कीमती खनिज मिले।
- पहाड़ी इलाकों में रबर की खेती और मैदानी इलाकों में धान (चावल) की खेती होती थी।
- फ्रांस ने खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए नहरें बनवाईं, जल निकासी का इंतजाम किया और दलदली जमीनों व जंगलों को साफ करके खेती लायक बनाया।
- इसी कारण 1931 तक वियतनाम दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा चावल बेचने वाला (निर्यातक) देश बन गया।
★ एकतरफा अनुबंध व्यवस्था (जबरन मजदूरी)
- रबर बागानों, खेतों और खानों में मजदूरों से ‘एकतरफा अनुबंध व्यवस्था‘ के तहत काम लिया जाता था।
- पूरे उत्तर से दक्षिण तक रेल लाइनों और सड़कों का बड़ा जाल बिछाया गया, लेकिन यह सब फ्रांस के फायदे के लिए था। आम किसानों और मजदूरों का जीवन लगातार गिरता गया।
★ एकतरफा अनुबंध व्यवस्था क्या थी?
यह एक तरह की बंधुआ मजदूरी (जबरदस्ती काम कराना) थी। इसमें काम करने वाले मजदूरों का कोई हक या अधिकार नहीं था, जबकि मालिकों के पास असीमित (सारे) अधिकार थे।
★ शिक्षा और सामाजिक भेदभाव
- वियतनाम के लोग जो पहले अपनी स्थानीय भाषा या चीनी भाषा में पढ़ते थे, उन पर जबरन फ्रांसीसी भाषा थोप दी गई।
- फ्रांसीसियों को डर था कि अगर यहाँ के आम लोग पढ़-लिख गए, तो वे उनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे। इसलिए लोगों को पढ़ाई से दूर रखने के लिए स्कूल के आखिरी साल की परीक्षा में ज्यादातर स्थानीय बच्चों को जानबूझकर फेल कर दिया जाता था।
- हिन्द-चीन में रहने वाले फ्रांसीसी नागरिकों को ‘कोलोन‘ कहा जाता था। इन कोलोनों और वहाँ के आम स्थानीय लोगों के रहन-सहन और अधिकारों में जमीन-आसमान का अंतर था।
- पार्टियां और विरोध: इस भयंकर भेदभाव की वजह से 1920 के दशक आते-आते छात्र-छात्राएं अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाने लगे। फ्रांस द्वारा हनोई विश्वविद्यालय को बंद कर देना उनके शोषण की आखिरी हद थी।
★ राष्ट्रवाद (देशभक्ति) का शुरुआती विकास
- फ्रांस के खिलाफ विद्रोह तो शुरू से ही हो रहे थे, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में यह और तेज हो गया। लोग छोटी-छोटी बातों पर अपना गुस्सा दिखाने लगे।
- इन्होंने ‘दुई तान होई’ नाम का एक क्रांतिकारी संगठन बनाया, जिसके नेता कुआंग दें थे। फान-बोई-चाऊ ने “द हिस्ट्री ऑफ द लॉस ऑफ वियतनाम” नाम की किताब लिखकर लोगों में खलबली मचा दी।
- 1905 में छोटे से देश जापान द्वारा रूस को हराया जाना हिन्द-चीन के लोगों के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा बना।
- फ्रांस के विचारक रूसो और मांटेस्क्यू के विचारों ने भी लोगों को प्रभावित किया।
- ये एक और दूसरे राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने राजाओं के राज (राजतंत्र) को हटाकर गणतंत्र (जनता का राज) बनाने की कोशिश की।
- जापान में पढ़ने गए छात्रों ने चीन के नेता ‘सन्यात सेन’ की सत्ता परिवर्तन से बढ़ावा पाकर इस संगठन (वियतनाम मुक्ति एसोसिएशन) की स्थापना की।
★ प्रथम विश्व युद्ध (1914) का असर
- शुरुआत में राष्ट्रवाद सिर्फ कोचीन-चीन, अन्नाम और तोंकिन जैसे शहरों तक सीमित था। लेकिन जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो यहाँ के हजारों लोगों को जबरदस्ती फ्रांस की सेना में भर्ती किया गया और मजदूरों को बिना पैसे दिए (बेगार) काम कराने फ्रांस ले जाया गया।
- यहाँ के सैनिकों को युद्ध में सबसे आगे (प्रथम पंक्ति में) खड़ा किया जाता था, इसलिए मरने वालों में इनकी संख्या सबसे ज्यादा थी।
- इस भयंकर शोषण के गुस्से में देशभक्तों ने 1914 में यह संगठन बनाया, जिसका पहला सम्मेलन कैण्टन में हुआ। लेकिन फ्रांसीसी सरकार ने शक के आधार पर इसे कुचल दिया।
- चीन के लोगों का हिन्द-चीन की खेती, व्यापार और मछली व्यापार पर कब्ज़ा था, पर वे यहाँ की राजनीति से अलग रहते थे। इससे गुस्सा होकर यहाँ की जनता ने 1919 में चीन के सामानों का बहिष्कार किया।
★ फ्रांस की शासन व्यवस्था और दिखावटी सुधार
- पूरे इलाके में सिर्फ कोचीन-चीन ही सीधे फ्रांस के प्रशासन में था। बाकी चार प्रांतों (तोंकिन, अन्नामी, कम्बोडिया और लाओस) में पुराने राजाओं का ही राज था, लेकिन वहाँ फ्रांस के रेजिडेंटो (अफसरों) की नियुक्ति होती थी।
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने कुछ नरम नीतियां अपनाईं। कोचीन-चीन के लिए एक ‘प्रतिनिधि सभा’ बनाई गई जिसके सदस्यों को चुना जाता था। बिना सेना वाले प्रशासन में स्थानीय लोगों को थोड़ा महत्व मिला और राजघरानों ने भी सुधार की कोशिश की। लेकिन जनता इन नाम मात्र के सुधारों से खुश नहीं थी।
★ हो-ची-मिन्ह और कम्युनिस्ट पार्टी का आना
- वियतनाम के इस छात्र ने 1917 में पेरिस (फ्रांस) में साम्यवादियों (Communists) का एक गुट बनाया। बाद में वे पढ़ाई के लिए मास्को (रूस) गए।
- संगठनों की स्थापना
- इसकी स्थापना जोनगुएन आई ने की थी। यह पार्टी मास्को के कैंटन से प्रभावित थी और इसकी सोच उग्र (आतंकी विचारों वाली) थी।
- हो-ची-मिन्ह ने इसकी स्थापना की और कार्यकर्ताओं को सैनिक ट्रेनिंग देने का इंतजाम किया।
- हो-ची-मिन्ह ने वियतनाम के बिखरे हुए क्रांतिकारी गुटों को एक साथ जोड़कर इस वियतनाम कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की, जो पूरी तरह उग्र विचारों पर चलती थी।
★ 1930 की महामंदी और फ्रांस का जुल्म
- 1930 के दशक में दुनिया भर में आई मंदी ने राष्ट्रवाद को और बढ़ा दिया। चावल और रबर के दाम एकदम गिर गए, जिससे हिन्द-चीन में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ गई।
- परेशान होकर किसान साम्यवाद (हो-ची-मिन्ह की पार्टी) से जुड़ने लगे और आंदोलन तेज हो गया।
- फ्रांसीसी सरकार ने आंदोलन को रोकने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। विद्रोही जनता पर बेरहमी से गोलियां बरसाई गईं और यहाँ तक कि हवाई जहाजों से बमबारी भी की गई। इस जुल्म में हजारों लोग मारे गए और आंदोलन कुछ समय के लिए दब गया। लेकिन यह एक शांत पड़े ज्वालामुखी की तरह था, जो अंदर ही अंदर सुलग रहा था और लोगों ने अब छुपकर (भूमिगत होकर) आंदोलन चलाना शुरू कर दिया।
★ द्वितीय विश्व युद्ध और वियतनामी स्वतंत्रता
★ जापान का हिन्द-चीन पर कब्ज़ा (जून 1940)
- जून 1940 में फ्रांस, जर्मनी से हार गया। इसके बाद फ्रांस में जर्मनी के समर्थन वाली सरकार बन गई।
- एक समझौते के तहत जापान को हिन्द-चीन में अपनी फौज भेजने का मौका मिल गया।
- इसका फायदा उठाकर जापान ने पहले तोंकिन, फिर अन्नाम और आखिर में पूरे हिन्द-चीन पर अपना राजनीतिक कब्ज़ा जमा लिया।
★ हिन्द-चीन में ‘द्वैध शासन’ (दोहरा राज)
- हिन्द-चीन में एक तरह का अनोखा शासन शुरू हुआ—असली ताकत जापानियों के हाथ में थी, जबकि प्रशासन चलाने का मुखौटा फ्रांसीसियों का था।
- इस दोहरे राज का फायदा वियतनाम के गुप्त क्रांतिकारियों को मिला। वे अब जापानियों और फ्रांसीसियों, दोनों के खिलाफ एक साथ कार्रवाई करने लगे।
★ ‘वियतमिन्ह’ (वियतनाम स्वतंत्रता लीग) की स्थापना
- फ्रांसीसी दमन के बावजूद सामवादी (कम्युनिस्ट) दल बचा रहा। हो-ची-मिन्ह के नेतृत्व में देश भर के कार्यकर्ताओं ने मिलकर ‘वियतमिन्ह’ (वियतनाम स्वतंत्रता लीग) बनाई।
- इसमें पीड़ित किसान, डरे हुए व्यापारी और बुद्धिजीवी (पढ़े-लिखे लोग) सभी शामिल थे।
- इन सबने मिलकर फ्रांसीसियों और जापानियों के खिलाफ छापामार युद्ध नीति (अचानक हमला करके छिप जाना) अपनाई।
★ जापान का आत्मसमर्पण और वियतनाम की आज़ादी
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापान ने ‘पर्ल हार्बर’ पर हमला किया, तो अमेरिका भी युद्ध में कूद पड़ा।
- 1944 में फ्रांस जर्मनी के कब्ज़े से आज़ाद हो गया। दूसरी तरफ, जापान पर अमेरिकी परमाणु हमले के बाद ‘पोट्सडम की घोषणा’ के तहत जापान ने आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर दिया।
- जापान की सेनाएं वियतनाम से निकलने लगीं। अब फ्रांस के पास भी इतनी ताकत नहीं बची थी कि वह दोबारा हिन्द-चीन पर अपना कब्ज़ा बनाए रख सके।
- इसका फायदा उठाकर वियतनाम के राष्ट्रवादियों ने हो-ची-मिन्ह के नेतृत्व में 2 सितम्बर 1945 को लोकतांत्रिक गणराज्य सरकार बनाई और वियतनाम की आज़ादी का एलान कर दिया। इस सरकार के प्रधान हो-ची-मिन्ह बने।
★ बाओदायी का पद छोड़ना
- चूंकि हिन्द-चीन कई छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और जापानी सेनाएं जा चुकी थीं, इसलिए कम्बोडिया, लाओस और अन्नाम में दोबारा पुराने राजवंशों को गद्दी मिल गई।
- इसी दौरान अन्नाम का शासक बाओदायी बना।
- साम्यवादी राष्ट्रवादियों के बढ़ते प्रभाव के आगे बाओदायी का टिकना मुश्किल था। इसलिए उसने 25 अगस्त 1945 को ही अपनी मर्जी से अपना पद छोड़ दिया और वियतनाम पूरी तरह एक गणराज्य बन गया।
★ हिन्द-चीन के प्रति फ्रांस की नई नीति (चाल)
- दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ब्रिटेन, हॉलैंड, अमेरिका और फ्रांस जैसे देश दक्षिण-पूर्व एशिया में दोबारा अपना राज कायम करने में लग गए। फ्रांस भी हिन्द-चीन में अपना डूबा हुआ साम्राज्य बचाना चाहता था, इसलिए उसने एक नई चाल (औपनिवेशिक योजना) बनाई।
★ फ्रांस का प्लान क्या था?
- फ्रांस के पूरे साम्राज्य को मिलाकर एक ‘यूनियन’ बनाया जाएगा, जिसमें उसके सारे गुलाम (उपनिवेश) शामिल रहेंगे।
- हिन्द-चीन इस पूरे फ्रांसीसी महासंघ का सिर्फ एक अंग रहेगा, जिसे खुद का शासन (स्वशासित) चलाने की थोड़ी छूट होगी।
- हिन्द-चीन के संरक्षित राज्यों और कोचीन चीन को मिलाकर एक संघ बनाया जाएगा।
- इस नए संघ की विदेश नीति और सेना पर पूरा नियंत्रण फ्रांस का ही रहेगा।
★ हनोई-समझौता (6 मार्च 1946) और उसका टूटना
- जैसे ही जापानी सेनाएं वहां से हटीं, फ्रांस की सेना दोबारा वियतनाम के ‘सैगान’ शहर पहुँच गई। वहाँ वियतनामी छापामारों ने फ्रांसीसी सेना के साथ भयंकर युद्ध किया, जिससे फ्रांसीसी सेना सैगान में ही फंसकर रह गई।
- हनोई-समझौता (6 मार्च 1946), मजबूरी में फ्रांस को वियतनाम के साथ समझौता करना पड़ा। इसके तहत:
- फ्रांस ने वियतनाम को एक स्वतंत्र गणराज्य मान लिया।
- यह भी तय हुआ कि यह गणराज्य हिन्द-चीन संघ और फ्रांसीसी यूनियन के अंदर ही रहेगा।
- बदले में फ्रांसीसी सेना को ‘तोंकिन’ इलाके में घुसने का अधिकार मिल गया।
- फ्रांस की नीयत साफ़ नहीं थी। फ्रांस चाहता था कि बनने वाले संघ का अध्यक्ष उसका खुद का आदमी (हाई-कमिशनर) हो, जबकि वियतनामी नेता पूरी आजादी चाहते थे।
- फ्रांस ने चाल चलकर ‘कोचीन चीन’ में एक अलग सरकार बना दी, जिससे हनोई-समझौता टूट गया। फ्रांस को कुछ वियतनामी लालची (प्रतिक्रियावादी) ताकतों का साथ मिल गया और वे अपनी नई सरकार चलाने लगे।
- उस समय हो-ची-मिन्ह की ताकत इतनी नहीं थी कि वे फ्रांसीसी सेना का सीधे मुकाबला कर सकें, इसलिए उन्होंने फिर से जंगलों में छिपकर गुरिल्ला (जबरन या अचानक हमला करने वाला) युद्ध शुरू कर दिया।
★ बाओदाई की वापसी और विश्व की राजनीति (1949-1950)
- गुरिल्ला युद्ध से तंग आकर फ्रांस ने पेरिस से पुराने राजा बाओदाई को वापस बुलाया और उसे वियतनाम का शासक बना दिया। फ्रांस को पूरी उम्मीद थी कि बाओदाई कम्युनिस्ट (साम्यवादियों) का विरोधी है, इसलिए वह फ्रांस का ही साथ देगा।
- इस समय पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंट चुकी थी—पूंजीवादी (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन) और सामवादी/कम्युनिस्ट (जैसे रूस, चीन)।
- फ्रांस को अमेरिका और ब्रिटेन का पूरा साथ मिल रहा था। इधर हो-ची-मिन्ह की सरकार में कुछ गैर-साम्यवादी राष्ट्रवादी भी शामिल थे, इसलिए वे पूरी तरह कम्युनिस्ट सरकार नहीं बना पा रहे थे।
- हो-ची-मिन्ह ने चीन के साम्यवादी गणराज्य को अपना आदर्श मान लिया और उनकी पार्टी पूरी तरह कम्युनिस्ट बन गई।
- रूस और चीन ने हो-ची-मिन्ह की वियतनाम सरकार को मान्यता दे दी और उन्हें बहुत बड़े पैमाने पर सेना और हथियार (तकनीकी सहायता) देना शुरू कर दिया।
★ 1950 में हिन्द-चीन की उलझी हुई स्थिति
1950 तक आते-आते हिन्द-चीन के हालात बहुत पेचीदा (जटिल) हो गए:
- उत्तरी वियतनाम :– यहाँ हो-ची-मिन्ह की कम्युनिस्ट सरकार चल रही थी।
- दक्षिणी वियतनाम :– यहाँ फ्रांस के समर्थन वाली बाओदाई की सरकार चल रही थी।
- लाओस और कम्बोडिया :– यहाँ पुराने राजाओं का राज था, लेकिन उन पर पूरा नियंत्रण फ्रांस का था। यहाँ भी अब आज़ादी की मांग तेज होने लगी थी।
★ दिएन-विएन-फु का ऐतिहासिक युद्ध
- वियतनाम के गुरिल्ला सैनिक लाओस और कम्बोडिया के रास्तों से आकर दक्षिणी वियतनाम पर अचानक धावा बोलते थे और हमला करके वापस जंगलों में छिप जाते थे।
- इसी दौरान गुरिल्ला सैनिकों ने ‘दिएन-विएन-फु’ नाम की जगह पर फ्रांसीसी सेना पर एक भयंकर और जोरदार हमला किया।
- इस युद्ध में फ्रांस की सेना बहुत बुरी तरह हार गई। फ्रांस के लगभग 16,000 सैनिकों को आत्मसमर्पण (सरेंडर) करना पड़ा। इस ऐतिहासिक जीत के साथ दिएन-विएन-फु पर पूरी तरह से साम्यवादियों (हो-ची-मिन्ह की सेना) का अधिकार हो गया।
★ अमेरिकी हस्तक्षेप
- अमेरिका पहले सिर्फ फ्रांस की मदद कर रहा था। लेकिन वियतनाम में जब साम्यवादियों (कम्युनिस्टों) की ताकत बहुत बढ़ने लगी, तो उनके विरोध में अमेरिका ने सीधे खुद हिन्द-चीन के मामलों में दखल देना शुरू कर दिया।
- चूंकि रूस पहले से ही साम्यवादियों (हो-ची-मिन्ह के पक्ष) का साथ दे रहा था और अब अमेरिका भी कूद पड़ा था, तो उस समय ऐसा लगने लगा था कि कहीं तीसरा विश्व युद्ध न शुरू हो जाए।
★ जेनेवा समझौता (मई 1954)
- हिन्द-चीन की इस भयंकर समस्या को सुलझाने और बातचीत करने के लिए मई 1954 में जेनेवा में एक सम्मेलन (Meeting) बुलाया गया। इसे ही ‘जेनेवा समझौता’ कहा जाता है।
- इस समझौते ने पूरे वियतनाम को दो हिस्सों (उत्तरी और दक्षिणी) में बांट दिया:
- उत्तरी वियतनाम :– हनोई नदी से सटा उत्तर का यह पूरा इलाका साम्यवादियों (हो-ची-मिन्ह की सरकार) को दे दिया गया।
- दक्षिणी वियतनाम :– दक्षिण का यह हिस्सा अमेरिका के समर्थन वाली सरकार को सौंप दिया गया।
★ होआ-होआ आन्दोलन (Hoa-Hao Movement)
- यह एक बौद्धिष्ट धार्मिक क्रांतिकारी आन्दोलन था, जो वियतनाम में चल रहा था।
- यह आन्दोलन 1939 में शुरू हुआ था और इसके नेता का नाम हुइन्ह फू-सो (Huynh Phu So) था।
- यह आन्दोलन काफी आक्रामक (उग्र) हो गया था। इसके क्रांतिकारी लोग उग्रवादी घटनाओं को भी अंजाम देते थे, यहाँ तक कि इसमें आत्मदाह (खुद को आग लगा लेना) भी शामिल था।
- दक्षिणी वियतनाम के शासक न्यो दिन्ह दियम ने बहुत ही क्रूरता और बेरहमी के साथ इस आन्दोलन को दबाना और कुचलना शुरू किया।
★ लाओस और कम्बोडिया की स्थिति
- जेनेवा समझौते के बाद लाओस और कम्बोडिया की सरकार और शासन का तरीका बदल गया। वहाँ वैध राजतंत्र (राजा का नियम) को स्वीकार किया गया और साथ में संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) अपनाई गई।
- नियम के अनुसार इन्हें ‘तटस्थ देश’ (Neutral Countries – जो किसी गुट में शामिल न हों) माना गया था।
- इसके बावजूद इन देशों में भी साम्यवादियों (कम्युनिस्टों) का असर लगातार बढ़ता जा रहा था। दूसरी तरफ, अमेरिका किसी भी कीमत पर इन क्षेत्रों को साम्यवादियों के प्रभाव में जाने से रोकने के लिए पूरी तरह अड़ा हुआ था।
★ लाओस में गृह-युद्ध
- जेनेवा समझौते के बाद लाओस में एक स्वतंत्र सरकार तो बनी, लेकिन जल्द ही वहाँ के लोग आपस में ही लड़ने लगे। लाओस में तीन बड़े पक्ष बन गए थे:
- सरकारी पक्ष :– इसके नेता सुवन्ना फूमा थे। ये बीच का रास्ता चलने वाले (तटस्थ) थे।
- वामपंथी (साम्यवाद) :– इसके नेता सुफानूवोंग थे और इनकी पार्टी का नाम ‘पाथेट लाओ’ था। इन्हें कम्युनिस्टों का पूरा साथ था।
- दक्षिणपंथी :– ये साम्यवाद के पूरी तरह खिलाफ थे और इन्हें अमेरिका का पूरा समर्थन मिल रहा था।
- सुवन्ना फूमा ने देश को संभालने के लिए साम्यवादियों को भी सरकार में शामिल किया, लेकिन अमेरिका को यह पसंद नहीं आया। अमेरिका ने सुवन्ना फूमा को मिलने वाली मदद बंद कर दी और दक्षिणपंथी नेता फूमी नोसावन की मदद करके लाओस में गृह-युद्ध शुरू करवा दिया।
- पाथेट लाओ (साम्यवादियों) ने फूमी नोसावन की सेना को हरा दिया और देश के बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया।
- हालात बिगड़ते देख जेनेवा में फिर से एक बैठक हुई और 14 देशों ने मिलकर लाओस को एक स्वतंत्र और तटस्थ देश माना। सुवन्ना फूमा फिर से प्रधानमंत्री बने और एक मिली-जुली सरकार बनी, लेकिन अंदरूनी झगड़ा चलता रहा।
★ कम्बोडिया का संकट और नरोत्तम सिंहानुक
- जेनेवा समझौते के बाद कम्बोडिया को एक स्वतंत्र देश माना गया और वहाँ राजा का शासन (राजतंत्र) चलने लगा।
- कम्बोडिया के शासक नरोत्तम सिंहानुक थे। उन्होंने तटस्थता की नीति अपनाई, यानी न तो वे अमेरिका के गुट में गए और न ही रूस-चीन के साम्यवाद वाले गुट में।
- अमेरिका चाहता था कि कम्बोडिया साम्यवादियों के खिलाफ उसका साथ दे, लेकिन सिंहानुक के मना करने पर अमेरिका नाराज हो गया और उनके खिलाफ साजिश रचने लगा।
- 1970 में जब नरोत्तम सिंहानुक देश से बाहर गए थे, तब अमेरिका के समर्थन से जनरल लोन नोल ने तख्तापलट कर दिया और कम्बोडिया की सत्ता पर कब्जा कर लिया।
- सिंहानुक ने चीन (पेकिंग) में शरण ली और वहाँ ‘नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ कम्पूचिया’ बनाया। उन्होंने कम्बोडिया की साम्यवादी सेना ‘खमेर रूज’ के साथ हाथ मिला लिया और लोन नोल की सरकार के खिलाफ भयंकर युद्ध शुरू कर दिया।
- खमेर रूज सेना के आगे लोन नोल टिक नहीं पाए और 1975 में वे देश छोड़कर भाग गए। फिर से नरोत्तम सिंहानुक कम्बोडिया के प्रधान बने।
- 1976 में कम्बोडिया का नाम बदलकर ‘कम्पूचिया’ कर दिया गया और वहाँ साम्यवादी सरकार बनी। बाद में सिंहानुक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
★ वियतनाम युद्ध में अमेरिका का प्रवेश
- जेनेवा समझौते के बाद दक्षिणी वियतनाम में अमेरिका के समर्थन से न्यो दिन्ह दियम का राज चल रहा था, जो बहुत भ्रष्ट और तानाशाह था।
- दियम के अत्याचारों से परेशान होकर दक्षिणी वियतनाम के लोगों ने एक जनता का संगठन बनाया, जिसे ‘वियतकांग’ (National Liberation Front) कहा गया। इन्हें उत्तरी वियतनाम के हो-ची-मिन्ह का पूरा साथ मिला।
- वियतकांग के हमलों से दियम की सरकार गिरने लगी। तब अमेरिका ने 1964 में अपनी पूरी फौज और खतरनाक हथियार वियतनाम युद्ध में उतार दिए। अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम पर भयंकर बमबारी शुरू कर दी।
★ अमेरिका की खूंखार और क्रूर नीतियां
अमेरिका ने वियतनाम के आम और निर्दोष लोगों को मारने के लिए ऐसे-Scale पर खतरनाक तरीके अपनाए जो इतिहास में कभी नहीं देखे गए:
- यह एक ऐसा खतरनाक जहर था जिसे पेड़ों पर छिड़कने से उनकी पत्तियां तुरंत गिर जाती थीं और पेड़ सूख जाते थे। अमेरिका ने इसका इस्तेमाल वियतनाम के जंगलों और फसलों को खत्म करने के लिए किया ताकि वियतकांग के सैनिकों के छिपने की जगह न बचे।
- यह जहर इतना खतरनाक था कि इससे आम जनता की त्वचा (स्किन) जल जाती थी और लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होने लगे। इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पर पड़ा। इसका नाम उन नारंगी रंग के ड्रमों पर रखा गया था जिनमें यह जहर भरकर लाया जाता था।
★ नापाम बम (Napalm)
- यह एक तरह का ऑर्गेनिक कंपाउंड (रसायन) था जिसे गैसोलीन (पेट्रोल) के साथ मिलाकर एक चिपचिपा और आग पकड़ने वाला गोंद जैसा बम बनाया जाता था।
- यह बम जब फटता था, तो इसका केमिकल इंसानों की त्वचा से चिपक जाता था और शरीर को जिंदा जला देता था। अमेरिका ने इसका इस्तेमाल आम जनता और सीधे गांवों पर बड़े पैमाने पर किया।
★ माई ली गाँव की घटना (शर्मसार करने वाला कत्लेआम)
- दक्षिणी वियतनाम का एक छोटा सा गाँव था, जिसका नाम था ‘माई ली’ (My Lai)।
- अमेरिकी सैनिकों को शक था कि इस गाँव में वियतकांग के सैनिक छुपे हुए हैं। इसलिए अमेरिकी सेना ने पूरे गाँव को चारों तरफ से घेर लिया।
- अमेरिकी सैनिकों ने गाँव के सभी पुरुषों को गोली मार दी। इसके बाद महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ बदसलूकी (रेप) करने के बाद उन्हें भी जिंदा जला दिया। पूरे गाँव में आग लगा दी गई और सब कुछ तबाह कर दिया गया। इस पूरे कत्लेआम में सिर्फ एक बूढ़ा आदमी किसी तरह जिंदा बच गया था, जिसने बाद में दुनिया को इस दरिंदगी की कहानी बताई। जब यह बात अखबारों में छपी, तो पूरी दुनिया में अमेरिका की थू-थू (कड़ी निंदा) हुई। खुद अमेरिका के अंदर भी लोग अपनी ही सरकार और सेना के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।
★ कंबोडियाई संकट
- 1954 में स्वतंत्र होने के बाद कंबोडिया में राजकुमार नरोत्तम सिंहानुक का शासन आया। उन्होंने अमेरिका या सोवियत संघ किसी की तरफ झुकने के बजाय ‘गुटनिरपेक्षता’ और तटस्थता की नीति अपनाई।
- अमेरिका दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना दबदबा बनाना चाहता था। सिंहानुक के किसी सैन्य गुट में शामिल न होने से चिढ़कर, अमेरिका ने थाईलैंड को उकसा कर कंबोडिया को परेशान करना शुरू कर दिया।
- अमेरिका की इन चालों से नाराज होकर, 1963 में सिंहानुक ने अमेरिका से किसी भी तरह की मदद लेने से साफ़ इंकार कर दिया। मई 1965 में जब अमेरिका ने कंबोडिया के सीमावर्ती गांवों पर हमला किया, तो सिंहानुक ने अमेरिका से सारे कूटनीतिक (राजनयिक) रिश्ते तोड़ लिए।
- 1969 में अमेरिका ने हवाई जहाज से कंबोडिया के सीमावर्ती क्षेत्रों में जहर छिड़कवा दिया, जिससे लगभग 40 हजार एकड़ रबर की फसल बर्बाद हो गई। इस नुकसान के बाद सिंहानुक का झुकाव रूस और पूर्वी जर्मनी (साम्यवादी देशों) की तरफ बढ़ने लगा।
- अमेरिका को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि कंबोडिया साम्यवादी (कम्युनिस्ट) देशों के प्रति सहानुभूति रखे। अमेरिका ने सिंहानुक पर आरोप लगाया कि उनके संबंध उत्तरी वियतनाम और वियतकांग विद्रोहियों से हैं। इसी वजह से अमेरिका ने अपनी खुफिया एजेंसी (सी.आई.ए.) के जरिए कंबोडिया की राजनीति में दखल देना शुरू कर दिया।
★ कम्बोडियाई संकट और तख्तापलट (1970)
- 18 मार्च 1970 को कम्बोडिया की राष्ट्रीय संसद ने सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा नरोत्तम सिंहानुक को सत्ता से हटा दिया।
- जनरल लोन नोल के नेतृत्व में नई सरकार बनी, जिसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त था।
- नरोत्तम सिंहानुक ने पेकिंग (बीजिंग) में ‘निर्वासित सरकार’ का गठन किया और लोन नोल सरकार को अवैध घोषित कर राष्ट्रीय संसद को भंग कर दिया।
★ कम्बोडिया का गृहयुद्ध और अमेरिकी हस्तक्षेप
- सिंहानुक ने नई सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। उन्हें उत्तरी वियतनाम एवं वियतकांग सैनिकों से भरपूर मदद मिली।
- जब सिंहानुक की सेना राजधानी ‘नामपेन्ह’ की ओर बढ़ने लगी, तब अमेरिकी फौज ने दक्षिणी वियतनाम से कम्बोडिया में प्रवेश कर हस्तक्षेप किया।
- अमेरिकी जनता ने राष्ट्रपति निक्सन की इस नीति का भारी विरोध किया। निक्सन को सेना वापस बुलाने की घोषणा करनी पड़ी, लेकिन दक्षिणी वियतनाम ने अपनी सेना कम्बोडिया में ही रहने दी, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।
- स्थिति को देखते हुए इंडोनेशिया के प्रस्ताव पर 16 मई 1970 को जकार्ता में एक एशियाई सम्मेलन बुलाया गया, लेकिन इससे कम्बोडिया की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
★ सत्ता परिवर्तन और कम्पुचिया का उदय
- युद्ध और बमबारी के बीच 9 अक्टूबर 1970 को कम्बोडिया को ‘गणराज्य’ घोषित किया गया।
- 5 वर्ष के संघर्ष के बाद सिंहानुक की लाल खुमेरी (Khmer Rouge) सेना विजयी हुई और अप्रैल 1975 में जनरल लोन नोल को देश छोड़कर भागना पड़ा। इसके साथ ही गृहयुद्ध समाप्त हुआ।
- नरोत्तम सिंहानुक पुनः राष्ट्राध्यक्ष बने (जिन्होंने 1978 में राजनीति से संन्यास ले लिया) और कम्बोडिया का नाम बदलकर कम्पुचिया कर दिया गया।
★ पोलपोट का आतंक और वियतनामी/रूसी हस्तक्षेप
- सिंहानुक के बाद इन्होंने अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के अनुरूप शासन शुरू किया, जो पूरी तरह आतंक का दौर था।
- 1979 में हेंग सामरिन ने एक संयुक्त मोर्चे का गठन कर खिऊ सम्फान और पोलपोट को पराजित कर दिया।
- इस स्थिति के बाद रूस और चीन आमने-सामने आ गए। चीन ने वियतनाम पर आक्रमण कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
★ गृह युद्ध की पृष्ठभूमि और कारण
- जेनेवा समझौते के तहत वियतनाम दो भागों में बंट गया था—उत्तरी वियतनाम (साम्यवादी सरकार) और दक्षिणी वियतनाम (पूंजीवादी समर्थित सरकार)।
- समझौते के अनुसार मध्य 1956 तक चुनाव कराकर वियतनाम का एकीकरण होना था, लेकिन दक्षिणी वियतनाम की सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई।
- एकीकरण के पक्ष में और दक्षिणी वियतनाम की दमनकारी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति सेना (वियतकांग) का गठन हुआ, जिसने हिंसक संघर्ष शुरू कर दिया।
- दक्षिणी वियतनाम में आपातकाल लागू हुआ और गृह युद्ध पूरी तरह भड़क उठा।
★ अमेरिकी हस्तक्षेप की शुरुआत
- अमेरिका ने “शांति को खतरा” नाम से श्वेत पत्र जारी कर उत्तरी वियतनाम की हो-ची-मिन्ह सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
- अमेरिका ने वियतनाम में साम्यवाद के प्रभाव को रोकने के लिए अपने 4000 सैनिकों को सौगॉन भेजा।
- दक्षिणी वियतनाम के तानाशाह न्यो-दिन्ह-दियम के अत्याचारों और धार्मिक असहिष्णुता के कारण बौद्ध जनता आत्मदाह करने लगी। 1963 में सेना ने विद्रोह कर दियम की हत्या कर दी, लेकिन इसके बाद भी सरकारें बदलती रहीं और अस्थिरता बनी रही।
★ युद्ध का भयानक रूप और घातक हथियारों का प्रयोग
- अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम के सैन्य अड्डों पर सीधा आक्रमण कर उन्हें तबाह कर दिया। रूस और चीन की चेतावनियों का अमेरिका पर कोई असर नहीं हुआ।
- 1967 तक अमेरिका ने उत्तरी वियतनाम पर इतने बम गिराए जितने द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी ने इंग्लैंड पर भी नहीं गिराए थे। पूरे-के-पूरे गांवों को आग के हवाले कर दिया गया।
- अमेरिका ने युद्ध में विनाशकारी रासायनिक हथियारों का खुलकर इस्तेमाल किया:
हथियार / रसायन | विवरण |
नापाम (Napalm) | यह एक ऑर्गेनिक कम्पाउंड है जो अग्नि बमों में गैसोलिन के साथ मिलकर त्वचा से चिपक जाता है और लगातार जलता रहता है। |
एजेंट-ऑरेंज (Agent Orange) | यह एक ऐसा ज़हर था जिससे पेड़ों की पत्तियां तुरंत झुलस जाती थीं और पेड़ मर जाते थे। इसका असर आज भी वहाँ ‘जन्मजात विकलांगता’ के रूप में दिखता है। |
फास्फोरस बम | अत्यधिक विनाशकारी और आग लगाने वाले बम। |
★ हो-ची-मिन्ह मार्ग (भूल-भुलैया मार्ग)
- यह मार्ग उत्तरी वियतनाम से हनोई से शुरू होकर लाओस, कम्बोडिया के सीमा क्षेत्र से गुजरता हुआ दक्षिणी वियतनाम तक जाता था। इसके जरिए वियतनामियों को रसद और सैन्य सहायता पहुंचाई जाती थी।
- अमेरिका ने इस मार्ग को सैकड़ों बार बमबारी कर क्षतिग्रस्त किया, लेकिन वियतकांग और उनके समर्थक तुरंत इसकी मरम्मत कर लेते थे। नियंत्रण स्थापित करने के लिए अमेरिका ने लाओस और कम्बोडिया पर भी आक्रमण किया, लेकिन तीन तरफा संघर्ष में फंसकर उसे पीछे हटना पड़ा।
★ प्रतिरोध, आर्थिक मंदी और शांति वार्ता (1968-1969)
- वियतनामी लोग अपने अस्तित्व और राष्ट्र के लिए लड़ रहे थे। महिलाएं अपनी पीठ पर बच्चों को बांधकर बंदूक लिए गश्ती लगाती थीं और हो-ची-मिन्ह मार्ग की मरम्मत करती थीं। ‘त्रि-अयू’ की कहानी इस काल में प्रेरणा का स्रोत बनी।
- अमेरिकी कार्रवाइयों का वैश्विक स्तर पर भारी विरोध हुआ। प्रसिद्ध दार्शनिक रसेल ने एक विशेष अदालत (न्यायाधिकरण) लगाकर अमेरिका को युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराया।
- युद्ध के कारण अमेरिका का प्रतिवर्ष 2 से 2.5 अरब डॉलर खर्च हो रहा था, जिससे अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर गया और अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो गई।
- पेरिस में शांति वार्ता शुरू हुई, लेकिन अमेरिकी हठ के कारण 6 महीने तक कोई नतीजा नहीं निकला। वियतनामी मांग कर रहे थे कि पहले अमेरिकी बमबारी पूरी तरह बंद हो।
- इसी संघर्ष के दौरान वियतनामी राष्ट्रीयता के जनक हो-ची-मिन्ह का निधन हो गया, लेकिन अपनी वसीयत में उन्होंने मुक्ति तक संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया था, जिसके कारण युद्ध आगे भी चलता रहा।
★ अमेरिकी नीति में बदलाव और राष्ट्रपति निक्सन
- अमेरिकी अत्याचारों के कारण अब हॉलीवुड में वियतनाम युद्ध को जायज ठहराने वाली फिल्मों के स्थान पर अमेरिकी क्रूरता को उजागर करने वाली फिल्में बनने लगीं।
- निक्सन नए अमेरिकी राष्ट्रपति बने। उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और वियतनाम समस्या का जल्द समाधान करने की भारी जिम्मेदारी थी।
★ निक्सन की शांति योजनाएँ और अमेरिकी शर्तें
निक्सन की पाँच सूत्री योजना
- हिन्द-चीन की सभी सेनाएँ युद्ध बंद कर यथास्थान पर रहें।
- युद्ध विराम की देख-रेख अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक करेंगे।
- इस दौरान कोई देश अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करेगा।
- युद्ध विराम के दौरान सभी तरह की लड़ाइयाँ बंद रहेंगी।
- युद्ध विराम का अंतिम लक्ष्य समूचे हिन्द-चीन के संघर्ष का अंत होगा।
- इस शांति प्रस्ताव को वियतनामियों द्वारा अस्वीकार करने पर अमेरिकी सेना ने पुनः बमबारी शुरू कर दी। इसके बाद निक्सन ने आठ सूत्री योजना भी रखी, जिसे भी खारिज कर दिया गया।
★ अमेरिका की शर्तें (समानांतर मांगें)
- दक्षिणी वियतनाम की स्वतंत्रता बनी रहे।
- अमेरिकी सेनाएँ उस क्षेत्र में मौजूद रहेंगी।
- जब तक वियतकांग संघर्ष और दक्षिणी वियतनाम में आतंक जारी रखेगा, अमेरिकी बमबारी चलती रहेगी।
★ भीषण बमबारी और पेरिस शांति समझौता (1973)
- वार्ता विफल होने पर अमेरिका ने वियतनाम पर इतने बम गिराए जिनकी कुल विध्वंसक शक्ति हिरोशिमा में प्रयुक्त परमाणु बम से भी ज्यादा आंकी गई। राजधानी हनोई भी ध्वस्त हो गई, पर वियतनामी डटे रहे।
- अंततः दोनों पक्षों ने पेरिस शांति समझौता 27 फरवरी 1973 पर हस्ताक्षर किए।
- समझौते की मुख्य बातें:
- युद्ध समाप्ति के 60 दिनों के भीतर अमेरिकी सेना वापस चली जाएगी।
- उत्तर और दक्षिण वियतनाम परस्पर सलाह करके एकीकरण का मार्ग खोजेंगे।
- अमेरिका वियतनाम को असीमित आर्थिक सहायता देगा।
★ वियतनाम का एकीकरण और युद्ध के परिणाम
- अप्रैल 1975 में उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम का पूर्ण एकीकरण हो गया।
- युद्ध का हर्जाना और नुकसान:
प्रभावित क्षेत्र | नुकसान का विवरण |
वित्तीय खर्च | इस युद्ध में लगभग 9,855 करोड़ डॉलर खर्च हुए। |
अमेरिकी सैनिक | 56,000 से अधिक सैनिक मारे गए और लगभग 3 लाख सैनिक घायल हुए। |
दक्षिणी वियतनामी सैनिक | लगभग 18,000 सैनिक मारे गए। |
सैन्य संसाधन (अमेरिका) | अमेरिका के 4,800 हेलीकॉप्टर एवं 3,600 टैंक नष्ट हो गए। |
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