Biology Chapter 1 Class 10th Notes

Biology Chapter 1 Class 10th Notes || जैव प्रक्रम (Life Processes) Class 10th

Biology Chapter 1 Class 10th Notes

Biology ( जीव विज्ञान )

Class 10th       Chapter 1

जैव प्रक्रम (Life Processes)

Full Chapter Explanation & Notes

 

जीविज्ञान किसे कहते हैं?

☞ विज्ञान की वह शाखा जिसमें हम जीव एवं जंतुओं का अध्ययन करते हैं। उसे हम जीव विज्ञान कहते है।

☞ जीव विज्ञान का जनक “अरस्तू” को कहा जाता है। 1802 ई. में लैमार्क और ट्रेविरेनस ने जीव विज्ञान शब्द का नाम दिया।

☞ Biology (जीव विज्ञान) शब्द ग्रीक से लिया गया है। Biology दो शब्दों से मिलकर बना है। बॉयोस (Bio) जिसका अर्थ “जीवन” और लोगस (logous) जिसका अर्थ “अध्ययन” होता है। दोनो मिलकर Biology शब्द का निर्माण हुआ।

 “अथवा”

जीवन के बारे में जो अध्ययन करते हैंउसे हम बायोलॉजी कहते हैं

सबसे सरल :- विज्ञान की वह शाखा जिसमें हम ज़िंदा चीज़ों के बारे में पढ़ते हैं। चाहे वह एक छोटा सा बैक्टीरिया हो, पेड़-पौधे हों, या हम और आप जैसे इंसान — अगर उसमें जान है, तो वह बायोलॉजी के अंदर आता है।

 

★  सजीव और निर्जीव में क्या अंतर है? (Living vs Non-living)

हमारे आस-पास दो तरह की चीजें होती हैं:

  • निर्जीव (Non-living) :- जिनमें जान नहीं होती, जो खुद से हिल-डुल या बढ़ नहीं सकते। जैसे— पहाड़, मकान, साइकिल, जमीन, या आसमान।
  • सजीव (Living) :- जिनमें जान होती है। जैसे— पेड़-पौधे, इंसान, जानवर, पक्षी और छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े।

सजीव का पता कैसे चलता है

सजीवों के शरीर में कुछ ऐसी खास क्रियाएँ (Biological Processes) चलती रहती हैं, जिनसे उनकी पहचान होती है

  • जैसे चिड़ियों का उड़ना, कुत्तों का दौड़ना या गाय-भैंस का जुगाली करना।
  • जब कोई जानवर या इंसान सो रहा होता है, तब भी उसकी छाती ऊपर-नीचे होती है (साँस लेना)। इससे पता चलता है कि वह जिंदा है।
  • एक छोटा सा बीज धीरे-धीरे बढ़कर बड़ा पेड़ बन जाता है। हालांकि, पौधों का बढ़ना हमें तुरंत आँखों से हिलते हुए नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ उनमें ग्रोथ (वृद्धि) होती है।

 

 आणविक गति क्या है? (अदृश्य हलचल)

शरीर के अंदर वो हलचल जो आँखों से दिखाई नहीं देती, लेकिन जीवन के लिए सबसे जरूरी है। ये हमारे शरीर में बहुत छोटे-छोटे अणुओं (Molecules) से मिलकर बना है। जो शरीर को जिंदा रखने के लिए इन अणुओं का अंदर ही अंदर चलते रहना बहुत जरूरी है। अगर यह अंदरूनी हलचल रुक गई, तो समझो जिंदगी रुक गई।

  • वायरस के पास अपनी कोई आणविक गति नहीं होती। इसलिए जब तक वह हवा या टेबल पर पड़ा रहता है, वह मरे हुए (निर्जीव) के समान होता है। लेकिन जैसे ही वह किसी इंसान या पौधे के शरीर के अंदर घुसता है, उसकी आणविक गति शुरू हो जाती है और वह जिंदा (सजीव) हो जाता है। इसीलिए वैज्ञानिक इसे सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी मानते हैं।

 

 जीवद्रव्य (Protoplasm)

  • हमारा शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं (Cells) से बना है।
  • इन कोशिकाओं के अंदर एक खास तरह का लिक्विड या पदार्थ पाया जाता है जिसे जीवद्रव्य (Protoplasm) कहते हैं।
  • यह जीवद्रव्य खास तरह के प्रोटीन (न्यूक्लियोप्रोटीन) और अन्य तत्वों से मिलकर बनता है।
  • सजीवों के जितने भी लक्षण हैं (जैसे साँस लेना, पचना), वो सब इसी जीवद्रव्य के कारण हैं। इसीलिए इसे जीवन का मूलाधार (Base of Life) कहा जाता है। निर्जीव चीजों (जैसे पत्थर या कुर्सी) में यह जीवद्रव्य और इसकी आणविक गति नहीं होती।

जैव प्रक्रम (Life Processes)

  • वे सारी क्रियाएँ जो जीवों को जिंदा रखने के लिए और उनके शरीर की मरम्मत (maintenance) के लिए जरूरी हैं, उन्हें जैव प्रक्रम कहते हैं।
  • Example :- जैसे किसी गाड़ी को चालू रखने और ठीक रखने के लिए सर्विसिंग, पेट्रोल और इंजन का चलना जरूरी है, वैसे ही हमारे शरीर को जिंदा रखने के लिए अंदरूनी अंगों का काम करना जरूरी है। चाहे हम सो रहे हों, बैठे हों या क्लास में पढ़ रहे हों, शरीर के अंदर का यह “मेंटेनेंस का काम” लगातार चलता रहता है।

 जैव प्रक्रम के अंतर्गत आने वाली मुख्य क्रियाएँ

शरीर को जिंदा रखने के लिए नीचे दिए गए चार काम सबसे जरूरी हैं:

  1. पोषण (Nutrition) :- भोजन करना और उससे ऊर्जा (energy) लेना।
  2. श्वसन (Respiration) :- साँस लेना और ऑक्सीजन की मदद से भोजन को ऊर्जा में बदलना।
  3. परिवहन (Transportation) :- शरीर में जरूरी चीजों (जैसे ऑक्सीजन, खाना) को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना।
  4. उत्सर्जन (Excretion) :- शरीर के कचरे को बाहर निकालना।

 एककोशिकीय और बहुकोशिकीय जीवों में अंतर

  • एककोशिकीय जीव (Amoeba) :- इनका पूरा शरीर सीधे बाहर के पर्यावरण से जुड़ा रहता है। इसलिए इन्हें भोजन लेने, गैसों का आदान-प्रदान (oxygen- CO2) करने या कचरा बाहर निकालने के लिए किसी खास अंग की जरूरत नहीं होती। ये सीधे त्वचा से ही सारा काम कर लेते हैं।
  • बहुकोशिकीय जीव (इंसान, जानवर) :- हमारा शरीर बहुत बड़ा और जटिल है। हमारी सारी कोशिकाएँ (cells) बाहर के पर्यावरण के सीधे संपर्क में नहीं रहतीं। इसलिए हममें विसरण (diffusion – सीधे सोखने की साधारण क्रिया) से काम नहीं चल पाता।

परिवहन तंत्र (Transport System) क्यों जरूरी है?

बहुकोशिकीय जीवों में भोजन और ऑक्सीजन को शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुँचाने के लिए एक खास सिस्टम होता है, जिसे परिवहन तंत्र कहते हैं।

  • उत्सर्जन (Excretion): जब शरीर में काम होता है, तो कुछ हानिकारक कचरा (waste products) भी बनता है। इस कचरे को शरीर से बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। सरल जीवों में यह विसरण से होता है, लेकिन बड़े जीवों में इसके लिए विशेष अंग (जैसे Kidney) होते हैं।

 

पोषण (Nutrition)

  • जब हम दौड़ते हैं, खेलते हैं या कोई काम करते हैं, तो हमारे शरीर की ऊर्जा (energy) खर्च होती है।
  • यहाँ तक कि जब हम सो रहे होते हैं, तब भी शरीर के अंदर के अंगों को काम करने के लिए ऊर्जा चाहिए।
  • साथ ही, शरीर में टूट-फूट को ठीक करने और नई कोशिकाओं (cells) के बनने के लिए बाहर से भोजन (Nutrients) की जरूरत होती है। इसी को पोषण कहते हैं।

 पोषण की परिभाषा

वह विधि जिससे जीव पोषक तत्वों (Nutrients) को ग्रहण कर उनका उपयोग करते हैं, उसे पोषण कहते हैं।

 

 पोषण की विधियाँ (Modes of Nutrition)

पोषण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

(i) स्वपोषण (Autotrophic Nutrition)

  • यह ग्रीक शब्द ऑटो (Auto = खुद) और ट्रॉफ (Troph = पोषण) से मिलकर बना है। यानी जो अपना भोजन खुद बनाए।
  • ऐसे जीव जो भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर न रहकर अपना भोजन खुद बनाते हैं, उन्हें स्वपोषी (Autotrophs) कहते हैं।
  • पौधे भोजन कैसे बनाते हैं?
    • पौधों की पत्तियों में हरितलवक या क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) पाया जाता है।
    • इस क्लोरोप्लास्ट के अंदर एक हरे रंग का वर्णक (pigment) होता है, जिसे पर्णहरित या क्लोरोफिल (Chlorophyll) कहते हैं। इसी के कारण पत्तियाँ हरी दिखती हैं।
    • पौधे सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा लेते हैं, हवा से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और मिट्टी से पानी (H2O) लेकर अपना भोजन (कार्बोहाइड्रेट/ग्लूकोज) खुद बनाते हैं। इस पूरी क्रिया को प्रकाशसंश्लेषण (Photosynthesis) कहते हैं।

(ii) परपोषण (Heterotrophic Nutrition)

  • यह ग्रीक शब्द हेटरो (Hetero = विषम/दूसरा) और ट्रॉफ (Troph = पोषण) से बना है। यानी जो भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हो।
  • वह प्रक्रिया जिसमें जीव अपना भोजन खुद न बनाकर किसी-न-किसी रूप में अन्य स्रोतों (पौधों या जीवों) से प्राप्त करते हैं, उसे परपोषण कहते हैं।
  • सभी जंतु और कवक (Fungi), क्योंकि इनमें क्लोरोफिल नहीं होता। इन्हें परपोषी (Heterotrophs) कहा जाता है।

 स्वपोषण और परपोषण में मूल (असली) अंतर

स्वपोषण (Autotrophic)

परपोषण (Heterotrophic)

इसमें जीव बाहर से सरल अकार्बनिक अणुओं (जैसे CO2 और पानी) को लेकर अंदर जटिल कार्बनिक अणु (ग्लूकोज/भोजन) बनाता है।

इसमें जीव बाहर से बने-बनाए जटिल कार्बनिक अणुओं (भोजन) को खाता है और शरीर के अंदर उसे तोड़कर सरल अणुओं में बदलता है।

सरल / जटिल

जटिल / सरल

परपोषण के प्रकार (Types of Heterotrophic Nutrition)

परपोषण मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है। इसे आसान शब्दों में कहें तो दूसरों से भोजन छीनकर या मांगकर खाने के तीन अलग-अलग तरीके हैं:

  1. मृतजीवी पोषण (Saprophytic Nutrition)
  • यह ग्रीक शब्द सैप्रोस से बना है।
  • इसमें जीव मरे हुए पेड़-पौधों और सड़े-गले जंतुओं के शरीर से अपना भोजन तरल (liquid) रूप में सोखकर लेते हैं।
  • ऐसे जीवों को मृतजीवी (Saprophytes) कहते हैं।
  • कवक (Fungi), बैक्टीरिया और कुछ प्रोटोजोआ।

प्रकृति में मृतजीवी का सबसे बड़ा योगदान

  • अगर दुनिया में मृतजीवी न हों, तो मरे हुए जानवरों और सड़े पौधों का ढेर लग जाएगा।
  • ये मृतजीवी मरे हुए शरीरों को सड़ा-गलाकर मिट्टी में मिला देते हैं।
  • इससे मिट्टी को दोबारा ताकत मिलती है और पेड़-पौधे फिर से बढ़ पाते हैं। इसी वजह से इन्हें अपघटक (Decomposer) या प्रकृति का “सफाई कर्मचारी” कहा जाता है।

  1. परजीवी पोषण (Parasitic Nutrition)
  • यह ग्रीक शब्द पारा और साइटोस से बना है। यानी किसी के पास रहकर खाना।
  • इसमें एक जीव किसी दूसरे जीव के शरीर के संपर्क में (स्थायी या अस्थायी रूप से) रहकर, बिना उसे जान से मारे अपना भोजन उससे हासिल करता है।
  • लड़ाई का नियम
    • परजीवी (Parasite) :- जो मुफ्त का खाना खाता है और नुकसान पहुँचाता है।
    • पोषी (Host) :- जिसके शरीर पर परजीवी रहता है और जिसका नुकसान होता है।
    • पौधों में :- अमरबेल (Cuscuta – पीले रंग की लती जो दूसरे पेड़ों पर फैलती है)।
    • जंतुओं में :- गोलकृमि, हुकवर्म, टेपवर्म (पेट के कीड़े), एंटअमीबा हिस्टोलीटिका और मलेरिया परजीवी (Plasmodium)।

  1. प्राणिसम पोषण (Holozoic Nutrition)
  • यह ग्रीक शब्द होलो और जोइक से बना है। यानी जानवरों की तरह खाना।
  • वैसा पोषण जिसमें जीव जंतुओं की तरह ठोस (Solid) या तरल (Liquid) भोजन को मुँह द्वारा अंदर ग्रहण करता है (खिलाता है) और फिर शरीर के अंदर उसका पाचन करता है।
  • ऐसे जीवों को प्राणिसमभोजी कहते हैं।
  • हम इंसान, अमीबा, मेंढक, कुत्ता, बिल्ली आदि।

 

जीवों में पोषण प्राप्त करने की विधियाँ

  • सभी जीवों के शरीर की बनावट अलग होती है, इसलिए उनके भोजन लेने का तरीका भी अलग होता है।
  • एककोशकीय जीव (जैसे अमीबा) : इनका शरीर सिर्फ एक सेल का होता है, इसलिए ये अपने शरीर की पूरी सतह (skin) से कहीं से भी भोजन पकड़ लेते हैं।
  • बहुकोशकीय जीव (जैसे इंसान) : इनका शरीर बहुत बड़ा होता है, इसलिए इनमें भोजन पकड़ने और पचाने के लिए खास अंग (जैसे मुँह, पेट, आहारनाल) होते हैं।

पौधों में पोषण (Nutrition in Plants)

भोजन बनाने के तरीके के आधार पर पौधों को भी अलग-अलग भागों में बाँटा गया है:

  1. स्वपोषी पौधे: जो पौधे प्रकाशसंश्लेषण (Photosynthesis) की मदद से अपना भोजन खुद बनाते हैं।
  2. परपोषी पौधे: जो पौधे अपना भोजन खुद नहीं बना पाते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं। ये दो तरह के होते हैं:
    • मृतजीवी पौधे : जो सड़े-गले पदार्थों से भोजन सोखते हैं। जैसे— गोबरछत्ता (Mushroom)
    • परजीवी पौधे : जो दूसरे जीवित पौधों से अपना भोजन छीनते हैं। जैसे— अमरबेल (Cuscuta)

प्रकाशसंश्लेषण क्या है?

  • जिस प्रक्रिया द्वारा हरे पौधे अपना भोजन तैयार करते हैं, उस मूलभूत प्रक्रिया को प्रकाशसंश्लेषण कहते हैं।
  • पौधे सूर्य के प्रकाश की गर्मी को सोखते हैं। फिर हवा से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और जड़ से पानी (H2O) लेकर उसे ग्लूकोज (भोजन/कार्बोहाइड्रेट) में बदल देते हैं। इस क्रिया में सूर्य की रोशनी (लाइट एनर्जी) केमिकल एनर्जी में बदलकर भोजन में जमा हो जाती है।

 

प्रकाशसंश्लेषण का रासायनिक समीकरण

6CO2 + 12H2O सूर्य-प्रकाश / क्लोरोफिल C6H12O6 + 6O2 + 6H2O

Note :- इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन (O2) गैस कचरे या उपोत्पाद के रूप में बनती है, जिसे पौधे हवा में छोड़ देते हैं और इसी ऑक्सीजन से हम सब साँस लेते हैं।

प्रकाशसंश्लेषण का स्थान

यह काम पौधे के किस हिस्से में होता है?

  • क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) :- पत्तियों के अंदर विशेष कोशिकाएं होती हैं जिन्हें पैलिसेड और स्पंजी पैरेन्काइमा कहते हैं। इनके अंदर बहुत सारे क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) भरे होते हैं। प्रकाशसंश्लेषण की पूरी प्रक्रिया इसी क्लोरोप्लास्ट के अंदर होती है।
  • क्लोरोफिल (Chlorophyll) :- क्लोरोप्लास्ट के अंदर ही हरे रंग का क्लोरोफिल पाया जाता है। यही सूरज की रोशनी को पकड़ने का काम करता है।
  • प्रकाशसंश्लेषी अंग : पत्ती (Leaf)
  • प्रकाशसंश्लेषी अंगक :- क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast)

 

स्टोमाटा या रंध्र (Stomata) — पत्तियों के छोटे छेद

पत्तियों की बाहरी त्वचा पर बहुत छोटे-छोटे छेद होते हैं, जिन्हें स्टोमाटा या रंध्र कहते हैं।

 

 स्टोमाटा का काम क्या है?

इन्हीं छेदों के रास्ते हवा से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) विसरण द्वारा पत्ती के अंदर घुसती है और ऑक्सीजन बाहर निकलती है।

 

 स्टोमाटा खुलता और बंद कैसे होता है?

स्टोमाटा के छेद को खोलने और बंद करने का काम इसके दोनों तरफ मौजूद द्वार कोशिकाएं या गार्ड सेल्स (Guard cells) करती हैं। यह सब पानी के खेल पर निर्भर करता है:

  • जब इन गार्ड सेल्स में आसपास से पानी अंदर घुसता है, तो ये कोशिकाएं फूल जाती हैं (Turgid हो जाती हैं) और छेद खुल जाता है।
  • जब पानी इन कोशिकाओं से बाहर निकल जाता है, तो ये सिकुड़ जाती हैं और छेद बंद हो जाता है।

प्रकाशसंश्लेषण के लिए आवश्यक घटक

हरे पौधों को अपना भोजन (प्रकाशसंश्लेषण) बनाने के लिए चार चीजों की जरूरत होती है:

  1. पर्णहरित या क्लोरोफिल (Chlorophyll)
  2. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
  3. जल (H2O)
  4. सूर्य-प्रकाश (Sunlight)

 

 पर्णहरित या क्लोरोफिल

  • रंग का भ्रम : बहुत से लोग सोचते हैं कि पौधा हरा होगा तभी उसमें प्रकाशसंश्लेषण होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ लाल और भूरे रंग के पौधों (जैसे समुद्री घास) में भी यह क्रिया होती है। पौधे का बाहरी रंग उतना मायने नहीं रखता, जितना उसके अंदर क्लोरोफिल का होना मायने रखता है।
  • प्रकाशसंश्लेषी इकाई :- क्लोरोफिल ही वह असली अणु (molecule) है जो सूरज की रोशनी को पकड़कर खाना बनाने की प्रक्रिया शुरू करता है। इसीलिए क्लोरोफिल अणुओं को प्रकाशसंश्लेषी इकाई कहते हैं।

 

 कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)

  • पौधे प्रकाशसंश्लेषण के लिए हवा से CO2 लेते हैं और बदले में ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
  • CO2 का सबसे बड़ा स्रोत हमारा वायुमंडल (Atmosphere) है।
  • वायुमंडल में सामान्य रूप से 0.03% कार्बन डाइऑक्साइड होती है
  • लकड़ी, कोयले और ईंधनों के जलने से, जीवाणुओं द्वारा कचरे के अपघटन से, और हम इंसानों/जानवरों के श्वसन (साँस छोड़ने) की क्रिया से CO2 लगातार वायुमंडल में मुक्त होती रहती है।

 जल (H2O) की आवश्यकता

  • पौधे अपने भोजन का ज्यादातर हिस्सा पानी से बनाते हैं। पानी के बिना पौधे सूखकर मर जाते हैं, इसलिए किसान खेतों की सिंचाई करते हैं।
  • पौधे अपनी जड़ों द्वारा जमीन से पानी और उसमें घुले खनिज लवण (जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, कैल्शियम, मैग्नीशियम, लोहा) सोखते हैं।
  • जड़ों द्वारा सोखा गया यह पानी जाइलम ऊतकों की पाइपलाइन द्वारा पत्तियों तक पहुँचता है।
  • नोट: नाइट्रोजन का उपयोग पौधे प्रोटीन बनाने में करते हैं। जलीय पौधे सीधे अपने बाहरी हिस्से से पानी सोख लेते हैं।

 सूर्य-प्रकाश (Sunlight) की आवश्यकता

  • अंधेरे में प्रकाशसंश्लेषण नहीं हो सकता क्योंकि सूरज की रोशनी ही इस काम के लिए ऊर्जा (Energy) देती है।
  • पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल सूरज की इस विकिरण ऊर्जा को पकड़ लेता है और उसे रासायनिक ऊर्जा (Chemical energy) में बदलकर ग्लूकोज के अणुओं में स्टोर कर देता है।

 

प्रकाशसंश्लेषण की क्रियाविधि (Mechanism of Photosynthesis)

यह एक जटिल प्रक्रिया है जो दो मुख्य चरणों (Steps) में पूरी होती है:

(i) प्रकाश अभिक्रिया (Light Reaction)

  • जब धूप हरी पत्तियों पर पड़ती है, तो क्लोरोफिल ऊर्जा सोखता है। इस ऊर्जा से पत्ती के अंदर मौजूद जल (H2O) दो भागों में टूट जाता है — हाइड्रोजन (H2) और ऑक्सीजन (O2)
  • रोशनी की मदद से पानी के टूटने की इसी क्रिया को Photolysis of water कहते हैं।
  • इसके बाद ऑक्सीजन स्टोमाटा के रास्ते बाहर हवा में निकल जाती है।

(ii) अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction)

  • पहले चरण में जो हाइड्रोजन बची थी, वह अब कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से मिलकर ग्लूकोज (भोजन) बनाती है।
  • इसे ‘अप्रकाशिक’ या Dark Reaction इसलिए नहीं कहते कि यह रात के अंधेरे में होती है, बल्कि इसलिए कहते हैं क्योंकि इस काम के लिए सीधे सूरज की रोशनी की जरूरत नहीं होती। यह उजाले और अंधेरे दोनों में एक समान रूप से चलती रहती है।

जंतुओं में पोषण (Nutrition in Animals)

  • जंतु अपने भोजन के लिए पूरी तरह से दूसरे जीवों (पौधों या जानवरों) पर निर्भर रहते हैं, इसलिए इन्हें परपोषी (Heterotrophs) कहा जाता है। अलग-अलग जंतुओं में भोजन को शरीर के अंदर लेने (अंतर्ग्रहण) का तरीका अलग-अलग होता है।

 अमीबा में पोषण (Nutrition in Amoeba)

अमीबा के बारे में 4 मुख्य बातें याद रखें:

  1. यह एक बहुत ही सरल प्राणिसमपोषी (Holozoic) जीव है।
  2. यह मीठे पानी (मृदुजलीय) में पाया जाता है।
  3. यह एककोशकीय (Single-celled) होता है।
  4. इसका आकार अनिश्चित (No fixed shape) होता है, जो लगातार बदलता रहता है।

 

अमीबा का भोजन:

शैवाल (algae) के छोटे टुकड़े, बैक्टीरिया, डायटम, अन्य छोटे एककोशिक जीव और मरे हुए कार्बनिक पदार्थों के छोटे टुकड़े।

अमीबा में पोषण के 3 मुख्य चरण

अमीबा के पास भोजन खाने के लिए मुँह जैसा कोई निश्चित स्थान नहीं होता। यह शरीर की सतह से कहीं से भी भोजन ले सकता है। यह पूरा काम 3 स्टेप्स में होता है:

  • (A) अंतर्ग्रहण :- अमीबा का आकार इसके शरीर में बनने वाले कूटपादों के कारण बदलता है।
    • जब कोई भोजन का कण अमीबा के करीब आता है, तो अमीबा भोजन के चारों ओर कूटपाद (नकली पैर) बनाने लगता है।
    • ये कूटपाद तेजी से बढ़कर भोजन को चारों तरफ से घेर लेते हैं और आपस में जुड़ जाते हैं। इस तरह शरीर के अंदर भोजन-रसधानी (Food vacuole) का निर्माण होता है, जिसमें भोजन के साथ थोड़ा पानी भी होता है।
  • (B) पाचन :- भोजन-रसधानी के अंदर एंजाइमों (Enzymes) द्वारा भोजन का पाचन होता है।
    • पचा हुआ भोजन रसधानी से निकलकर पूरे कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में फैल जाता है।
  • (C) बहिष्करण :- अमीबा में बिना पचे भोजन (कचरे) को बाहर निकालने के लिए भी कोई निश्चित अंग नहीं होता।
    • शरीर की सतह के किसी भी भाग पर एक अस्थायी छिद्र (Temporary hole) बनता है, जिससे अपचा भोजन बाहर फेंक दिया जाता है।

 

 पैरामिशियम में पोषण (Nutrition in Paramecium)

यह भी अमीबा की तरह ही पानी में रहने वाला एककोशकीय प्रोटोजोआ है, लेकिन इसमें और अमीबा में दो बड़े अंतर होते हैं:

विशेषता

अमीबा (Amoeba)

पैरामिशियम (Paramecium)

आकार (Shape)

अनिश्चित (लगातार बदलता है)

निश्चित (Fixed Shape)

भोजन का स्थान

शरीर में कहीं से भी (कूटपाद द्वारा)

शरीर में एक निश्चित स्थान से

पैरामिशियम में भोजन ग्रहण करने की विधि:

  • पैरामिशियम का पूरा शरीर छोटे-छोटे बालों जैसी रचना से ढँका होता है, जिसे सीलिया कहते हैं। इसका चलन अंगक (हिलने-डुलने वाला अंग) है।
  • पैरामिशियम में भोजन अंदर लेने के लिए एक फिक्स जगह होती है, जिसे कोशिकामुख या साइटोस्टोम कहते हैं।
  • सीलिया में लगातार एक खास गति (हलचल) होती रहती है, जो पानी में तैर रहे भोजन के कणों को धकेलकर सीधे कोशिकामुख (Cytostome) की तरफ ले जाती है और भोजन अंदर चला जाता है।

मनुष्य का पाचन तंत्र (Human Digestive System)

  • मनुष्य और उच्च श्रेणी के जंतुओं में भोजन को पचाने के लिए एक विशेष सिस्टम होता है, जिसे पाचन तंत्र कहते हैं।
  • इस तंत्र के दो मुख्य भाग होते हैं:
  1. आहारनााल :- वह लंबी नली जिससे होकर भोजन गुजरता है।
  2. पाचन ग्रंथियाँ :- जो भोजन पचाने के लिए पाचक रस बनाती हैं।

मनुष्य की आहारनाल (Alimentary Canal)

  • यह एक बहुत लंबी कुंडलित (घूमी हुई) नली होती है, जो हमारे मुँह (Mouth) से शुरू होकर मलद्वार (Anus) तक जाती है। इसकी लंबाई करीब 8 से 10 मीटर तक होती है।

★ इसके मुख्य भागों को क्रम (Sequence) से समझते हैं:

मुखगुहा (Mouth / Buccal Cavity)

  • आहारनाल का सबसे पहला भाग मुखगुहा (मुँह) होता है। यहीं से हम भोजन का अंतर्ग्रहण  करते हैं।
  • मुखगुहा को ऊपर से तालू (Palate), नीचे से जीभ और दोनों तरफ से जबड़े घेरे रहते हैं। मुखगुहा में दो सबसे जरूरी चीजें होती हैं— जीभ और दाँत:

जीभ (Tongue)

  • मुखगुहा के फर्श पर एक मोटी और मांसल (muscular) जीभ होती है। यह भोजन को निगलने में और उसे लार (Saliva) के साथ मिलाने में मदद करती है।
  • जीभ की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे अंकुर होते हैं, जिन्हें स्वाद कलिकाएँ कहते हैं। इन्हीं से हमें भोजन के मीठा, नमकीन, खट्टा और कड़वा होने का पता चलता है।

दाँत (Teeth)

  • मुखगुहा के ऊपरी और निचले, दोनों जबड़ों में दाँत धँसे होते हैं। दाँत का वह हिस्सा जो मसूड़े में रहता है उसे जड़ (Root) और जो बाहर दिखता है उसे शीर्ष या क्राउन (Crown) कहते हैं।
  • दाँत के ऊपर सफेद रंग की एक कड़ी परत होती है जिसे इनेमल कहते हैं। यह हमारे शरीर का सबसे कड़ा (hardest) भाग है और दाँत को सुरक्षा देता है।

 

मनुष्य के दाँत के प्रकार (Types of Teeth)

मनुष्य के मुँह में मुख्य रूप से चार प्रकार के दाँत होते हैं, और सबका काम अलग-अलग होता है:

  1. कतरनक (Incisor) :- ये आगे के चपटे दाँत होते हैं। इनका काम भोजन को काटना या कुतरना होता है।
  2. कैनाइन (Canine) :- ये नुकीले दाँत होते हैं (जैसे शेर या कुत्ते में बड़े होते हैं)। इनका काम भोजन को फाड़ना (Chearing) होता है।
  3. अग्रचवर्णक (Premolar) :- ये चबाने वाले दाँत होते हैं, जो कैनाइन के ठीक पीछे होते हैं।
  4. मोलर (Molar) :- इन्हें हम आम बोलचाल में ‘चौह’ या ‘दाढ़’ कहते हैं। इनका काम भोजन को अच्छी तरह पीसना और चबाना होता है।

एक वयस्क (Adult) इंसान के मुँह में कुल 32 दाँत होते हैं (16 ऊपर के जबड़े में और 16 नीचे के जबड़े में)।

लार ग्रंथियाँ (Salivary Glands)

मनुष्य के मुखगुहा में तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जिनसे लार (Saliva) निकलती है:

  1. पैरोटिड ग्रंथि (Parotid gland)
  2. सबमैंडिबुलर लार ग्रंथि (Submandibular gland)
  3. सबलिंगुअल लार ग्रंथि (Sublingual gland)

 

ग्रसनी (Pharynx) — गले का जंक्शन

मुखगुहा का पिछला हिस्सा ग्रसनी कहलाता है। इसमें दो छेद होते हैं, जहाँ से खाना और हवा अलग होते हैं:

  • (i) निगलद्वार (Gullet) :- यह छेद आहारनाल के अगले भाग यानी ग्रासनली में खुलता है (यहाँ से खाना जाता है)।
  • (ii) कंठद्वार (Glottis) :- यह छेद श्वासनली (Trachea) में खुलता है (यहाँ से हवा जाती है)।

 

ग्रासनली (Oesophagus)

  • मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगलद्वार के रास्ते ग्रासनली में पहुँचता है।
  • भोजन के पहुँचते ही ग्रासनली की दीवार में तरंग की तरह सिकुड़न और फैलाव (Contraction & Relaxation) शुरू होता है, जिसे क्रमानुकुंचन कहते हैं। इसी गति के कारण खाना धीरे-धीरे नीचे सरकता है।

आमाशय (Stomach)

  • यह पेट की बाईं ओर स्थित एक चौड़ी थैली जैसी रचना है।
  • आमाशय के तीन भाग होते हैं:
  1. कार्डिएक (Cardiac part): आमाशय का सबसे आगे वाला भाग।
  2. पाइलोरिक (Pyloric part): आमाशय का सबसे पीछे वाला भाग।
  3. फुण्डिक (Fundic part): इन दोनों के बीच का भाग।
  • आमाशय की भीतरी दीवार पर जो कोशिकाएं अंदर की ओर धँसी होती हैं, वे आमाशय ग्रंथि या जठर ग्रंथि का निर्माण करती हैं (यहीं से आगे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पाचक रस निकलेंगे)।

जठर रस (Gastric Juice) और उसके कार्य

आमाशय (Stomach) की जठर ग्रंथियों से निकलने वाले लिक्विड को जठर रस कहते हैं। मनुष्य के आमाशय में प्रतिदिन लगभग 3 लीटर जठर रस निकलता है।

जठर रस में मुख्य रूप से तीन चीजें होती हैं और उनके काम नीचे दिए गए हैं:

  • (A) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl):
    • यह आमाशय के माध्यम को अम्लीय (Acidic) बनाता है, ताकि पाचक एंजाइम काम कर सकें।
    • यह निष्क्रिय पेप्सिनोजेन को सक्रिय पेप्सिन (Pepsin) नामक एंजाइम में बदल देता है।
    • जीवाणुनाशक, ये भोजन के साथ आने वाले हानिकारक बैक्टीरिया को मार डालता है।
  • (B) पेप्सिन (Pepsin) एंजाइम:
    • यह भोजन के प्रोटीन पर काम करके उसे पेप्टोन (Peptone) में बदल देता है (यानी प्रोटीन का पाचन शुरू करता है)।
  • (C) म्यूकस या श्लेष्मा (Mucus):
    • आमाशय में बहुत खतरनाक एसिड (HCl) होता है जो पेट को जला सकता है। यह म्यूकस आमाशय की भीतरी दीवार को एसिड और पेप्सिन एंजाइम से सुरक्षित रखता है।

आमाशय में प्रोटीन के अलावा वसा (Fat) का भी थोड़ा सा पाचन होता है, जिसे गैस्ट्रिक लाइपेस एंजाइम वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदलता है।

 

काइम (Chyme) क्या है?

आमाशय में भोजन अच्छी तरह पिसने और पचने के बाद गाढ़े लेई की तरह (Paste regular) हो जाता है, जिसे काइम कहते हैं। यही काइम आगे छोटी आँत में जाता है।

 

पेप्टिक अल्सर (Peptic Ulcer) — पेट का घाव

  • कभी-कभी आमाशय में एसिड बहुत ज्यादा बनने लगता है, जिससे सुरक्षा करने वाले म्यूकस की परत घट जाती है।
  • ऐसी स्थिति में एसिड आमाशय की भीतरी दीवार को ही जला देता है, जिससे अंदर गोलाकार घाव बन जाता है। इसी घाव को पेप्टिक अल्सर कहते हैं।
  • जो लोग लंबे समय तक बिना भोजन के यानी भूखे रह जाते हैं (फास्टिंग करते हैं), उनमें पेप्टिक अल्सर होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

 

छोटी आँत (Small Intestine)

  • यह आहारनाल का सबसे लंबा भाग है। इसकी लंबाई लगभग 6 मीटर और चौड़ाई 2.5 सेंटीमीटर होती है।
  • आहारनाल के इसी भाग में पाचन की क्रिया पूरी होती है और पचे हुए भोजन का अवशोषण (Absorption) भी यहीं होता है।
  • छोटी आँत की लंबाई अधिक (लंबी) होती है, ताकि घास में मौजूद सेल्युलोज का पाचन ठीक से हो सके ।
  • मांस का पाचन आसान होता है, इसलिए मांसाहारी जंतुओं (जैसे शेर) की छोटी आँत की लंबाई कम (छोटी) होती है।

छोटी आँत के तीन भाग:

  1. ग्रहणी (Duodenum) :- यह छोटी आँत का पहला भाग है जो आमाशय के ठीक बाद शुरू होता है और C के आकार का होता है। इसके बीच में एक छेद के रास्ते दो नलिकाएं आकर खुलती हैं:
    • अग्न्याशयी वाहिनी (Pancreatic duct)
    • मूल पित्तवाहिनी (Common bile duct)
  2. जेजुनम (Jejunum) :- यह छोटी आँत का मध्य (बीच का) भाग है।
  3. इलियम (Ileum) :- यह छोटी आँत का अंतिम और सबसे बड़ा भाग है। यहीं पर भोजन का अंतिम रूप से पाचन समाप्त होता है और पचा हुआ खाना सोखा जाता है।

रसांकुर या विलाई (Villi)

  • छोटी आँत के इलियम भाग की भीतरी दीवार पर अंगुली जैसी बहुत सी रचनाएँ उठी होती हैं, जिन्हें रसांकुर या विलाई कहते हैं। इनके अंदर रक्त कोशिकाओं (Blood capillaries) का जाल होता है।
  • ये रसांकुर पचे हुए भोजन को सोखकर (Absorb करके) सीधे खून में पहुँचाने का काम करते हैं।

यकृत (Liver) — शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि

  • यह हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, जिसका वजन करीब 1.5 kg होता है। यह पेट (उदर) के ऊपरी दाहिने भाग में होती है।
  • यकृत की कोशिकाओं से पित्त निकलता है। यकृत से निकला हुआ पित्त एक छोटी थैली में जमा होता है, जिसे पित्ताशय कहते हैं।
  • यह गाढ़ा, हरे रंग का क्षारीय (Alkaline) द्रव होता है।

पित्त के दो मुख्य कार्य

  1. यह आमाशय से आए अम्लीय भोजन (काइम) को क्षारीय बनाता है, ताकि अग्न्याशय के एंजाइम उसपर काम कर सकें।
  2. यह भोजन के वसा (Fat) का विखंडन और पायसीकरण (Emulsification) करता है, जिससे वसा को पचाने वाले एंजाइम उसपर आसानी से काम कर सकें।

 

अग्न्याशय (Pancreas)

  • यह आमाशय के ठीक पीछे और ग्रहणी को घेरे हुए पीले रंग की ग्रंथि होती है।
  • इससे निकलने वाले पाचक रस को अग्न्याशयी रस कहते हैं। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित एंजाइम पाए जाते हैं:

 

आँत ग्रंथियाँ (Intestinal Glands)

  • छोटी आँत की दीवार में मौजूद ग्रंथियों से निकलने वाले रस को आंत्र-रस या सक्कस एंटेरीकस कहते हैं।

चाइल (Chyle) क्या है?

छोटी आँत में पाचन पूरा होने के बाद भोजन एकदम तरल (Liquid) हो जाता है, जिसे चाइल कहते हैं। इसी चाइल का अवशोषण इलियम के विलाई (रसांकुर) द्वारा होता है और पचा हुआ भोजन खून में मिल जाता है।

बड़ी आँत (Large Intestine)

छोटी आँत का पिछला हिस्सा बड़ी आँत में खुलता है। बड़ी आँत के दो मुख्य भाग होते हैं: कोलन (Colon) और मलाशय या रेक्टम (Rectum)

  • छोटी आँत और बड़ी आँत के जोड़ पर एक छोटी नली होती है, जिसे सीकम कहते हैं।
  • सीकम के आगे एक अँगुली जैसी बंद रचना होती है, जिसे अपेंडिक्स कहते हैं। याद रखें: मनुष्य के आहारनाल में अपेंडिक्स का कोई काम नहीं होता, यह एक अवशेषी अंग (Vestigial organ) है।

कोलन के तीन भाग होते हैं:

  1. उपरगामी कोलन (Ascending colon)
  2. अनुप्रस्थ कोलन (Transverse colon)
  3. अधोगामी कोलन (Descending colon)

 

बड़ी आँत का मुख्य कार्य:

  1. अपचा हुआ भोजन (वेस्ट) इलियम से कोलन होते हुए रेक्टम में पहुँचता है।
  2. बड़ी आँत की दीवारें इस अपचे भोजन में से अतिरिक्त जल (Water) को सोख लेती हैं
  3. बचा हुआ कचरा मल (Stool) के रूप में रेक्टम (मलाशय) में अस्थायी तौर पर जमा रहता है और समय-समय पर मलद्वार (Anus) के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाता है।

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