Biology Chapter 2 Class 10th Notes

Biology Chapter 2 Class 10th Notes || श्वसन (Respiration) || जीव विज्ञान अध्याय 2 श्वसन

Biology Chapter 2 Class 10th Notes

Biology ( जीविज्ञान )

Class 10th       Chapter 2

श्वसन (Respiration)

Full Chapter Explanation & Notes

 

श्वसन की जरूरत क्यों है?

  • पिछले चैप्टर में हमने पढ़ा कि पोषण द्वारा जो भोजन हम खाते हैं, वह पचकर हमारे शरीर के ऊतकों (tissues) तक पहुँचता है।
  • लेकिन सिर्फ खाना खा लेने से शरीर को ऊर्जा (energy) नहीं मिल जाती। उस भोजन से ऊर्जा निकालने के लिए शरीर को ऑक्सीजन की जरूरत होती है।
  • भोजन के अणुओं को ऑक्सीजन की मदद से तोड़कर ऊर्जा बनाने की इसी पूरी प्रक्रिया को श्वसन कहते हैं।

कोशिकीय ईंधन (Cellular Fuel) और ATP

  • कोशिकीय ईंधन : शरीर में ऊर्जा उत्पादन के लिए कोशिकाएं मुख्य रूप से ग्लूकोज का उपयोग करती हैं, इसीलिए ग्लूकोज को कोशिकीय ईंधन कहा जाता है।
  • जैव ऊर्जा (ATP) :- जब ग्लूकोज टूटता है, तो उससे निकलने वाली रासायनिक ऊर्जा सीधे शरीर को नहीं मिलती। वह ऊर्जा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट – Adenosine triphosphate) नामक एक विशेष यौगिक के रूप में स्टोर हो जाती है।
  • जब भी शरीर को किसी काम के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, तो वह इसी ATP को तोड़कर ऊर्जा लेता है। इसीलिए ATP को रासायनिक ऊर्जा का सार्वजनिक वाहक (Universal carrier) या जैव ऊर्जा भी कहते हैं।

श्वसन का रासायनिक समीकरण (Chemical Equation)

श्वसन के प्रकार (Types of Respiration)

ग्लूकोज के अणुओं का टूटना (ऑक्सीकरण) कोशिकाओं के अंदर दो अलग-अलग परिस्थितियों में होता है। इस आधार पर श्वसन दो प्रकार का होता है:

(i) अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration)

  • यह श्वसन का पहला चरण है जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (बिना ऑक्सीजन के) में होता है।
  • यह पूरी क्रिया कोशिका के कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में पूरी होती है।
  • इसमें ग्लूकोज (6 कार्बन वाला अणु) का आंशिक विखंडन होता है और पायरुवेट (3 कार्बन वाला अणु) के दो अणु बनते हैं। इसमें बहुत ही कम मात्रा में ऊर्जा निकलती है।

पायरुवेट के आगे टूटने के तीन रास्ते

  1. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में

पायरुवेट बिना ऑक्सीजन के यीस्ट (Yeast) द्वारा इथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) में बदल दिया जाता है। इस पूरी क्रिया को किण्वन (Fermentation) कहते हैं।

  1. ऑक्सीजन के अभाव/कमी में

जब हम बहुत ज्यादा दौड़ते या भारी काम करते हैं, तो हमारी मांसपेशियों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तब पायरुवेट ऑक्सीजन के अभाव में लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) बना देता है।

  1. मांसपेशियों में ऐंठन या Cramp

हमारी मांसपेशियों में अत्यधिक मात्रा में लैक्टिक अम्ल के जमा हो जाने के कारण ही तेज दर्द, ऐंठन या तकलीफ (Cramp) होने लगती है। आराम करने या गर्म पानी से सेंकने पर यह ठीक हो जाता है।

(ii) वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)

  • यह श्वसन का दूसरा चरण है जो ऑक्सीजन की उपस्थिति (Oxygen के साथ) में होता है।
  • पायरुवेट आगे पूरी तरह टूटने के लिए कोशिका के माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) में जाता है।
  • यहाँ ऑक्सीजन की उपस्थिति में पायरुवेट का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल (H2O) और बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा (ATP) बनती है।

वायवीय और अवायवीय श्वसन में अंतर

वायवीय श्वसन (Aerobic)

अवायवीय श्वसन (Anaerobic)

1. यह ऑक्सीजन की उपस्थिति (Presence) में होता है।

1. यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (Absence) में होता है।

2. इसका पहला चरण कोशिकाद्रव्य में और दूसरा चरण माइटोकॉण्ड्रिया में पूरा होता है।

2. इसकी पूरी प्रक्रिया केवल कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में ही पूरी हो जाती है।

3. इसमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिससे CO2 और जल बनते हैं।

3. इसमें ग्लूकोज का आंशिक विखंडन होता है, जिससे इथेनॉल या लैक्टिक अम्ल बनता है।

4. इसमें बहुत अधिक ऊर्जा (38 ATP) पैदा होती है।

4. इसमें बहुत कम ऊर्जा (2 ATP) पैदा होती है।

कार्यकलाप 1: प्रयोग द्वारा सिद्ध करना कि हम श्वसन (साँस छोड़ने) में CO2 गैस बाहर निकालते हैं

  • Step 1 :- दो साफ परखनली (Test tube) लें और दोनों में ताजा तैयार किया गया चूने का पानी (Limewater) डाल दें।
  • Step 2 :- एक परखनली में सिरिंज या पिचकारी की मदद से बाहर की सामान्य हवा को चूने के पानी में प्रवाहित (Pump) करें।
  • Step 3 :- दूसरी परखनली में एक काँच की नली डालकर अपने मुँह से निःश्वास की वायु (छोड़ी जाने वाली साँस) को फूंक मारकर अंदर डालें।

निष्कर्ष (Result)

  • जिस परखनली में मुँह से फूंक मारी गई थी (परखनली b), उसका चूने का पानी बहुत कम समय में एकदम दूधिया (Milky) हो जाता है।
  • दूसरी तरफ, सिरिंज से सामान्य हवा डालने वाली परखनली (परखनली a) का पानी दूधिया होने में बहुत ज्यादा समय लेता है।
  • चूने का पानी CO2 गैस के संपर्क में आते ही दूधिया हो जाता है। चूंकि हमारे मुँह से छोड़ी गई साँस में सामान्य हवा की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए वह तुरंत दूधिया हो गया।

 कार्यकलाप 2: प्रयोग द्वारा सिद्ध करना कि किण्वन (Fermentation) क्रिया में CO2 गैस निकलती है

  • Step 1 :- एक कोनिकल फ्लास्क में चीनी का घोल लें और उसमें थोड़ा सा यीस्ट (Yeast) डाल दें।
  • Step 2 :- फ्लास्क के मुँह को एक छेद वाले कॉर्क से बंद करके उसमें काँच की एक मुड़ी हुई पतली नली फिट करें। नली का दूसरा सिरा पास में रखी परखनली के चूने के जल में डुबो दें।

निष्कर्ष (Result)

  • थोड़ी देर में फ्लास्क से गैस निकलकर जब चूने के पानी में जाती है, तो चूने का जल दूधिया रंग में बदल जाता है।
  • इससे यह पता चलता है कि यीस्ट द्वारा होने वाली किण्वन (अवायवीय श्वसन) की क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस मुक्त होती है।

पौधों में श्वसन (Respiration in Plants)

पौधों में गैसों का आदान-प्रदान (Oxygen लेना और CO2 छोड़ना) उनके शरीर की सतह द्वारा विसरण (Diffusion) क्रिया से होता है। इसके लिए पौधे के अलग-अलग अंगों में खास रचनाएँ होती हैं:

1. पत्तियों में — रंध्र (Stomata):

पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें रंध्र या स्टोमाटा कहते हैं। इन्हीं रंध्रों द्वारा वायुमंडल से ऑक्सीजन पत्ती के अंदर जाती है और CO2 बाहर निकलती है।

2. पुराने तनों में — वातरंध्र (Lenticels):

पुराने वृक्षों के तनों की कड़ी त्वचा या छाल (Bark) पर छोटे-छोटे छेद पाए जाते हैं, जिन्हें वातरंध्र कहते हैं। इनके माध्यम से भी गैसों का विसरण होता है।

3. जड़ों में — मूलरोम (Root Hairs):

जड़ों की बाहरी त्वचा से बहुत पतले-पतले बाल जैसी रचनाएँ निकलती हैं, जिन्हें मूलरोम कहते हैं। ये मूलरोम मिट्टी के कणों के बीच मौजूद हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और CO2 बाहर छोड़ते हैं। 

पौधा क्यों मर जाता है?

जब पौधों की जड़ों में लंबे समय तक जल जमाव (Waterlogging) रहता है, तो मिट्टी के कणों के बीच की हवा खत्म हो जाती है। ऑक्सीजन न मिलने के कारण जड़ें सड़ने लगती हैं और पौधा मर जाता है।

जलीय पौधे (Aquatic plants)

पानी में रहने वाले पौधे सीधे पानी से ही विसरण क्रिया द्वारा ऑक्सीजन सोखते हैं।

 

दिन और रात में गैसों का विनिमय

पौधों में गैसों के विसरण की दिशा उनकी जरूरत और दिन-रात के समय पर निर्भर करती है:

  • दिन में : दिन के समय पौधे प्रकाशसंश्लेषण (Photosynthesis) करते हैं। इसलिए श्वसन से निकलने वाली CO2 का उपयोग वे तुरंत भोजन बनाने में कर लेते हैं। अतः दिन में रंध्रों से CO2 नहीं, बल्कि ऑक्सीजन (O2) बाहर निकलती है।
  • रात में : रात के समय प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया बंद रहती है। इसलिए रात में पौधे रंध्रों द्वारा केवल कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस ही बाहर निकालते हैं।

पौधों का श्वसन जंतुओं से किस प्रकार भिन्न है?

  1. पौधों के प्रत्येक भाग (जड़, तना तथा पत्तियों) में अलग-अलग श्वसन होता है, जबकि जंतुओं में पूरा शरीर एक ही श्वसन तंत्र से जुड़ा होता है।
  2. जंतुओं की तरह पौधों में श्वसन गैसों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए खून (Blood) जैसा कोई सिस्टम नहीं होता।
  3. पौधों में जंतुओं की अपेक्षा श्वसन की गति बहुत धीमी (Slow) होती है।

 

जंतुओं में गैसों का आदान-प्रदान (Gas Exchange in Animals)

  • एककोशिकीय जीव (जैसे—अमीबा, पैरामिशियम) और सरल बहुकोशिकीय जीव (जैसे—हाइड्रा) अपने शरीर की सतह या कोशिका झिल्ली से सीधे विसरण (Diffusion) द्वारा ऑक्सीजन लेते हैं और CO2 छोड़ते हैं।
  • पक्षी और मैमल्स (स्तनधारी) जैसे बड़े जीवों को अपने कामों के लिए अधिक ऊर्जा और अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है। इसलिए इनके शरीर में विशेष श्वसन अंग पाए जाते हैं।

★ जंतुओं में मुख्य रूप से तीन प्रकार के श्वसन अंग होते हैं

1. श्वासप्रणाल या ट्रैकिया (Trachea)

  • यह कीटों जैसे— टिड्डा (Grasshopper) और तिलचट्टा (Cockroach) में पाया जाता है।
  • ट्रैकिया शरीर के अंदर हवा से भरी हुई पतली नलियों का एक बहुत बड़ा जाल होता है। यह जाल एक तरफ सीधे ऊतकों (tissues) के संपर्क में होता है और दूसरी तरफ शरीर की सतह पर छोटे-छोटे छेदों द्वारा बाहर खुलता है, जिन्हें श्वासरंध्र (Spiracle) कहते हैं।

कीटों के खून का लफड़ा

कीटों में ट्रैकिया द्वारा होने वाले श्वसन में गैसों का आदान-प्रदान खून के माध्यम से नहीं होता है। इसका कारण यह है कि कीटों के रक्त में हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) जैसा कोई पिगमेंट नहीं पाया जाता, जो ऑक्सीजन को बाँध सके। इसलिए हवा सीधे नलियों से होकर कोशिकाओं तक पहुँचती है।

2. गिल्स (Gills / गलफड़े)

  • यह पानी में रहने वाले जलीय जीवों, मुख्य रूप से मछलियों का विशेष श्वसन अंग है। इसके अलावा झींगा (Prawn) और सीप (Mussel) में भी गिल्स होते हैं। पानी में होने वाले इस श्वसन को जलीय श्वसन (Aquatic respiration) कहते हैं।
  • प्रत्येक मछली में गिल्स दो समूहों में सिर के पार्श्व भाग (आँख के ठीक पीछे दोनों तरफ) पाए जाते हैं।
  • हर गिल एक चपटी थैली में होता है जिसे गिल कोष्ठ (Gill pouch) कहते हैं।
  • गिल कोष्ठ के अंदर बहुत सी पतली-पतली पट्टियाँ जैसी रचनाएँ होती हैं जिन्हें गिल पटलिकाएँ (Gill lamellae) कहते हैं।

मछली साँस कैसे लेती है?

  1. मछली अपने मुँह से पानी की धारा को अंदर लेती है, जो आहारनाल के फेरिक्स (ग्रसनी) में पहुँचती है।
  2. फेरिक्स से यह पानी गिल कोष्ठों में जाता है और फिर शरीर के बाहर निकल जाता है।
  3. जब पानी गिल्स के ऊपर से गुजरता है, तो गिल्स की रक्त वाहिनियों में बहने वाला खून पानी में घुली ऑक्सीजन (O2) को सोख लेता है और खून की कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को बाहर पानी में छोड़ देता है

 3. फेफड़े (Lungs)

  • यह जमीन पर रहने वाले (स्थलीय) और वर्टिबरेटा के उच्चवर्गीय जंतुओं का मुख्य श्वसन अंग है, जो वायवीय श्वसन के काम आता है।
  • अलग-अलग वर्गों में तरीका:
    • एम्फीबिया (मेंढक) : इनमें फेफड़े के अलावा त्वचा (Skin) और मुख-ग्रसनी से भी श्वसन होता है।
    • रेप्टीलिया (जैसे सर्प, छिपकली, कछुआ, मगरमच्छ) :- इनमें श्वसन केवल फेफड़ों से होता है।
    • एवीज (पक्षी) और मैमेलिया (जैसे मनुष्य, गाय, शेर) :- इन उच्चतम श्रेणी के जीवों में श्वसन सिर्फ फेफड़ों (Lungs) द्वारा ही होता है।

मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

मनुष्य के शरीर में साँस लेने और छोड़ने के लिए जो अंग मिलकर काम करते हैं, उन्हें श्वसन अंग कहते हैं। मुख्य अंग निम्नलिखित हैं:

  1. नासिका छिद्र (Nostrils) एवं नासिका वेश्म
  2. स्वरयंत्र या लैरिक्स (Larynx)
  3. श्वासनली या ट्रैकिया (Trachea)
  4. फेफड़ा (Lung)

1. नासिका (Nose) एवं नासिका वेश्म (Nasal Chambers)

  • हमारे मुँह के ठीक ऊपर नासिका होती है। इसमें दो गोलाकार बाह्य नासिका छिद्र (Nostrils) होते हैं, जो अंदर जाकर दो अलग-अलग नासिका वेश्म (Nasal chambers) में खुलते हैं। ये दोनों वेश्म बीच में एक हड्डी की पट्टी (नासा पट्टिका – Nasal septum) द्वारा एक-दूसरे से अलग रहते हैं।
  • नासिका वेश्म के तीन भाग होते हैं:
  1. प्रघ्राण या प्रकोष्ठ (Vestibule) :- यह आगे का छोटा भाग है जहाँ छोटे-छोटे बाल (Hairy skin) होते हैं, जो धूल-कणों को रोकते हैं।
  2. घ्राण क्षेत्र (Olfactory region) :- यह ऊपरी भाग है जो हमें सूँघने की क्षमता (स्मेल) देता है। मनुष्य में यह क्षेत्र अत्यंत छोटा होता है।
  3. श्वसन क्षेत्र (Respiratory region) :- यह निचला भाग है। इसकी दीवार टेढ़ी-मेढ़ी, घुमावदार प्लेट की तरह होती है जिसे काँची (Conchae) कहते हैं।

 

म्यूकस मेम्ब्रेन (Mucous membrane): नासिका वेश्म के अंदर एक महीन परत होती है जिससे चिपचिपा म्यूकस निकलता रहता है। इसके नीचे रक्त कोशिकाओं (blood capillaries) का जाल फैला रहता है जो आने वाली हवा को शरीर के तापमान के अनुकूल बनाता है।

 2. स्वरयंत्र या लैरिक्स (Larynx)

नासिका वेश्म अंदर की ओर ग्रसनी (Pharynx) में कंठद्वार के पास खुलता है। ग्रसनी के ठीक नीचे एक छोटी रचना होती है जिसे स्वरयंत्र या लैरिक्स कहते हैं। यहीं से हमारी आवाज (Voice) बनती है।

3. श्वासनली या ट्रैकिया (Trachea)

  • लैरिक्स पीछे की ओर श्वासनली या ट्रैकिया में खुलता है।
  • ट्रैकिया करीब 11 cm लंबी नली है, जिसका व्यास (diameter) लगभग 16 mm होता है।
  • ट्रैकिया की पतली दीवार को मजबूती देने के लिए इस पर कार्टिलेज (उपास्थि) के बने अपूर्ण वलय  लगे होते हैं।
  • वलय का मुख्य काम : ये छल्ले ट्रैकिया को तब पिचकने से रोकते हैं जब उसमें हवा नहीं होती या हवा बाहर निकल रही होती है।
  • विभाजन (Division) :- ट्रैकिया नीचे वक्षगुहा (Chest cavity) में पहुँचकर दो भागों में बँट जाती है, जिन्हें श्वसनियाँ (Bronchi) कहते हैं। प्रत्येक श्वसनी फेफड़े में घुसकर और पतली शाखाओं में बँट जाती है जिन्हें श्वसनिकाएँ या ब्रोंकिओल्स (Bronchioles) कहते हैं।

4. फेफड़ा (Lungs) एवं वायुकोष्ठ (Alveoli)

  • मनुष्य की वक्षगुहा में दो स्पंजी, गुलाबी और थैलीनुमा फेफड़े होते हैं, जो हृदय (Heart) के इधर-उधर प्लूरल गुहाओं (Pleural cavities) में स्थित होते हैं।
  • फेफड़े के चारों ओर एक पतली झिल्ली का आवरण होता है जिसे प्लूरल मेम्ब्रेन या पैराइटल प्लूरा कहते हैं। फेफड़े और इस झिल्ली के बीच एक चिकना लिक्विड होता है जो साँस लेते समय होने वाले घर्षण (friction) को कम करता है।

वायुकोष्ठ या एल्वियोलाई (Alveoli)

ब्रोंकिओल्स आगे जाकर अत्यंत बारीक थैलियों में खुलते हैं जिन्हें वायुकोष्ठ या एल्वियोलाई कहते हैं।

    • मनुष्य के दोनों फेफड़ों में ऐसे करीब 3 \times 10^8$ (30 करोड़) वायुकोष्ठ पाए जाते हैं।
    • यदि इन सभी वायुकोष्ठों की सतह को फैलाया जाए, तो यह लगभग 400 से 800 वर्ग फीट जगह घेर लेगी। गैसों का असली आदान-प्रदान (खून में ऑक्सीजन मिलना) इसी सतह पर होता है।

श्वसन क्रिया (Mechanism of Breathing)

श्वसन क्रिया मुख्य रूप से दो चरणों का सम्मिलित रूप है:

  1. प्रश्वास (Inspiration) :- बाहर की हवा को नासिका से फेफड़ों तक पहुँचाना (साँस अंदर लेना)। यहाँ हवा की ऑक्सीजन फेफड़े की दीवार में मौजूद खून में चली जाती है।
  2. उच्छवास (Expiration) :- फेफड़ों में आई कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को बची हवा के साथ नासिका से बाहर निकालना (साँस बाहर छोड़ना)।

प्रश्वास (साँस अंदर लेने) के समय शरीर में होने वाले 3 बदलाव:

जब हम साँस अंदर लेते हैं, तो फेफड़ों के पास स्थित तीन रचनाएँ मिलकर काम करती हैं:

  1. पसलियाँ (Ribs) :- सीने की 12 जोड़ी पसलियों के बीच की मांसपेशियां जब सिकुड़ती हैं, तो पसलियाँ बाहर और ऊपर की ओर खिसक जाती हैं, जिससे छाती (वक्षगुहा) फैल जाती है।
  2. डायफ्राम (Diaphragm) :- यह छाती को पेट से अलग करने वाला एक गुंबद के आकार (Dome-shaped) का पर्दा होता है। प्रश्वास के समय डायफ्राम की मांसपेशियां सिकुड़कर नीचे की तरफ दब जाती हैं और यह चपटा (flat) हो जाता है। इससे छाती के अंदर की जगह और बढ़ जाती है।
  3. उदर (पेट) की मांसपेशियां : इनके सिकुड़ने से भी वक्षगुहा के फैलाव में मदद मिलती है।

परिणाम : इस प्रकार वक्षगुहा का आयतन (जगह) बढ़ने से फेफड़ों के अंदर हवा का दबाव (Pressure) कम हो जाता है। दबाव कम होने के कारण बाहर की ताजी हवा तेजी से नासिका के रास्ते फेफड़ों के अंदर चली जाती है।

उच्छ्वास (Expiration — साँस बाहर छोड़ना)

यह प्रश्वास (साँस अंदर लेने) के ठीक विपरीत (उल्टा) काम करता है। फेफड़ों से CO2 युक्त हवा को शरीर से बाहर निकालने की क्रिया को उच्छ्वास कहते हैं।

जब हम साँस बाहर छोड़ते हैं, तो शरीर में 3 मुख्य बदलाव होते हैं:

  1. मांसपेशियों का शिथिलन (Relaxation) :- पसलियों के बीच की मांसपेशियां जो प्रश्वास के समय सिकुड़ी थीं, वे अब ढीली (शिथिल) हो जाती हैं। इससे पसलियाँ फिर से अपनी पुरानी जगह पर (नीचे और अंदर की ओर) आ जाती हैं।
  2. डायफ्राम का वापस आना : डायफ्राम की मांसपेशियां भी ढीली हो जाती हैं, जिससे डायफ्राम नीचे से वापस ऊपर की ओर उठकर अपने पुराने गुंबद के आकार (Dome-shape) में आ जाता है।
  3. वक्षगुहा का आयतन घटना : इन दोनों कामों के कारण छाती (वक्षगुहा) के अंदर की जगह (आयतन) घट जाती है और फेफड़ों पर दबाव (Pressure) बढ़ जाता है।

परिणाम : फेफड़ों पर दबाव बढ़ते ही उनके अंदर की हवा ($CO_2$ के साथ) बाहर की ओर धकेली जाती है और श्वासनली व नासिका के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाती है।

श्वसन गैसों का परिवहन (Transport of Respiratory Gases)

फेफड़ों में हवा पहुँचने के बाद गैसों को पूरी कोशिकाओं तक ले जाने और वहाँ से कचरा वापस लाने का काम रक्त (Blood) करता है:

  • ऑक्सीजन (O2) का परिवहन :- फेफड़ों के वायुकोष्ठ (Alveoli) के चारों ओर खून की नलियों का जाल होता है। खून में मौजूद हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) ऑक्सीजन को अपने साथ बाँध लेता है और ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Oxyhemoglobin) बनाता है। इसी रूप में ऑक्सीजन पूरे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचती है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का परिवहन :- कोशिकाओं में काम होने के बाद जो CO2 बनती है, वह खून के प्लाज्मा में घुलकर या कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (Carboxyhemoglobin) बनाकर वापस फेफड़ों तक पहुँचती है, जहाँ से इसे बाहर फेंक दिया जाता है।

 

हीमोग्लोबिन को श्वसन वर्णक क्यों कहते हैं?

  • मनुष्य और उच्च श्रेणी के जंतुओं में हीमोग्लोबिन पाया जाता है। इसकी ऑक्सीजन को सोखने या बाँधने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है, इसलिए इसे श्वसन वर्णक (Respiratory pigment) कहते हैं।
  • यदि हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन न हो और गैसें सिर्फ विसरण (Diffusion) द्वारा शरीर में बहें, तो फेफड़ों से पैर के अँगूठे तक ऑक्सीजन के एक अणु को पहुँचने में लगभग 3 वर्ष का समय लग जाएगा! हीमोग्लोबिन के कारण यह काम कुछ ही सेकेंड्स में हो जाता है।

हीमोग्लोबिन और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का खतरा

  • हीमोग्लोबिन को ऑक्सीजन से भी 250 गुना ज्यादा प्यार कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) गैस से होता है।
  • अगर हवा में CO गैस (जैसे बंद कमरे में कोयला जलाने या गाड़ियों के धुएँ से निकलने वाली गैस) मौजूद हो, तो हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को छोड़कर तुरंत CO को सोख लेता है और कारबोक्सीहीमोग्लोबिन बना लेता है।
  • इसके कारण शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है, जिससे इंसान को चक्कर आने लगता है, वह बेहोश हो सकता है और ज्यादा देर होने पर मृत्यु (मौत) भी हो सकती है।

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