Class 10th History Chapter 4 Notes

Class 10th History Chapter 4 Notes || भारत में राष्ट्रवाद || इतिहास कक्षा 10वीं अध्याय 4 भारत में राष्ट्रवाद नोट्स

Class 10th History Chapter 4 Notes

History         Bihar Board

Chapter 4       Class 10th

भारत में राष्ट्रवाद

Full Explanation & Notes

 

 

Biology Chapter 2 Class 10th Notes

 

राष्ट्रवाद क्या है?

  • इसका शाब्दिक अर्थ है — राष्ट्रीय चेतना का उदय”। यानी जब देश के लोगों में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की भावना जाग जाए।
  • 19वीं शताब्दी से पहले भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था, जहाँ एकता और समान न्याय व्यवस्था की कमी थी।
  • 19वीं शताब्दी के बाद देश में एकता बढ़ी, भारत एक संगठित राष्ट्र बना और इसी राष्ट्रवाद से स्वतंत्रता संग्राम (आज़ादी की लड़ाई) की शुरुआत हुई।
  • अंग्रेजों ने भारत के सभी वर्गों का बहुत शोषण किया, जिससे पूरी जनता के बीच उनके खिलाफ भारी गुस्सा फैल गया।
  • अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए रेल, डाक-तार व्यवस्था, छापेखाने (प्रेस) और एक जैसी सरकारी व्यवस्था बनाई थी, लेकिन इसने अनजाने में अलग-अलग जगहों के भारतीयों को आपस में जोड़ दिया और राष्ट्रवाद फैलाया।

 

राष्ट्रवाद के उदय के कारण

भारत में राष्ट्रवाद अचानक नहीं जागा, बल्कि यह अंग्रेजों की खराब नीतियों और कुछ नए बदलावों का मिला-जुला परिणाम था।

 

राजनीतिक कारण (अंग्रेजों के दमनकारी कानून)

अंग्रेजी सरकार साम्राज्यवादी थी (अपना फायदा देखने वाली)। जब भारत में राष्ट्रीयता की लहर आई, तो उसे कुचलने के लिए उन्होंने कई कठोर कानून बनाए, जिससे भारतीय और भड़क गए

  • 1858 (महारानी विक्टोरिया की घोषणा) :- इसके बाद सभी देशी राज्य सीधे अंग्रेजी राज के अधीन आ गए, जिससे पूरे भारत को एक ‘राष्ट्रीय स्वरूप’ मिला।
  • 1878 (वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट) :- वायसराय लॉर्ड लिटन ने भारतीय अखबारों पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया ताकि कोई अंग्रेजों के खिलाफ न लिख सके।
  • 1879 में भारतीयों के लिए हथियार रखना गैर-कानूनी (अपराध) बना दिया गया।
  • 1883 (इल्बर्ट बिल विवाद) :- इस कानून का मकसद भारतीय और यूरोपीय जजों को बराबरी देना था। लेकिन अंग्रेजों के भारी विरोध के कारण सरकार को यह बिल वापस लेना पड़ा। इससे भारतीयों को समझ आ गया कि अंग्रेज उनके साथ कभी बराबरी का व्यवहार नहीं करेंगे।
  • 1899 (कलकत्ता कॉरपोरेशन एक्ट) :- लॉर्ड कर्जन ने नगर पालिका में जनता द्वारा चुने जाने वाले भारतीय सदस्यों की संख्या कम कर दी।
  • 1904 (विश्वविद्यालय अधिनियम) :- कॉलेजों/विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण (रोक-टोक) बढ़ा दिया गया।
  • 1905 (बंगाल का विभाजन – सबसे बड़ा कारण) :- लॉर्ड कर्जन ने फूट डालने के लिए हिंदू-मुस्लिम के आधार पर बंगाल को दो भागों में बांट दिया। इससे भारतीयों में बहुत गुस्सा फैला (भारी विरोध के बाद इसे 1911 में रद्द करना पड़ा)।
  • 1907 और 1910 के कानून :- ‘देश द्रोही सभा अधिनियम (1907)’ के जरिए सभाएं करने पर रोक लगाई गई और ‘इंडियन प्रेस एक्ट (1910)’ के जरिए अंग्रेजी सरकार के खिलाफ लिखने वालों को सजा देने का नियम बना।

 

डालहौजी द्वारा संरचनात्मक योजना

  • लॉर्ड डलहौजी के समय भारत में रेलवे, टेलीग्राफ लाइन (तार) और बढ़िया परिवहन व्यवस्था शुरू हुई। हालांकि अंग्रेजों ने इसे अपने फायदे के लिए बनाया था, लेकिन इससे भारत के अलग-अलग इलाकों के बीच की दूरियां घट गईं। एक राज्य दूसरे राज्य से जुड़ा और लोग आपस में मिलकर देश की बात करने लगे।

 

अंग्रेजी शिक्षा नीति का प्रभाव

  • अंग्रेजी शिक्षा के आने से भारतीयों को दुनिया में हो रही नई क्रांतियों और विचारों की जानकारी मिली।
  • भारतीयों ने प्रजातंत्र (Democracy), मानवतावाद, यूरोपीय पुनर्जागरण, फ्रांस की राज्य क्रांति और अमेरिका की आज़ादी की लड़ाई के बारे में पढ़ा।
  • भारतीय लोग लॉर्ड मान्टेस्क्यू और रूसो जैसे बड़े विचारकों की बातों से प्रभावित हुए। अब वे अपने अधिकारों को समझने लगे और अंग्रेजों से नए कानूनों तथा हक की मांग करने लगे।

 

राष्ट्रवाद के उदय के कारण : आर्थिक कारण

अंग्रेजों की गलत आर्थिक नीतियों (पैसे लूटने की नीति) के कारण भारत के किसान, मजदूर और छोटे उद्योग पूरी तरह बर्बाद हो गए, जिससे लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ा।

 

किसानों की दुर्दशा (खेती की बर्बादी)

  • अंग्रेजों का मुख्य मकसद था—ज्यादा से ज्यादा भू-राजस्व (लगान) वसूलना।
  • इस व्यवस्था में जमींदारों को सरकार को एक फिक्स टैक्स देना होता था। लेकिन जमींदार सीधे-साधे किसानों से सरकार से भी कई गुना ज्यादा लगान वसूलते थे और उनका शोषण करते थे।
  • जब किसान विरोध करते थे, तो सरकार उनसे जबरन नगदी फसलें (जैसे—नील, कपास, गन्ना) उगवाती थी और उन्हें बहुत कम कीमत पर खरीद लेती थी। अंग्रेज इन फसलों को अपने देश (इंग्लैंड) के उद्योगों के लिए ‘कच्चे माल’ के रूप में इस्तेमाल करते थे। नील और कपास उगाने वाले किसान इससे सबसे ज्यादा परेशान थे।

 

उद्योगों और मजदूरों की बर्बादी (बेरोजगारी)

  • अंग्रेजों ने भारत में बने कपड़ों को बाहर भेजने पर कई तरह के टैक्स और प्रतिबंध लगा दिए, ताकि भारतीय कपड़ा बाहर न बेच सके।
  • इसके अपेक्षा इंग्लैंड की फैक्ट्रियों में मशीनों से बने कपड़ों को भारत में बिना किसी टैक्स या रोक-टोक के बेचने की छूट दी गई।
  • सन 1882 में सरकार ने सूती कपड़ों पर से ‘आयात कर’ (Import Tax) पूरी तरह हटा लिया। इससे विदेशी सामान भारत में बहुत सस्ता मिलने लगा।
  • अंग्रेज भारत में फैक्ट्रियां या कारखाने लगाने के पक्ष में नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि भारत के कुटीर उद्योग बंद हो गए और मजदूर बुरी तरह बेरोजगार हो गए।

 

विद्रोहों से मिली सीख

  • समाज के हर वर्ग में फैले इसी गुस्से के कारण देश में लगातार विद्रोह हुए (जैसे कंपनी राज की शुरुआत से लेकर 1857 का विद्रोह, और उसके बाद नील विद्रोह तथा पवना विद्रोह)।
  • इन विद्रोहों के बाद भारतीयों को यह बात अच्छे से समझ आ गई कि अगर आजादी चाहिए तो बिना किसी योजना के लड़ने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए 4 चीजें बहुत जरूरी हैं:

1. लक्ष्य की स्पष्टता (साफ पता होना चाहिए कि क्या चाहिए)

2. मजबूत संस्था (एक बड़ा संगठन होना चाहिए)

3. परिपक्व नेतृत्व (एक अच्छा लीडर होना चाहिए)

4. सुनियोजित आंदोलन (पूरी प्लानिंग के साथ लड़ाई)

 

राष्ट्रवाद के उदय के कारण (सामाजिक और धार्मिक कारण)

1. सामाजिक कारण

  • अंग्रेज खुद को सबसे श्रेष्ठ (ऊंचा) समझते थे और भारतीयों को बहुत ही हेय (नीची) दृष्टि से देखते थे।
  • रेलगाड़ियों, सड़कों, होटलों और क्लबों में अंग्रेज भारतीयों के साथ बहुत गंदा व्यवहार करते थे। यहाँ तक कि दक्षिण अफ्रीका में भी भारतीय लोगों पर कई तरह के कानूनी प्रतिबंध लगे हुए थे। इस भेदभाव से भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति नफ़रत और अपने देश के लिए एकता की भावना जगी।
  • ऊंचे सरकारी पदों पर भारतीयों को बैठने नहीं दिया जाता था।
  • भारत का शासन चलाने वाले इंडियन सिविल सर्विस (I.C.S) की परीक्षा इंग्लैंड में होती थी, जिससे भारतीयों के लिए इसमें शामिल होना बहुत कठिन था।
  • अगर कोई भारतीय पास हो भी जाता, तो अंग्रेज उसकी नियुक्ति (जॉब) में अड़चनें डालकर उसे हटा देते थे।
  • सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (प्रथम I.C.S) के साथ भी अंग्रेजों ने ऐसा ही बुरा बर्ताव किया था। इसी वजह से देश के पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया।

2. धार्मिक कारण

  • 19वीं शताब्दी में भारत के कई महापुरुषों ने समाज और धर्म में फैली बुराइयों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
  • राजा राममोहन राय, देवेन्द्र नाथ ठाकुर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द।
  • विलियम जोन्स, मैक्समूलर और चार्ल्स विल्किन्सन जैसे यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय धर्मग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जब भारतीयों को अपने ग्रंथों की महानता का पता चला, तो उनके मन में अपने धर्म के प्रति गर्व और निष्ठा जागी।
  • इन सुधारों ने लोगों को एकता, समानता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, जिससे राष्ट्रवाद का जन्म हुआ।

 

राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन और प्रथम विश्वयुद्ध (1885 – 1914)

  • राष्ट्रवाद की भावना के कारण ही 1885 में ‘अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ का गठन हुआ।
  • शुरुआत में यह संगठन सिर्फ सुधारों की मांग करता था, लेकिन 1914 तक आते-आते अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के कारण कांग्रेस के सदस्य उग्र (तेज) हो गए।
  • इसके बाद बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल और लाला लाजपत राय (बाल-पाल-लाल) के नेतृत्व में असली ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ की शुरुआत हुई।
  • इसी समय (1914 में) प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ और अंग्रेजी सरकार ने भारत को भी इस युद्ध में घसीट लिया, जिससे भारतीयों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

 

प्रथम विश्वयुद्ध और भारत पर उसका असर

प्रथम विश्वयुद्ध का परिचय

  • यह युद्ध 1914 में शुरू हुआ और 4 वर्षों तक चला। यह यूरोपीय देशों की आपसी साम्राज्यवादी दुश्मनी का नतीजा था।
  • दो गुटों की लड़ाई

1.  मित्र राष्ट्र :- फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और (1917 के बाद) अमेरिका।

2. केन्द्रीय शक्तियाँ :- जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली।

 

भारत के साथ अंतर्सम्बन्ध

  • औद्योगिक क्रांति के कारण अंग्रेजों ने जो औपनिवेशिक व्यवस्था बनाई थी, उसमें भारत ब्रिटेन का सबसे महत्वपूर्ण उपनिवेश था। युद्ध के माहौल में भी इसे हर हाल में बचाए रखना अंग्रेजों की पहली प्राथमिकता थी।
  • युद्ध शुरू होते ही ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को खुश करने के लिए घोषणा की कि उनका लक्ष्य भारत में एक ‘जिम्मेदार सरकार’ बनाना है।
  • 1916 में सरकार ने भारत में आयात शुल्क (Import Duty) लगाया ताकि यहाँ के कपड़ा उद्योग का विकास हो सके और उसका सीधा फायदा अंग्रेजों को मिले।

 

युद्ध के समय भारत में क्या बदला?

युद्ध के कारण भारत में नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा हुई, जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को और मजबूत बना दिया:

  • शुरुआत में तिलक और गांधी जी जैसे नेताओं ने अंग्रेजों की ‘स्वराज’ (आजादी) वाली बात पर भरोसा करके युद्ध में उनका साथ दिया था। लेकिन युद्ध आगे बढ़ने पर उनका यह भ्रम टूट गया।
  • युद्ध का खर्चा बढ़ने के कारण अंग्रेजों ने भारतीयों पर टैक्स का बोझ बहुत बढ़ा दिया, जिससे देश में भारी महंगाई बढ़ गई। इसके विरोध में नेताओं ने सरकार पर स्वराज के लिए दबाव बनाना शुरू किया।

 

युद्ध के दौरान शुरू हुए प्रमुख आंदोलन और घटनाएं

वर्ष (Year)

घटना / आंदोलन

क्या हुआ?

1913

गदर पार्टी की स्थापना

अमेरिका और कनाडा में रहने वाले भारतीय क्रांतिकारियों ने लाला हरदयाल के प्रयास से ‘गदर पार्टी’ बनाई और भारत में हथियारों के साथ क्रांति करने की कोशिश की।

1915-17

होमरूल लीग आंदोलन

आयरलैंड से प्रेरित होकर एनी बेसेन्ट और बाल गंगाधर तिलक ने भारत में इस आंदोलन की शुरुआत की।

1916

कांग्रेस के दोनों दलों का एक होना

कांग्रेस के दो हिस्से — गरम दल और नरम दल जो अलग हो गए थे, वे फिर से एक हो गए।

1916

लखनऊ समझौता

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच आपस में मिलकर राजनीतिक आंदोलन चलाने के लिए समझौता हुआ।

युद्ध काल

महात्मा गांधी का उत्कर्ष

इसी समय भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का प्रभाव बढ़ा और उन्होंने तीन सफल सत्याग्रह किए: चम्पारण, खेड़ा और अहमदाबाद आंदोलन

 इस दौरान क्रांतिकारी आंदोलन देश-विदेश दोनों जगह फैला। भारत में इसका असर बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब समेत पूरे उत्तरी भारत में बहुत तेजी से देखा गया।

 

प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर प्रभाव और गांधीवादी चरण

आर्थिक प्रभाव (युद्ध के बाद भारत की हालत)

  • युद्ध के बाद भारत की आर्थिक स्थिति बहुत बिगड़ गई। पहले चीजें महंगी हुईं और फिर व्यापार धीमा (मंद) होने लगा, जिससे शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे भारतीय बेरोजगार होने लगे।
  • महंगाई बहुत ज्यादा बढ़ गई, जिसने सबसे ज्यादा नुकसान मजदूरों, दस्तकारों (कारीगरों) और किसानों को पहुँचाया।
  • युद्ध के दौरान इंग्लैंड खुद संकट में था, इसलिए वहां से भारत आने वाला सामान (आयात) रुक गया। इसका फायदा उठाकर भारत के घरेलू उद्योग खूब फले-फूले और भारतीय उद्योगपतियों का एक नया वर्ग सामने आया।
  • युद्ध खत्म होते ही विदेशी सामान और पैसा फिर से भारत आने लगा। भारतीय उद्योगपति चाहते थे कि सरकार विदेशी सामानों पर भारी टैक्स लगाए ताकि उनके घरेलू धंधे बचे रहें, लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा नहीं किया। इससे उद्योगपतियों को समझ आ गया कि एक मजबूत राष्ट्रीय आंदोलन के बिना उनका भला नहीं होगा।

 

राजनीतिक प्रभाव (अंग्रेजों का धोखा और दमन)

  • युद्ध के समय मित्र राष्ट्रों (अंग्रेजों) ने वादा किया था कि वे दुनिया में लोकतंत्र लाएंगे और देशों को खुद फैसले लेने का अधिकार देंगे। लेकिन युद्ध के बाद उन्होंने आज़ादी देने के बजाय भारत पर और कड़ा नियंत्रण करना शुरू कर दिया।
  • कड़े नियंत्रण का सबसे बड़ा उदाहरण था रौलेट एक्ट। इस कानून के तहत किसी भी भारतीय को बिना अदालत में मुकदमा चलाए सीधे जेल में बंद किया जा सकता था।
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) :- इसी काले कानून (रौलेट एक्ट) का विरोध करने के कारण अमृतसर में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, जिसके बाद पूरे पंजाब में मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लगा दिया गया और लोगों पर भारी अत्याचार किए गए।

 

प्रशासनिक बदलाव और खिलाफत आंदोलन

  • राष्ट्रवाद की लहर को शांत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1919 में कुछ मामूली सुधार किए, जिसे ‘भारत सरकार अधिनियम’ भी कहा जाता है। इसके तहत प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार बढ़ाया गया और सदस्यों को चुनकर आने की व्यवस्था की गई। लेकिन भारतीय राष्ट्रवादी इन छोटी-मोटी रियायतों से संतुष्ट नहीं हुए और एक बड़े संघर्ष के लिए तैयार हो गए।
  • प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) की हार हुई। तुर्की का सुल्तान पूरी इस्लामिक दुनिया का राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता (खलीफा) था। अफवाह उड़ी कि अंग्रेज खलीफा पर एक बहुत सख्त संधि थोपने वाले हैं, जिससे भारत के मुसलमानों में भारी नाराजगी फैल गई।
  • 1916 के लखनऊ समझौते के कारण हिंदू-मुस्लिम पहले ही साथ आ चुके थे। गांधी जी ने खिलाफत के इस मुद्दे को एक बड़ा मौका माना और इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का जरिया बनाकर ‘असहयोग आंदोलन’ की रूपरेखा तैयार की।
  • युद्ध के दौरान दोनों गुटों ने एक-दूसरे के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया, जिससे उपनिवेशों (जैसे भारत) के सामने अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार का पर्दाफाश हो गया। भारतीयों के मन से गोरों की सांस्कृतिक श्रेष्ठता का डर हमेशा के लिए गायब हो गया।

 

राष्ट्रीय आंदोलन में गांधीवादी चरण (1919-1947)

  • प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बनी परिस्थितियों ने ही भारतीय राजनीति में गांधीवादी युग की शुरुआत की।
  • जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी जी ने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की और रचनात्मक काम शुरू किए।
  • गांधी जी ने तीन प्रमुख आंदोलनों का सफल नेतृत्व करके देश में अपनी बड़ी पहचान बनाई:

1. चम्पारण आंदोलन (किसानों के लिए)

2. खेड़ा आंदोलन (किसानों के लिए)

3. अहमदाबाद आंदोलन (मिल मजदूरों के लिए)

  • युद्ध के अंतिम दिनों में गांधी जी ने कांग्रेस, होमरूल और मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ गहरे संबंध बनाए और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों तथा रौलेट एक्ट के विरोध में सत्याग्रह की शुरुआत की।

 

रॉलेट एक्ट के विरोध में सत्याग्रह

रॉलेट एक्ट क्यों बनाया गया?

  • भारत में तेजी से बढ़ती हुई क्रांतिकारी घटनाओं और जनता के संतोष (गुस्से) को दबाने के लिए।
  • तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक समिति (कमेटी) बनाई।
  • इस समिति की सिफारिश पर ‘क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम’ को 21 मार्च 1919 को केंद्रीय विधान परिषद में पास किया गया। इसी को हम ‘रॉलेट एक्ट’ कहते हैं।
  • इस कानून के तहत एक खास अदालत बनाने का नियम था, जिसके फैसले के खिलाफ कोई भी व्यक्ति कहीं अपील नहीं कर सकता था।
  • पुलिस किसी भी व्यक्ति को बिना किसी पक्के सबूत (अमान्य साक्ष्य) और बिना वारंट के भी सीधे गिरफ्तार कर सकती थी।

 

भारतीयों का विरोध और गांधी जी का सत्याग्रह

  • महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने इसे पूरी तरह गलत, आज़ादी को छीनने वाला और इंसानों के मूल अधिकारों की हत्या करने वाला कानून बताया।
  • इस काले कानून के विरोध में गांधी जी की अध्यक्षता में एक सत्याग्रह सभा बनाई गई, जहाँ लोगों ने अपनी गिरफ्तारियां दीं।
  • गांधी जी के आह्वान पर 6 अप्रैल 1919 को पूरे देश में एक बड़ी हड़ताल का आयोजन किया गया।
  • इस आंदोलन के दौरान कई जगहों पर विरोध हिंसक हो गया और इसी विरोध की अंतिम परिणति (नतीजा) 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड के रूप में सामने आई।

 

जलियांवाला बाग हत्याकांड

यह भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।

  • रॉलेट एक्ट के विरोध में पूरे देश में गुस्सा था, खासकर पंजाब में। 9 अप्रैल 1919 को पंजाब के दो बड़े स्थानीय नेताओं — डॉ. सत्यपाल एवं डॉ. सैफुद्दीन किचलू को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। ये दोनों नेता कांग्रेस की स्वागत समिति के सदस्य भी थे।
  • अपने नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा बुलाई गई थी।
  • अमृतसर के जिला मजिस्ट्रेट जनरल ओ. डायर ने बिना किसी चेतावनी के, शांति से चल रही सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। इस बर्बर कार्रवाई में लगभग 1000 लोगों की हत्या कर दी गई और बहुत से लोग घायल हुए। इसके बाद पूरे पंजाब में मार्शल-लॉ (सैनिक कानून) लगाकर आतंक फैलाया गया।
  • इस क्रूर नरसंहार के विरोध में देश के बड़े नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा दी गई अपनी उपाधियां लौटा दीं:
  • रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘नाइट’ (Knight/Sir) की उपाधि त्याग दी।
  • गांधी जी ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि त्याग दी।
  • पूर्व अध्यक्ष शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा (त्याग पत्र) दे दिया।
  • इस घटना ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई जान फूंक दी और लोग अंग्रेजों के खिलाफ पूरी तरह एकजुट हो गए।

 

खिलाफत आंदोलन

यह आंदोलन भारत में मुस्लिम समाज द्वारा अंग्रेजों की वादाखिलाफी के खिलाफ शुरू किया गया था।

  • प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के खिलाफ तुर्की की हार हुई। युद्ध के बाद अंग्रेजों ने तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य को तोड़ दिया और वहाँ के सुल्तान के सारे अधिकार छीन लिए।
  • तुर्की का सुल्तान पूरी इस्लामिक दुनिया का ‘खलीफा’ (धार्मिक प्रमुख) माना जाता था। अंग्रेजों के इस बुरे बर्ताव और युद्ध के समय किए गए वादों को तोड़ने (वादाखिलाफी) के कारण भारत के मुसलमान अंग्रेजों के कट्टर खिलाफ हो गए।
  • अंग्रेजों को अपनी नीति बदलने पर मजबूर करने के लिए 1920 के शुरुआत में ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू हुआ।
  • 17 अक्टूबर 1919 को पूरे भारत में ‘खिलाफत दिवस’ मनाया गया था।
  • गांधी जी और कांग्रेस ने दिसंबर 1919 के अमृतसर अधिवेशन में इस आंदोलन को अपना पूरा समर्थन दिया। नवंबर 1919 में गांधी जी ‘अखिल भारतीय खिलाफत आंदोलन’ के अध्यक्ष चुने गए। गांधी जी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक अवसर माना।

 

खिलाफत आंदोलनकारियों की ‘तीन सूत्री मांग पत्र’:

  1. तुर्की के सुल्तान (खलीफा) को पर्याप्त लौकिक (राजनीतिक) अधिकार दिए जाएं ताकि वह इस्लाम की रक्षा कर सके।
  2. अरब देश को मुस्लिम शासन (खलीफा) के ही अधीन रखा जाए।
  3. खलीफा को मुसलमानों के पवित्र स्थलों का संरक्षक (रखवाला) बनाए रखा जाए।

 

असहयोग आंदोलन की शुरुआत

खिलाफत के इसी मुद्दे से आगे चलकर ‘असहयोग आंदोलन’ का जन्म हुआ।

  • कांग्रेस के इस विशेष अधिवेशन में गांधी जी की प्रेरणा से अंग्रेजों के गलत कामों के खिलाफ दो मुख्य प्रस्ताव पास करके ‘असहयोग आंदोलन’ चलाने का फैसला (निर्णय) लिया गया। इस अधिवेशन में दो मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई:

1. खिलाफत के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार का गलत रवैया।

2. पंजाब (जलियांवाला बाग) में निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले क्रूर अधिकारियों को सजा देने में सरकार की नाकामी (विफलता)।

इस अधिवेशन में कलकत्ता वाले प्रस्ताव को पूरी तरह मंजूरी (पुष्टि) दे दी गई। यहाँ कांग्रेस ने अपना मुख्य लक्ष्य ‘स्वशासन की जगह स्वराज’ तय किया और कई रचनात्मक कार्यक्रम तैयार किए, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन को बहुत मजबूती मिली।

 

असहयोग आंदोलन (1920-22)

यह महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया पहला बड़ा जन-आंदोलन था (यानी जिसमें देश की पूरी जनता ने एक साथ भाग लिया)।

 

आंदोलन के तीन मुख्य कारण

1. खिलाफत का मुद्दा।

2. पंजाब (जलियांवाला बाग) में सरकार की क्रूर कार्रवाइयों के खिलाफ इंसाफ (न्याय) पाना।

3. अंततः स्वराज (आज़ादी) हासिल करना।

 

आंदोलन के दो मुख्य कार्यक्रम

गांधी जी ने इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए दो तरह के तरीके अपनाए:

(क) विध्वंसात्मक कार्य (अंग्रेजों का बहिष्कार)

(ख) रचनात्मक कार्य (देश का अपना विकास)

* अंग्रेजों को नैतिक रूप से हराने के लिए उनकी दी गई उपाधियों और अवैतनिक (बिना सैलरी वाले) सरकारी पदों का त्याग करना।

* सरकारी और गैर-सरकारी समारोहों का बहिष्कार।

* सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विधान परिषद के चुनावों का पूरी तरह बहिष्कार।

* विदेशी सामानों और कपड़ों का बहिष्कार।

* मेसोपोटामिया में सरकारी नौकरी करने से साफ मना करना।

* अदालतों के चक्कर लगाने के बजाय पंचों (पंचायत) का फैसला मानना।

* बहिष्कार करने वाले छात्रों के लिए राष्ट्रीय विद्यालयों एवं कॉलेजों की स्थापना करना (ताकि बच्चों की पढ़ाई न छूटे)।

* स्वदेशी सामान अपनाना और चरखा-खादी को घर-घर में लोकप्रिय बनाना।

* ‘तिलक स्वराज कोष’ के लिए 1 करोड़ रुपये इकट्ठा करना।

* पूरे भारत में 20 लाख चरखों का मुफ्त वितरण (बांटना)

आंदोलन का आरंभ और फैलाव (1921)

  • आंदोलन की असली और मजबूत शुरुआत जनवरी 1921 में हुई, जिसे पूरे देश में अद्भुत सफलता मिली।
  • विदेशी कपड़ों को जलाया गया और छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए।
  • पढ़ाई जारी रखने के लिए कई नए राष्ट्रीय संस्थान खुले, जैसे—जामिया-मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ
  • मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास जैसे देश के बड़े बैरिस्टरों (वकीलों) ने अपनी चलती हुई वकालत छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़े।
  • 17 नवंबर 1921 को जब प्रिंस ऑफ वेल्स मुंबई (मुम्बई) आए, तो उनका स्वागत पूरे देश में एक बहुत बड़ी हड़ताल के साथ किया गया।

 

आंदोलन का हिंसक मोड़ और अंत (चौरी-चौरा कांड)

  • अंग्रेज सरकार ने आंदोलन को अवैध (गैर-कानूनी) घोषित कर दिया और लगभग 30,000 आंदोलनकारियों को जेल में बंद कर दिया। इसके विरोध में गांधी जी ने सरकार को ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ शुरू करने की चेतावनी दी।
  • इसी बीच उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर एक राजनीतिक जुलूस निकल रहा था। पुलिस की फायरिंग से गुस्साए लोगों की भीड़ ने थाने पर हमला कर दिया और उसमें आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। यह क्रांति 5 फरवरी 1922 को हुआ था
  • गांधी जी समझ गए कि आंदोलन हिंसक हो रहा है और जनता अभी पूरी तरह अहिंसक संघर्ष के लिए तैयार नहीं है। इसलिए 12 फरवरी 1922 को उन्होंने आंदोलन को स्थगित कर दिया।
  • मार्च 1922 में अंग्रेजों ने गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 6 साल की जेल की सजा सुनाई।

 

आंदोलन का परिणाम

  • आंदोलन के अचानक बंद होने और गांधी जी की गिरफ्तारी से खिलाफत का मुद्दा भी खत्म हो गया
  • हिंदू-मुस्लिम एकता टूट गई और पूरे देश में सांप्रदायिकता (दंगे और आपसी फूट) बढ़ गई।
  • न तो स्वराज मिला और न ही पंजाब के पीड़ितों को कोई न्याय मिला।
  • इन असफलताओं के बावजूद, पहली बार कांग्रेस और गांधी जी पर पूरी भारतीय जनता का अटूट विश्वास जागा।
  • समूचा देश (पूरा भारत) इतिहास में पहली बार एक साथ मिलकर सड़कों पर उतरा।
  • पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता मिली।
  • देश के अपने घरेलू उद्योगों, चरखा और करघा (कपड़ा बुनने वाले धंधे) को बहुत बढ़ावा मिला।

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)

  • ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता (अंग्रेजी राज) के खिलाफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 ई. में शुरू किया गया यह दूसरा बड़ा जन-आंदोलन था। इसका सामाजिक आधार बहुत बड़ा था
  • असहयोग आंदोलन के अचानक बंद होने से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक सूनापन आ गया था। लेकिन इसी बीच कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए जिन्होंने मरे हुए राष्ट्रवाद में फिर से नई जान फूंक दी।

 

आंदोलन शुरू होने के मुख्य कारण

साइमन कमीशन (1928)

  • 1919 के एक्ट (कानून) को पास करते समय ब्रिटिश सरकार ने वादा किया था कि 10 साल बाद इन सुधारों की जांच (समीक्षा) होगी। लेकिन समय से पहले ही नवंबर 1927 ई. में सरकार ने ‘इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन’ का गठन कर दिया, जिसे आमतौर पर ‘साइमन कमीशन’ कहा जाता है।
  • इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। यह 7 सदस्यीय आयोग था, जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। इसका उद्देश्य भारत में संवैधानिक सुधार के सवाल पर विचार करना था।
  • विरोध का सबसे बड़ा कारण यह था कि इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। भारत के स्वशासन (आज़ादी) का फैसला केवल विदेशी करने वाले थे, जो भारतीयों को कतई मंजूर नहीं था।
  • जब यह कमीशन 3 फरवरी 1928 ई. को बम्बई पहुँचा, तो भारतीयों ने काले झंडों, हड़तालों और प्रदर्शनों के साथ इसका स्वागत किया। प्रदर्शनकारियों ने “साइमन वापस जाओ” (Simon go Back) के नारे लगाए। इस आंदोलन ने देश में एक नया राजनीतिक संघर्ष खड़ा कर दिया।

 

नेहरू रिपोर्ट (1928)

  • साइमन कमीशन के बहिष्कार से चिढ़कर तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड बिरकनहैड ने भारतीयों को एक चुनौती दी कि वे खुद एक ऐसा संविधान बनाकर दिखाएं जो भारत के सभी दलों और गुटों को मंजूर हो।
  • अंग्रेजों की चुनौती का जवाब देने के लिए कांग्रेस ने फरवरी 1928 में दिल्ली में एक ‘सर्वदलीय सम्मेलन’ (सभी पार्टियों की मीटिंग) बुलाया। इसमें मोतीलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाया गया।
  • इस समिति ने जो रिपोर्ट तैयार की उसे ‘नेहरू रिपोर्ट’ कहा जाता है। इसमें ब्रिटिश सरकार से ‘डोमिनियन स्टेट’ (स्वशासित राज्य) का दर्जा देने की मांग की गई, जिससे कांग्रेस का एक वर्ग खुद असहमत था (क्योंकि वे पूरी आज़ादी चाहते थे)।
  • यह नेहरू रिपोर्ट पूरी तरह पास (स्वीकृत) नहीं हो सकी, लेकिन इसने कई महत्वपूर्ण फैसलों को जन्म दिया। इसके कारण देश में जो सांप्रदायिकता (आपसी मतभेद) की भावना अंदर ही अंदर छिपकर बैठी थी, वह खुलकर सामने आ गई, जिसे फैलाने में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनों ने सहयोग किया।

 

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव (1929-30)

  • 1929-30 की दुनिया भर की आर्थिक मंदी का भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा। चीजों की कीमतों में बेतहाशा (बहुत ज्यादा) बढ़ोतरी हुई।
  • भारत से होने वाला व्यापार (निर्यात) कम हो गया, लेकिन अंग्रेजों ने भारत से धन लूटना बंद नहीं किया। कई कारखाने बंद हो गए और अमीर उद्योगपतियों (पूंजीपतियों) की हालत खराब हो गई।
  • किसान वर्ग तो पहले से ही गरीबी झेल रहा था। इस मंदी के कारण पूरे देश का माहौल अंग्रेजी सरकार के एकदम खिलाफ हो गया, जिसने आंदोलन के लिए एक सही मौका तैयार किया।

 

समाजवाद का बढ़ता प्रभाव

  • इस समय भारत में मार्क्सवाद और समाजवादी विचार बहुत तेजी से फैल रहे थे।
  • कांग्रेस पार्टी के अंदर भी इन विचारों को लेकर दबाव बढ़ रहा था, जिसके कारण कांग्रेस के भीतर ‘वामपंथ’ (Left wing) का जन्म हुआ।
  • इस नई विचारधारा के बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस थे। इस वामपंथी दबाव को संभालने और संतुलित करने के लिए कांग्रेस को आंदोलन के एक नए कार्यक्रम की सख्त जरूरत थी।

 

क्रांतिकारी आंदोलनों का उभार

  • इस समय देश के भीतर हालात बहुत विस्फोटक थे। ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ और ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ जैसी घटनाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों की विचारधारा को और उग्र (तेज) बना दिया था।
  • बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की लहर फिर से जागी। अप्रैल 1930 में क्रांतिकारियों ने एक पूरी प्लानिंग के साथ चटगांव में सरकारी शस्त्रागार (जहाँ अंग्रेजों के हथियार रखे थे) पर छापा मार दिया। इस जांबाज मिशन का नेतृत्व सूर्यसेन कर रहे थे, जिन्हें प्यार से लोग ‘मास्टर दा’ कहते थे।

 

पूर्ण स्वराज की मांग (दिसंबर 1929)

  • दिसंबर 1929 ई. में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
  • 31 दिसंबर 1929 ई. की आधी रात को रावी नदी के तट पर नेहरू जी ने तिरंगा झंडा फहराया और स्वतंत्रता की घोषणा का प्रस्ताव पढ़ा।
  • इस अधिवेशन में 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में ‘पूर्ण स्वतंत्रता दिवस’ मनाने का ऐलान किया गया। इससे पूरे देश की जनता में उत्साह और देशभक्ति की एक नई लहर दौड़ गई।

 

गांधी जी का समझौतावादी रुख और आंदोलन का फैसला

  • आंदोलन शुरू करने से पहले गांधी जी ने वायसराय इरविन के सामने 11 सूत्री मांग (11 डिमांड्स) रखीं। गांधी जी ने कहा कि अगर सरकार इन मांगों को पूरा कर देती है, तो वे प्रस्तावित आंदोलन को टाल देंगे।
  • वायसराय इरविन ने उन मांगों को मानने से तो साफ मना किया ही, साथ ही उसने गांधी जी से मिलने तक से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ, अंग्रेजों का दमनचक्र (जुल्म) भी तेजी से चल रहा था।
  • इस स्थिति में मजबूर होकर महात्मा गांधी ने अपना ऐतिहासिक आंदोलन ‘दांडी मार्च’ से शुरू करने का पक्का निश्चय (फैसला) किया।

 

दांडी यात्रा (12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 ई.)

महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत अपनी ऐतिहासिक दांडी यात्रा से की थी।

  • 12 मार्च 1930 ई. को गांधी जी ने साबरमती आश्रम से अपने 78 अनुयायियों (साथियों) के साथ दांडी समुद्र तट के लिए पैदल यात्रा शुरू की।
  • यह 24 दिनों की पदयात्रा थी, जिसमें उन्होंने 250 किलोमीटर की दूरी तय की।
  • 5 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और अगले दिन 6 अप्रैल को सुबह समुद्र के पानी से नमक बनाकर उन्होंने अंग्रेजी सरकार के नमक कानून का उल्लंघन किया (कानून तोड़ा)।

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन के मुख्य कार्यक्रम

इस आंदोलन के तहत जनता को नीचे दिए गए कामों को करने के लिए कहा गया था:

  1. हर जगह नमक कानून का उल्लंघन किया जाए।
  2. छात्र स्कूलों और कॉलेजों का पूरी तरह बहिष्कार करें।
  3. विदेशी कपड़ों को सरेआम जलाया जाए।
  4. अंग्रेजी सरकार को कोई भी टैक्स (कर) न दिया जाए।
  5. औरतें शराब और अफीम की दुकानों के आगे धरना दें।
  6. वकील अदालतें छोड़ें और सरकारी कर्मचारी अपने पदों से इस्तीफा (पदत्याग) दें।
  7. हर घर में लोग चरखा कातें और सूत बनाएं।
  8. सबसे जरूरी शर्त: इन सभी कामों में सत्य और अहिंसा को सबसे ऊपर रखा जाए, तभी स्वराज मिल सकता है।

 

नमक सत्याग्रह का पूरे देश में प्रसार

गांधी जी द्वारा दांडी में नमक कानून तोड़ते ही पूरे देश में यह आंदोलन फैल गया:

  • तमिलनाडु :- तंजौर के समुद्र तट पर सी. राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से वेदारण्यम तक की नमक यात्रा की।
  • मालाबार :- के. केलप्पन ने कालीकट से पोथानूर तक की नमक यात्रा की।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने पठानों में देशप्रेम जगाया। इन्हें ‘बादशाह खान’ या ‘सीमांत गांधी’ भी कहा जाता है। उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक संगठन बनाया, जिसे ‘लाल कुर्ती’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद यहाँ मिल मजदूरों ने भयंकर हड़ताल की और विद्रोह का रूप ले लिया।
  • यहाँ सबसे तेज विरोध हुआ। सरोजिनी नायडू और इमाम साहब के नेतृत्व में हुए आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बहुत क्रूरता (दमन) दिखाई।
  • बंगाल में चौकीदारी कर का विरोध हुआ, गुजरात में कर-बंदी (टैक्स न देने का) आंदोलन चला, असम में छात्रों ने कनिंघम सरकुलर का कड़ा विरोध किया और मणिपुर व नगालैंड में रानी गैडिनल्यू ने आंदोलन का शानदार नेतृत्व किया।

 

बिहार में आंदोलन का प्रसार

बिहार में समुद्र तट नहीं होने के कारण नमक बनाना मुमकिन नहीं था, इसलिए यहाँ आंदोलन का तरीका थोड़ा अलग था:

  • बिहार में समुद्र न होने के कारण ‘चौकीदारी कर (टैक्स)’ न देने का आंदोलन शुरू हुआ।
  • सिवान जिले में इस आंदोलन का नेतृत्व गंगा प्रसाद राय ने किया। बाद में यह आंदोलन गया, भागलपुर, मुंगेर, बाढ़, मोकामा, बढ़हिया और बेगुसराय जैसे इलाकों में तेजी से फैल गया।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान छपरा जेल के कैदियों ने विदेशी कपड़े पहनने से साफ मना कर दिया और स्वदेशी कपड़ों की मांग को लेकर ‘नंगी हड़ताल’ की।
  • पटना जिले में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का नेतृत्व श्रीमती हसन इमाम ने किया, जिसे बाद में विंध्यवासिनी देवी ने आगे बढ़ाया।
  • गया जिले में चन्द्रावती देवी ने चौकीदारी टैक्स के विरोध में जोरदार आंदोलन चलाया।

 

गांधी-इरविन पैक्ट (दिल्ली समझौता)

सविनय अवज्ञा आंदोलन के बहुत ज्यादा फैलने के कारण अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

  • 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसे ‘गांधी-इरविन पैक्ट’ या ‘दिल्ली समझौता’ कहा जाता है।
  • गांधी जी ने आंदोलन को रोक दिया।
  • वे लंदन में होने वाले ‘द्वितीय गोलमेज सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए तैयार हो गए। वायसराय इरविन ने भी भारतीयों की कुछ मांगों को मान लिया।
  • गांधी जी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गए, लेकिन वहां किसी बात पर सहमति नहीं बन सकी और वे निराश होकर भारत लौट आए। भारत लौटते ही उन्होंने देखा कि अंग्रेजों ने फिर से दमन (जुल्म) शुरू कर दिया है।
  • गांधी जी ने दोबारा सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, लेकिन इस बार लोगों में पहले जैसा उत्साह नहीं था। आखिरकार 1934 ई. में आंदोलन को पूरी तरह से वापस ले लिया गया

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन के परिणाम (महत्वपूर्ण असर)

भले ही यह आंदोलन बीच में धीमा पड़ गया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम निकले:

  1. इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग — महिलाओं, मजदूरों, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब व अनपढ़ लोगों ने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।
  2. समाज के नए वर्गों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ गहरी भावना जागी और वे राजनीति से जुड़े।
  3. इतिहास में पहली बार महिलाएं बड़े स्तर पर अपने घरों से बाहर आईं और सार्वजनिक जीवन व राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनीं।
  4. भारतीयों द्वारा विदेशी सामानों के ‘आर्थिक बहिष्कार’ के कारण इंग्लैंड से आने वाले कपड़ों और अन्य वस्तुओं के आयात में भारी गिरावट आई।
  5. इस आंदोलन के दौरान जनता को जोड़ने के लिए पहली बार नए और अनोखे तरीकों का इस्तेमाल हुआ, जैसे:
    • बच्चों की ‘वानर सेना’ बनाई गई।
    • लड़कियों की ‘मंजरी सेना’ का गठन हुआ।
    • सुबह के समय लोगों को जगाने के लिए ‘प्रभात फेरी’ निकाली जाती थी।
    • पत्र-पत्रिकाओं (अखबारों) के जरिए लोगों को इकट्ठा किया गया।
  6. इस आंदोलन ने देश के भीतर चल रहे किसान और श्रमिक आंदोलनों को बहुत प्रभावित किया और उन्हें नई ताकत दी।
  7. इस आंदोलन के दबाव के कारण ही ब्रिटिश सरकार को 1935 ई. का भारत शासन अधिनियम पास करना पड़ा।
  8. पहली बार ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को अपने बराबर मानकर समानता के आधार पर मेज पर बैठकर बातचीत की।

 

किसान आंदोलन

  • 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध (आखिरी हिस्से) में भारत की अर्थव्यवस्था बार-बार पड़ने वाले भीषण अकाल (सूखे) के कारण पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी।
  • 1876-78, 1896-97 और 1899-1900 के भयंकर अकालों के कारण भूख से लाखों किसानों और कमजोर वर्ग के लोगों की मौत हो गई थी।
  • इन अकालों ने यह साफ कर दिया कि अंग्रेजों की भूमि कर नीति (लगान नीति) कितनी क्रूर और शोषक थी (क्योंकि फसल न होने पर भी अंग्रेज जबरन टैक्स वसूलते थे)। इसके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों ने विद्रोह किए, जिसके बाद अंग्रेजों ने दिखावे के लिए कुछ सुधार और ‘टीनेंसी एक्ट’ (टेनेंसी कानून) पास किए, लेकिन वे काफी नहीं थे।
  • 1885 में कांग्रेस की स्थापना के शुरुआती 20 सालों तक किसानों की समस्याओं पर कोई बड़ा या विशेष काम नहीं हो पाया (यद्यपि कांग्रेसी अपने अधिवेशनों में इस पर चर्चा करते थे)।
  • लेकिन जैसे ही महात्मा गांधी का भारतीय राजनीति में आगमन (पदार्पण) हुआ, किसान आंदोलनों को एक नई दिशा और बहुत बड़ी ताकत मिली। इसके बाद हुए प्रमुख किसान आंदोलनों ने पूरे राष्ट्रीय आंदोलन का रास्ता तय किया।

 

चम्पारण आन्दोलन (1917)

यह गांधी जी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह था, जो बिहार के चम्पारण जिले में किसानों के हक के लिए लड़ा गया था।

 

आंदोलन का मुख्य कारण: तिनकठिया व्यवस्था

  • बिहार के चम्पारण में गोरे बागान मालिकों (अंग्रेजों) द्वारा ‘तिनकठिया व्यवस्था’ लागू की गई थी। इसके तहत हर किसान को अपनी जमीन के $3/20$ हिस्से पर जबरन नील की खेती करनी पड़ती थी।
  • यह नील की खेती जमीन के सबसे उपजाऊ हिस्से पर करनी होती थी, जिससे जमीन की उपजाऊ शक्ति (उर्वरता) खत्म हो जाती थी। इसलिए किसान नील की खेती नहीं करना चाहते थे।
  • बागान मालिक किसानों की फसल को एक फिक्स बहुत कम दाम पर जबरन खुद ही खरीदते थे।
  • इसी समय जर्मनी के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम (आर्टिफिशियल) नील बना लिया, जिससे बाजार में भारतीय नील की मांग गिर गई। अंग्रेजों को घाटा होने लगा, तो उन्होंने अपना घाटा किसानों पर लाद दिया। अंग्रेजों ने कहा कि अगर नील की खेती से मुक्ति चाहिए, तो एक बहुत बड़ा मुआवजा (पैसा) दो, साथ ही उन्होंने लगान (टैक्स) भी बहुत बढ़ा दिया।

 

गांधी जी का चम्पारण आगमन और संघर्ष

  • चम्पारण के एक किसान राजकुमार शुक्ल ने 1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में इस अत्याचार की ओर सबका ध्यान खींचा और गांधी जी से चम्पारण आने की प्रार्थना की।
  • जब गांधी जी मोतिहारी (चम्पारण) पहुँचे, तो अंग्रेजी सरकार ने उन्हें तुरंत चम्पारण छोड़ने का सरकारी आदेश दिया। लेकिन गांधी जी ने जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस आदेश को मानने से साफ मना कर दिया।
  • गांधी जी को गिरफ्तार कर कोर्ट में मुकदमा चलाया गया, लेकिन बिहार सरकार को कमिश्नर और कोर्ट का यह आदेश वापस लेना पड़ा। गांधी जी को किसानों के कष्टों की जांच करने की पूरी आज़ादी मिल गई।

 

आन्दोलन का परिणाम

  • गांधी जी के दबाव के कारण सरकार ने इस समस्या की जांच के लिए एक कमेटी बनाई, जिसके सदस्य खुद गांधी जी भी थे।
  • कमेटी की सलाह पर 1919 में ‘चम्पारण एग्रेयियन एक्ट’ पास हुआ, जिसके तहत:
  1. क्रूर ‘तिनकठिया व्यवस्था’ को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया।
  2. किसानों के अन्य अवैध टैक्स भी खत्म कर दिए गए।
  3. अंग्रेजों द्वारा अवैध रूप से वसूले गए पैसों का 25% हिस्सा किसानों को वापस लौटाया गया
  • इस आंदोलन में पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के नेताओं जैसे — डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, गोरख प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद और धरनीधर प्रसाद ने गांधी जी का साथ दिया। स्थानीय महाजनों और गांवों के मुखियाओं ने भी सहयोग किया।
  • चूंकि गांधी जी ने इस आंदोलन को अपने सिद्धांतों — सत्य और अहिंसा पर लड़ा था, इसलिए इसे चम्पारण सत्याग्रह भी कहा जाता है।

 

खेड़ा आन्दोलन (1918)

चम्पारण की सफलता के बाद गांधी जी ने गुजरात के किसानों की समस्या को अपने हाथ में लिया।

  • सन 1917-18 में गुजरात के खेड़ा जिले में भारी बारिश के कारण खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद (नष्ट) हो गई थी।
  • किसान चाहते थे कि उनकी इस दुर्दशा को देखते हुए सरकार उनका लगान (टैक्स) माफ कर दे।
  • लगान कानून के अंदर ऐसे समय में टैक्स माफी का कोई साफ नियम नहीं था। इसलिए सरकार ने किसानों की मांग को खारिज कर दिया और आरोप लगाया कि बाहर के लोग किसानों को भड़का रहे हैं।
  • अंग्रेजों के इस निराधार आरोप के खिलाफ गांधी जी ने 22 जून 1918 को खेड़ा में सत्याग्रह का ऐलान किया, जो लगभग एक महीने तक चला।
  • इसी बीच रबी की अच्छी फसल होने और सरकार द्वारा अपने दमनकारी तरीकों को बंद करने के कारण स्थिति बदल गई। गांधी जी ने सत्याग्रह समाप्त करने की घोषणा की।
  • इस आंदोलन ने गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों के सीधे-साधे किसानों के अंदर अंग्रेजी शासन के शोषक कानूनों के खिलाफ खड़े होने का अद्भुत साहस और हिम्मत जगा दी।

 

मोपला विद्रोह (1917)

  • आधुनिक केरल राज्य के मालाबार तट पर किसानों का एक बहुत बड़ा विद्रोह हुआ।
  • ये स्थानीय पट्टेदार (किराए पर खेती करने वाले) और खेतीहर मजदूर थे, जो इस्लाम धर्म को मानते थे।
  • यहाँ के भू-स्वामी (जमींदार) उच्च जाति के हिन्दू थे, जिन्हें ‘नम्बूदरी’ एवं ‘नायर’ कहा जाता था। इन जमींदारों को अंग्रेजी सरकार, पुलिस और अदालतों का पूरा समर्थन प्राप्त था।
  • 19वीं शताब्दी में मोपला किसानों पर लगान (टैक्स) बहुत बढ़ा दिया गया और जमीन पर उनके अधिकार छीन लिए गए। इस गुस्से ने किसानों और जमींदारों के बीच लड़ाई का रूप ले लिया, जो बाद में सांस्कृतिक/सांप्रदायिक हिंसा में बदल गई।
  • जब कांग्रेस ने किसानों के हक में भूमि सुधारों की मांग की और खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, तो मोपला विद्रोही और उत्साहित हो गए। उन्होंने अपने एक धार्मिक नेता अली मुसालियर को अपना राजा घोषित कर दिया और सरकारी दफ्तरों पर हमले शुरू कर दिए।
  • स्थिति बिगड़ती देख अक्टूबर 1921 में अंग्रेजी सेना ने कड़ी सैनिक कार्रवाई की। दिसंबर तक 10 हजार से अधिक विद्रोही मारे गए और 50 हजार से ज्यादा को बंदी बना लिया गया। इस तरह यह आंदोलन समाप्त हो गया।

 

बारदोली सत्याग्रह (फरवरी 1928)

यह इतिहास का सबसे सफल और सुव्यवस्थित किसान आंदोलन माना जाता है।

  • गुजरात के सूरत जिले के बारदोली ताल्लुक में।
  • अंग्रेजों द्वारा लगान (टैक्स) में की गई भारी वृद्धि। सरकार द्वारा बनाई गई ‘बारदोली जाँच आयोग’ की सिफारिशों से भी किसान संतुष्ट नहीं थे।
  • इस आंदोलन का नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया। उन्होंने बहुत सूझबूझ से आंदोलन चलाया।
  • इसी आंदोलन की महान सफलता के बाद वल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि मिली।
  • इस आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
    • किसानों के समर्थन में मुंबई (बम्बई) में रेलवे हड़ताल हुई।
    • बड़े नेताओं जैसे के. एम. मुंशी और लालजी नारंगी ने विरोध में बम्बई विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा (त्यागपत्र) दे दिया।
  • चौतरफा दबाव के बाद अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने ब्लूमफील्ड और मैक्सवेल के नेतृत्व में एक नई जाँच समिति बनाई। इस समिति ने लगान की वृद्धि को गलत माना और टैक्स की दर को कम कर दिया। इस तरह यह आंदोलन पूरी तरह सफल रहा।

 

किसान सभा का गठन (1920 से 1936)

शुरुआती आंदोलनों से किसानों को अपनी ताकत का अहसास हो गया था, जिसके बाद खुद को मजबूत करने के लिए देश में ‘किसान सभाओं’ का गठन शुरू हुआ 1920 के दशक में बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब में किसान सभाएं बनीं।

 

बिहार में किसान सभा का विकास

  1. 1922-23 (मुंगेर) :- बिहार में पहली बार शाह मोहम्मद जुबैर के नेतृत्व में किसान सभा का गठन हुआ।
  2. 1928 (बिहटा) :- इस आंदोलन को असली और सबसे शक्तिशाली आधार तब मिला जब स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने बिहटा में किसान सभा की स्थापना की।
  3. 1929 (सोनपुर) :- स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने सोनपुर में ‘प्रांतीय किसान सभा’ की विधिवत स्थापना की। इसी साल सरदार पटेल ने भी बिहार की यात्रा की जिससे किसानों का हौसला बहुत बढ़ा।

 

अखिल भारतीय किसान सभा (1936)

  • 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में पूरे देश के स्तर पर ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ का गठन किया गया।
  • इसी समय बिहार में ‘बकास्त आंदोलन’ (जमींदारों द्वारा कब्जा की गई जमीन को वापस लेने की लड़ाई) शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे इतनी गंभीरता से लिया कि अपने 1937 के अधिवेशन में इसे अपनी मुख्य मांग के रूप में स्वीकार किया।
  • इस तरह देश के किसानों की समस्याएं राष्ट्रीय आंदोलन (आज़ादी की लड़ाई) की मुख्य धारा का एक जरूरी हिस्सा बन गईं।

 

मजदूर आन्दोलन

यूरोप में औद्योगिकीकरण और मार्क्सवादी विचारों के फैलने से भारत के मजदूरों में भी अपने हक के लिए चेतना (जागरूकता) जागी।

  • 1917 में अहमदाबाद में प्लेग की महामारी फैली थी। मजदूरों को रोकने के लिए मिल मालिकों ने उनके वेतन में बढ़ोतरी (प्लेग बोनस) की थी, जिसे महामारी खत्म होने पर अचानक बंद कर दिया गया।
  • प्रथम विश्वयुद्ध के कारण बढ़ी महंगाई के समय बोनस कटना मजदूरों के लिए बहुत कष्टदायक था।
  • गांधी जी ने मजदूरों की मांग का समर्थन किया और मिल मालिकों के साथ बातचीत की। उन्हीं के सुझाव पर बोनस को दोबारा चालू किया गया और उसकी दर 35% तय की गई
  • 1917 की रूसी क्रांति, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना जैसी घटनाओं का भारतीय मजदूरों पर सीधा असर पड़ा।

 

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का गठन

  • 31 अक्टूबर 1920 को कांग्रेस पार्टी ने ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (AITUC) की स्थापना की।
  • चित्तरंजन दास ने सलाह दी कि कांग्रेस को किसानों और मजदूरों को राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल करना चाहिए और उनकी मांगों का पूरा समर्थन करना चाहिए।
  • समय के साथ मजदूरों में वामपंथी (कम्युनिस्ट) विचार लोकप्रिय हुए जिससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई। मार्च 1929 में सरकार ने कुछ बड़े वामपंथी नेताओं के खिलाफ ‘मेरठ षड्यंत्र’ के नाम पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया।
  • 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में मजदूरों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। लेकिन 1931 में AITUC तीन अलग-अलग संगठनों में बंट गया:
  1. ऑल इंडिया नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस
  2. हिन्द मजदूर संघ
  3. यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस
  • इसके बाद भी जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस जैसे नेताओं द्वारा मजदूरों को समाजवादी विचारों के तहत समर्थन मिलता रहा।

 

जनजातीय (आदिवासी) आन्दोलन

19वीं और 20वीं शताब्दी में अंग्रेजी राज के शोषण और उनके वन कानूनों के खिलाफ भारत के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासियों ने बड़े विद्रोह किए:

 

रम्पा विद्रोह (आंध्र प्रदेश – 1922-24)

  • दक्षिण भारत के गोदावरी पहाड़ियों के पुराने रम्पा प्रदेश में (जहाँ 1916 से ही अशांति थी)।
  • इस बड़े आंदोलन का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया था।
  • साहूकारों द्वारा आदिवासियों का शोषण, झूम खेती पर रोक और वन विभाग द्वारा पशुओं को चराने (चराई संबंधी अधिकारों) पर पाबंदी लगाना।
  • आदिवासियों ने राजू के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ ‘छापामार युद्ध’ (Gorilla War) छेड़ रखा था।
  • इस विद्रोह को दबाने के लिए मद्रास सरकार को बहुत पैसा और सेना खर्च करनी पड़ी। आखिरकार 6 मई 1924 को राजू को गिरफ्तार करके गोली मार दी गई और सितंबर 1924 तक इस विद्रोह को पूरी तरह कुचल दिया गया।

 

खोंड विद्रोह (उड़ीसा – 1914)

  • उड़ीसा की सामंतवादी रियासत दसपल्ला में अक्टूबर 1914 में यह विद्रोह हुआ।
  • यह विद्रोह उत्तराधिकार (राजा कौन बनेगा) के विवाद से शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही इसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक बड़ा रूप ले लिया।
  • अंग्रेजों को डर था कि यह विद्रोह पूर्वी घाट के दुर्गम रास्तों से होता हुआ कालाहांडी और बस्तर तक फैल जाएगा। इसलिए अंग्रेजों ने बहुत क्रूरता से खोंडों के गांवों को जलाकर नष्ट कर दिया और इसका दमन किया।

 

उरांव विद्रोह (छोटानागपुर – 1914-20)

  • छोटानागपुर क्षेत्र (झारखंड) के उरांव आदिवासियों के बीच यह आंदोलन भड़का।
  • इस आंदोलन के नेता जतरा भगत थे।
  • यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था। इसमें आदिवासियों के सामाजिक और शैक्षणिक सुधार पर बल दिया गया। जतरा भगत ने आदिवासियों को एकेश्वरवाद (एक ईश्वर को मानना), मांस-मदिरा (शराब) का त्याग करने और आदिवासी नृत्यों से दूर रहने की सीख दी।
  • आगे चलकर 1920 में यह आंदोलन गांधी जी के ‘असहयोग आंदोलन’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

 

अन्य प्रमुख जनजातीय विद्रोह

  • संथाल विद्रोह (1917) की शुरुआत मयूरभंज (उड़ीसा) में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
  • मणिपुर में ‘थोडोई कुकियों’ ने विद्रोह किया, जहाँ दो सालों तक छापामार युद्ध चलता रहा।
  • विद्रोहों के मुख्य कारण
  1. ‘पोथांग’ प्रथा का विरोध: इसमें आदिवासियों को बिना कोई मजदूरी (पैसा) दिए जबरन सरकारी अधिकारियों का सामान उठाना पड़ता था (बेगारी)।
  2. सरकार द्वारा आदिवासियों की झूम की खेती पर प्रतिबंध लगाना।
  • 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (North-West) के आदिवासियों में भी तीखी देशभक्ति देखी गई। आगे चलकर 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय दक्षिणी बिहार (आधुनिक झारखंड) के आदिवासियों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त राष्ट्रीय चेतना उभरी।

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की असली शुरुआत 19वीं शताब्दी के आखिरी हिस्से में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना से मानी जाती है। यह पूरे भारत के स्तर की पहली अखिल भारतीय राजनीतिक संस्था थी, जिसने आज़ादी की लड़ाई को एक नई दिशा और गति दी।

 

कांग्रेस की स्थापना से पहले बने क्षेत्रीय संगठन

कांग्रेस से पहले भारत में अलग-अलग राज्यों या क्षेत्रों के स्तर पर कई छोटे संगठन बने थे, जिन्होंने लोगों में राजनीतिक चेतना जगाई:

  • लैंड होल्डर्स सोसाइटी – 1838
  • बंगाल ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन – 1843
  • इस्ट इंडिया एसोसिएशन – 1866
  • पूना सार्वजनिक सभा – 1870
  • इंडियन लीग – 1875
  • इंडियन एसोसिएशन – 1876
  • मद्रास महाजन सभा – 1884

भारत में अंग्रेजी शिक्षा, समाचार पत्रों का विकास, रेल/डाक जैसी संरचनाओं का विकास और लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों (जैसे प्रेस और शस्त्र अधिनियम) के विरोध के कारण भारतीयों को यह महसूस होने लगा था कि पूरे देश के स्तर पर एक मजबूत संगठन का होना बहुत जरूरी है। इल्बर्ट बिल विवाद ने इस विचार को और पक्का कर दिया।

 

स्थापना का इतिहास (1883 से 1885)

  • दिसंबर 1883 ई. में ‘इंडियन एसोसिएशन’ के सचिव आनन्द मोहन बोस ने कोलकाता (कलकत्ता) में ‘नेशनल कांफ्रेंस’ नामक एक देशव्यापी सम्मेलन बुलाया, जिसका मकसद सभी राष्ट्रवादी ताकतों को एक करना था।
  • इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए 1884 में एक रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी ऐलेन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hume) ने ‘भारतीय राष्ट्रीय संघ’ (Indian National Union) की स्थापना की। ह्यूम ने इस बारे में ब्रिटिश पार्लियामेंट्री कमिटी और वायसराय लॉर्ड डफरिन से भी विचार-विमर्श किया और उनका समर्थन पाया।
  • इस संघ की पहली बैठक 25-28 दिसंबर 1885 को पूना में होनी तय हुई थी, लेकिन दुर्भाग्य से पूना में प्लेग की महामारी फैलने के कारण बैठक का स्थान बदलकर बम्बई कर दिया गया।

 

कांग्रेस का जन्म (28 दिसम्बर 1885)

  • 28 दिसंबर 1885 (सोमवार) को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में यह ऐतिहासिक बैठक हुई।
  • इसी बैठक में इस संगठन का नाम बदलकर “अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” कर दिया गया। (‘कांग्रेस’ शब्द उत्तरी अमेरिका के इतिहास से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है — लोगों का समूह)।
  • इस पहली बैठक की अध्यक्षता व्योमेशचन्द्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee) ने की थी।
  • इस ऐतिहासिक बैठक में पूरे भारत से कुल 72 सदस्य शामिल हुए थे।

 

कांग्रेस के शुरुआती 5 मुख्य उद्देश्य

प्रारंभ में कांग्रेस के लक्ष्य निम्नलिखित थे:

  1. भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में देश के हित के काम में लगे लोगों और संगठनों के बीच एकता स्थापित करना
  2. देशवासियों के बीच आपसी मेलजोल और दोस्ती बढ़ाना तथा धर्म, वंश, जाति या प्रांतीय भेदभाव (विद्वेष) को पूरी तरह समाप्त करना।
  3. राष्ट्रीय एकता के विकास को हर संभव प्रयास करके मजबूत करना।
  4. देश के महत्वपूर्ण और जरूरी सवालों पर भारत के प्रमुख नागरिकों के बीच चर्चा करना और उसका रिकॉर्ड तैयार करना।
  5. प्रार्थना पत्रों और ज्ञापनों द्वारा वायसराय और उनकी काउंसिल से प्रशासनिक सुधारों के लिए गुहार लगाना।

 

कांग्रेस का सफर

  • शुरुआत में कांग्रेस का उद्देश्य शासन व्यवस्था में केवल कुछ छोटे-मोटे सुधार लाना था।
  • सन 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन करने के बाद कांग्रेस में विरोध के सुर बहुत तेज हो गए। परिणाम यह हुआ कि 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो भागों में बंट गई (फूट पैदा हो गई), जिससे पार्टी कुछ समय के लिए कमजोर पड़ गई।
  • आगे चलकर जब भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का आगमन हुआ, तो उन्होंने कांग्रेस को जबरदस्त मजबूती दी। इसी पार्टी ने आगे चलकर पूरे देश में राष्ट्रीय एकता बनाई और भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने में सबसे मुख्य भूमिका निभाई।

 

वामपंथ / कम्युनिस्ट पार्टी

  • ‘वामपंथी’ शब्द का पहला प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति में हुआ था, लेकिन आगे चलकर यह ‘समाजवाद’ या ‘साम्यवाद’ (Communism) का पर्यायवाची बन गया।
  • 20वीं शताब्दी की शुरुआत में बम्बई, कलकत्ता, कानपुर, लाहौर और मद्रास जैसी जगहों पर साम्यवाद की लहर फैली। शुरुआत में मुजफ्फर अहमद, एस. ए. डांगे और मौलवी बरकतुल्ला गुलाम हुसैन जैसे नेताओं ने अपनी पत्र-पत्रिकाओं के जरिए इन विचारों को फैलाया।

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना:

  • रूसी क्रांति (1917) की सफलता के बाद 1920 ई. में एम. एन. राय (मानवेन्द्र नाथ राय) ने ताशकंद में ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ की स्थापना की।
  • असहयोग आंदोलन के बाद जब ये लोग राष्ट्रवादी आंदोलनों से जुड़े, तो अंग्रेजी सरकार ने इनका दमन (रोकथाम) शुरू किया। सरकार ने इनके खिलाफ कई प्रसिद्ध मुकदमे चलाए, जैसे
    • पेशावर षड्यंत्र केस (1922-23)
    • कानपुर षड्यंत्र केस (1924)
    • मेरठ षड्यंत्र केस (1929-33) – इसके तहत 8 कम्युनिस्ट नेताओं पर लंबे मुकदमे चले, जिससे जनता में इन्हें “साम्यवाद के शहीद” के रूप में पहचान मिली।
  • सरकार कम्युनिस्टों को रोकने के लिए ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ लाई थी, जिसका कांग्रेसियों ने भी विरोध किया क्योंकि यह कानून देशहित के खिलाफ था।
  • दिसंबर 1925 में सत्यभक्त नामक व्यक्ति ने कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की औपचारिक स्थापना की। इसके बाद इंग्लैंड के साम्यवादियों ने भी इसमें रुचि लेना शुरू किया।

 

मजदूर किसान पार्टी और कांग्रेस में फूट:

  • अखिल भारतीय स्तर पर ‘मजदूर किसान पार्टी’ बनी। इसके प्रभाव से कांग्रेस के अंदर जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता समाजवादी विचारों की तरफ झुके।
  • बम्बई में कांग्रेस के भीतर ही इस दल की स्थापना की गई (यद्यपि जयप्रकाश बाबू ने इससे पहले 1931 में ‘बिहार समाजवादी दल’ का गठन कर लिया था)।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान साम्यवादियों का कांग्रेस से मतभेद हो गया। उनका मानना था कि कांग्रेस केवल पूंजीपतियों और जमींदारों का समर्थन करती है। इस मतभेद और आपसी फूट के कारण आगे चलकर सुभाषचन्द्र बोस ने ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नामक नई पार्टी बनाई।

 

मुस्लिम लीग

अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति का सबसे बड़ा परिणाम मुस्लिम लीग के रूप में सामने आया।

  • 1857 के विद्रोह में हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर अंग्रेज डर गए थे। उन्होंने भारत में राज करने के लिए दोनों संप्रदायों को आपस में लड़ाने की योजना बनाई।
  • 1887 में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को केवल ‘हिंदुओं की पार्टी’ कहकर संबोधित किया। उसी समय विलियम हंटर ने अपनी किताब में अंग्रेजों को मुसलमानों से दोस्ती बढ़ाने की सलाह दी थी।
  • अंग्रेजों की इन चालों के कारण कुछ संभ्रांत (अमीर/ऊंचे वर्ग के) मुसलमानों के मन में यह डर बैठ गया कि कांग्रेस केवल ‘हिंदू राज्य’ बनाना चाहती है।

 

मुस्लिम लीग की स्थापना की कहानी

  • लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में बांट दिया। अंग्रेजों ने पूर्वी बंगाल को ‘मुस्लिम प्रांत’ का नाम देकर मुसलमानों को समझाया कि यह उनके फायदे के लिए है। हालांकि, हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर इसका कड़ा विरोध किया, जिसके कारण 1911 में लॉर्ड हार्डिंग को बंगाल विभाजन वापस (रद्द) लेना पड़ा
  • अंग्रेजों की शह पर सर आगा खां के नेतृत्व में 35 प्रमुख मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल वायसराय लॉर्ड मिन्टो के निजी सचिव ‘डनलप स्मिथ’ के माध्यम से वायसराय से मिला।
  • इसके बाद ढाका के नवाब सलीमउल्लाह खां के सुझाव पर 30 दिसंबर 1906 को ढाका में एक सम्मेलन बुलाया गया। यहीं पर “ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” की स्थापना हुई।

 

मुस्लिम लीग के मुख्य उद्देश्य:

  1. सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को उनकी आबादी के सही अनुपात में स्थान दिलाना।
  2. अदालतों में न्यायाधीशों (जजों) के पदों पर मुसलमानों को जगह दिलाना।
  3. विधायी परिषदों (विधान परिषद) के लिए मुसलमानों के लिए ‘अलग निर्वाचक मंडल’ (Separate Electorate) बनाना।

 

लीग और कांग्रेस

  • अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग की मांग मानते हुए 1909 के कानून में मुसलमानों के लिए अलग चुनाव प्रणाली दे दी, जिसने भारत में सांप्रदायिकता का असली बीज बोया।
  • 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ। इसके बाद हकीम अजमल खां, डॉ. अंसारी, डॉ. किचलू और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस के साथ मिलकर देश के आंदोलनों को आगे बढ़ाया।
  • शुरुआती चुनावों में मुस्लिम लीग को बड़ी सफलता नहीं मिली, जिससे यह साफ हो गया कि मुस्लिम जनता में लीग का आधार बहुत बड़ा नहीं था और कांग्रेस ही देश की मुख्य पार्टी थी।
  • आगे चलकर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस से पूरी तरह अलग होकर शासन में अलग प्रतिनिधित्व और अलग देश की मांग शुरू कर दी। अंग्रेजों की शह और नीतियों ने अंततः भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया।

 

स्वराज पार्टी (पेज 96 – 97)

  • 1922 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लेने से देश के नेताओं और जनता में भारी निराशा और गुस्सा था। इसका प्रदर्शन 1922 के कांग्रेस के गया अधिवेशन में हुआ, जिसके अध्यक्ष चित्तरंजन दास (सी. आर. दास) थे।
  • चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू का मानना था कि कांग्रेस को चुनावों में भाग लेकर सरकारी परिषदों (धारा सभाओं) के भीतर प्रवेश करना चाहिए। वहां जाकर सरकार के कामकाज में अड़ंगा लगाना चाहिए और उनकी दमनकारी नीतियों का विरोध करना चाहिए। कांग्रेस ने शुरुआत में इस प्रस्ताव को पास नहीं किया।
  • इसके बाद सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया और मार्च 1923 में इलाहाबाद में ‘स्वराज पार्टी’ की स्थापना की

 

स्वराज पार्टी के कार्य और अंत:

  • इनका मुख्य लक्ष्य भी कांग्रेस की तरह ‘स्वराज’ ही था, बस तरीका अलग था। ये लोग 1919 के कानून के सुधारों का अंत चाहते थे और परिषदों में जाकर नौकरशाही को कमजोर करना चाहते थे।
  • शुरुआती नीतियों में ये काफी सफल रहे, जैसे—बजट प्रस्तावों को नामंजूर करना और सरकारी समितियों के गठन को रोकना।
  • सी. आर. दास की मृत्यु के बाद पार्टी के कुछ नेताओं (जैसे मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय) ने सरकार से सहयोग का रास्ता चुना। चुनावों में हिन्दू संप्रदायवाद का सहारा लिया गया, जिससे मोतीलाल नेहरू को भी सांप्रदायिक अपीलों का सामना करना पड़ा। इन कमियों के कारण 1926 तक आते-आते यह पार्टी पूरी तरह पंगु (कमजोर) और सीमित हो गई

 

हिन्दू पुनरुत्थानवाद और दक्षिणपंथी संगठन

19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान देश में हिन्दू परंपराओं के गौरव और पुनरुत्थान की शुरुआत हुई।

  • 1830 में कोलकाता में राधाकांत ने ‘धर्मसभा’ बनाई। इसके बाद 1875 में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की और “वेदों की ओर लौटो” का प्रसिद्ध नारा दिया।
  • कांग्रेस के शुरुआती 10-15 सालों के काम से असंतुष्ट होकर युवा नेताओं (बाल-पाल-लाल) ने राष्ट्रीय चेतना फैलाने के लिए धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया। इसके जवाब में रूढ़िवादी धर्म सभाएं और सनातन धर्म सभाएं कुंभ मेलों के माध्यम से संगठित होने लगीं।
  • इसी परिप्रेक्ष्य में 1915 में पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा हरिद्वार में ‘हिन्दू महासभा’ की स्थापना की गई। असहयोग आंदोलन के बाद जब देश में सांप्रदायिकता बढ़ी, तो इस सभा का प्रभाव क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ा।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का गठन:

  • 1925 ई. में नागपुर में बाल गंगाधर तिलक के अनुयायी डॉ. के. बी. हेडगेवार (केशव बलिराम हेडगेवार) ने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (RSS) की स्थापना की।
  • इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय हिन्दू नवयुवकों को अनुशासित और चारित्रिक रूप से मजबूत करके राष्ट्र का निर्माण करना था।
  • यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था के रूप में उभरी, जिसमें राष्ट्र धर्म के साथ-साथ प्रखर हिंदुत्व की शिक्षा दी जाती थी।

 

पूरे अध्याय का निष्कर्ष

  • ब्रिटिश सरकार की गलत प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक नीतियों ने ही अनजाने में भारतीयों के भीतर ‘राष्ट्रवाद’ को जन्म दिया और मजबूत किया।
  • सन 1914 से लेकर 1930 के बीच का समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे मजबूत और चरम काल था। इस दौरान महात्मा गांधी के मजबूत नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश की मुख्य ताकत के रूप में काम किया।
  • इसी दौर में देश के भीतर किसान सभा और कई मजदूर संगठनों की नींव पड़ी। किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के आंदोलनों ने आज़ादी की लड़ाई को एक नया आयाम दिया।
  • इसी समय देश की राजनीति में साम्यवाद (कम्युनिस्ट दल), स्वराज पार्टी, आर.एस.एस. और मुस्लिम लीग जैसी अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों का गठन हुआ और उनकी गतिविधियां तेज हुईं।
  • 1930 के बाद इन सभी अलग-अलग दलों और आंदोलनों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चौतरफा दबाव बनाया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की और देश को आज़ादी के रास्ते पर ला खड़ा किया।

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